अजय कुमार बियानी
रक्षाबंधन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि भाई-बहन के स्नेह, विश्वास, सुरक्षा, मर्यादा और पारिवारिक संस्कारों से जुड़ा पर्व है। कलाई पर बंधा राखी का धागा भले ही छोटा हो, लेकिन उसमें रिश्तों की बड़ी दुनिया समाई होती है। इसलिए जब ऐसे भावनात्मक पर्व को किसी विज्ञापन का विषय बनाया जाए तो रचनात्मकता के साथ सांस्कृतिक संवेदनशीलता और मर्यादा का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी हो जाता है।
हाल ही में अभिनेत्री कृति सेनन से जुड़े एक आभूषण विज्ञापन में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उस पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। अभिनेत्री के परिधान और दृश्य को लेकर लोगों ने आपत्ति जताई। अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी इस पर सवाल उठाए। विवाद बढ़ने के बाद संबंधित कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया।
यहां सवाल केवल किसी अभिनेत्री के पहनावे का नहीं है। नाच न जाने आंगन टेढ़ा की तरह पूरे विवाद को केवल कलाकार के कपड़ों तक सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। असली सवाल विज्ञापन की सोच और प्रस्तुति का है।
आज विज्ञापन जगत में ध्यान खींचने के लिए कुछ अलग करने की होड़ दिखाई देती है। लेकिन जहां आस्था जुड़ी हो, वहां अति उत्साह महंगा पड़ सकता है। रक्षाबंधन जैसे पर्व में भाई-बहन का रिश्ता भारतीय परिवार व्यवस्था और संस्कारों की सुंदर अभिव्यक्ति है। ऐसे रिश्ते को प्रस्तुत करते समय यह समझना आवश्यक है कि दर्शक उसे केवल मनोरंजन की नजर से नहीं देखते।
रचनात्मक स्वतंत्रता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। कलाकार को अपनी पसंद का परिधान पहनने और अपनी कला को अभिव्यक्त करने का अधिकार है। किसी व्यक्ति के पहनावे पर व्यक्तिगत नैतिक पहरा लगाना उचित नहीं। लेकिन जब वही कलाकार किसी कंपनी के व्यावसायिक संदेश का हिस्सा बनकर करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़े पर्व और प्रतीक को प्रस्तुत करता है, तब जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने की समझ भी जरूरी है।
व्यापार का उद्देश्य उत्पाद बेचना है, भावनाएं खरीदना नहीं। रक्षाबंधन को बाजार से जोड़ना गलत नहीं है। राखी, मिठाई, कपड़े और उपहार सभी बाजार का हिस्सा हैं। समस्या तब पैदा होती है जब बिक्री बढ़ाने के लिए उस रिश्ते की गरिमा ही पीछे छूट जाए, जिसे समाज सदियों से सम्मान देता आया है।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या सभी धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों के साथ समान संवेदनशीलता बरती जाती है? यदि किसी समुदाय के धार्मिक प्रतीक या पर्व को विज्ञापन में प्रस्तुत करते समय कंपनियां अत्यधिक सावधानी रखती हैं, तो सनातन परंपराओं से जुड़े पर्वों के मामले में भी वही कसौटी लागू होनी चाहिए। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी वाली सोच से विवादों से बचने के बजाय बेहतर रास्ता यह है कि शुरुआत से ही समान सम्मान और संवेदनशीलता बरती जाए।
इसका अर्थ यह कतई नहीं कि सनातन पर्वों को आधुनिक तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। बिल्कुल किया जा सकता है। आज की पीढ़ी की भाषा, आधुनिक दृश्य शैली और नई रचनात्मक कल्पनाओं के साथ भी रक्षाबंधन को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है। भाई की कलाई पर राखी बांधती बहन, बहन की रक्षा का संकल्प लेता भाई, दूर रहने वाले भाई-बहन का भावनात्मक मिलन या बचपन की यादें—इनमें से किसी भी दृश्य में विज्ञापन को प्रभावशाली बनाने की पूरी क्षमता है।
क्योंकि हीरे की परख जौहरी ही जानता है, उसी तरह भारतीय रिश्तों की गहराई को समझने वाला रचनाकार बिना विवाद पैदा किए भी प्रभावशाली विज्ञापन बना सकता है।
रक्षाबंधन का सबसे बड़ा संदेश किसी महंगे उपहार में नहीं, बल्कि भरोसे में है। बहन भाई से कहती है—“जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, मेरा साथ मत छोड़ना।” भाई के मन में भी यही भावना होती है—“तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे साथ हूं।” यह रिश्ता दिखावे से नहीं, विश्वास से मजबूत होता है।
इसलिए विज्ञापन जगत के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संदेश है—नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली स्थिति न बने। करोड़ों लोगों की आस्था और भावनाओं से जुड़े पर्वों को केवल चर्चा बटोरने का माध्यम न बनाया जाए। रचनात्मकता ऐसी हो जो आकर्षित करे, लेकिन आस्था को ठेस न पहुंचाए; आधुनिकता ऐसी हो जो नई पीढ़ी को जोड़े, लेकिन संस्कारों का मजाक न बनाए।
विवाद के बाद विज्ञापन वापस लेना निश्चित रूप से जिम्मेदारी का संकेत हो सकता है, लेकिन उससे बेहतर रास्ता है कि विज्ञापन तैयार करने से पहले ही सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझा जाए। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी केवल सड़क पर लागू होने वाली कहावत नहीं है; सार्वजनिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर भी यह उतनी ही सार्थक है।
रक्षाबंधन बाजार के लिए अवसर हो सकता है, लेकिन परिवार के लिए यह भावनाओं का पर्व है। राखी की कीमत कुछ रुपये हो सकती है, पर उसका भाव अनमोल है। उसे किसी चमकदार विज्ञापन की सनसनी से नहीं, रिश्तों की गरिमा से सजाया जाना चाहिए।
आखिर बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। एक विज्ञापन कुछ दिनों में भुला दिया जाएगा, लेकिन उससे उठे सवाल लंबे समय तक चर्चा में रह सकते हैं।
इस रक्षाबंधन पर संदेश साफ है—विज्ञापन बनाइए, आधुनिक बनाइए, आकर्षक बनाइए, लेकिन आस्था और रिश्तों की मर्यादा को ताक पर रखकर नहीं।
क्योंकि राखी का धागा केवल कलाई पर नहीं बंधता, वह दिल से दिल को जोड़ता है।





