ललित गर्ग
भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में कुछ महापुरुष ऐसे हुए हैं जिन्होंने केवल धर्म का उपदेश नहीं दिया, बल्कि धर्म की आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित किया। वे परम्परा के अनुयायी भर नहीं बने, बल्कि समय की आवश्यकताओं के अनुरूप धर्म को नया जीवन, नई दृष्टि और नई दिशा दी। ऐसे ही युगद्रष्टा थे आचार्य श्री भिक्षु। उन्होंने धर्म को कर्मकाण्ड, आडम्बर और रूढ़ियों के बंधनों से मुक्त कर सत्य, अहिंसा, संयम, आत्मानुशासन और चरित्र-निर्माण की सुदृढ़ भूमि पर स्थापित किया। इसीलिए वे केवल तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक चेतना में धर्म-क्रांति के महान पुरोधा माने जाते हैं। आचार्य भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष का समापन 27 जुलाई 2026 को हो रहा है। पूरे वर्ष देश-विदेश में विविध आध्यात्मिक, वैचारिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से उनके जीवन और दर्शन का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। इस राष्ट्रीय अभियान का नेतृत्व तेरापंथ धर्मसंघ की 113 वर्ष पुरानी सर्वोच्च संस्था जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा ने किया। आचार्य कालूगणी की प्रेरणा से स्थापित और आचार्य तुलसी के दूरदर्शी नेतृत्व में विकसित इस संस्था ने त्रिशताब्दी वर्ष को केवल उत्सव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मूल्य-जागरण का राष्ट्रीय अभियान बना दिया।
जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री महेन्द्र नाहटा ने आचार्य भिक्षु को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु केवल एक महान संत नहीं, बल्कि दिव्य चेतना और युगदृष्टा व्यक्तित्व के धनी थे। लगभग 300 वर्ष पूर्व उन्होंने जिस धर्मसंघ की स्थापना सत्य, अहिंसा, मर्यादा, अनुशासन और चरित्र के आधार पर की थी, वह आज भी निरंतर गतिशील होकर देश और दुनिया को नैतिकता, मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक जीवन की नई दिशा दे रहा है। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु का दर्शन किसी एक संप्रदाय की सीमाओं में बंधा नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। व्यक्ति-निर्माण से समाज-निर्माण और समाज-निर्माण से विश्व-कल्याण का उनका चिंतन आज के अशांत और मूल्य-संकट से जूझते विश्व के लिए पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। आचार्य भिक्षु का जीवन हमें सिखाता है कि सत्य पर अडिग रहकर, मर्यादा का पालन करते हुए और आत्मानुशासन को जीवन का आधार बनाकर ही स्थायी शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
आचार्य भिक्षु ऐसे समय में प्रकट हुए जब धर्म का स्वरूप अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका था। बाह्याचार को धर्म मान लिया गया था, कर्मकाण्ड को साधना समझा जाने लगा था और सम्प्रदायगत प्रतिस्पर्धा ने आध्यात्मिकता की गरिमा को धूमिल कर दिया था। ऐसे वातावरण में उन्होंने निर्भीक होकर घोषणा की कि धर्म का संबंध बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण की पवित्रता से है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जहां सत्य नहीं-वहां धर्म नहीं, जहां अहिंसा नहीं-वहां साधना नहीं और जहां चरित्र नहीं-वहां आध्यात्मिकता केवल आडम्बर है। आचार्य भिक्षु का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने साधुता की नई परिभाषा प्रस्तुत की। उनके अनुसार साधु होना केवल वेश बदल लेना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, लोभ, मोह और स्वार्थ का त्याग करना है। उन्होंने साधु जीवन को समाज के लिए आदर्श, अनुशासन और आत्मसंयम का जीवंत उदाहरण बनाया। उन्होंने कहा कि साधु का मूल्य उसके ज्ञान से पहले उसके चरित्र में है, उसके उपदेश से पहले उसके आचरण में है। इसीलिए उन्होंने साधु जीवन को कठोर मर्यादाओं से जोड़ा और स्वयं उनका अक्षरशः पालन किया।
आचार्य भिक्षु ने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि मर्यादाओं का सुव्यवस्थित विधान निर्मित किया। ये मर्यादाएं किसी प्रकार का बंधन नहीं थीं, बल्कि साधना की सुरक्षा-रेखाएं थीं। उनका विश्वास था कि मर्यादा के बिना न व्यक्ति टिक सकता है, न संगठन और न ही धर्म। अनुशासन को उन्होंने धर्मसंघ की आत्मा माना। यही कारण है कि तेरापंथ धर्मसंघ की विशिष्ट पहचान उसकी मर्यादा, अनुशासन और एकसूत्रता रही है। आचार्य भिक्षु ने संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में केवल तेरह श्रावकों के साथ नए धर्मसंघ की स्थापना की। उन्होंने कभी संख्या को सफलता का आधार नहीं माना। उनके लिए गुणवत्ता, चरित्र और सत्य ही वास्तविक शक्ति थे। उन्होंने अपने धर्मसंघ को प्रभु के चरणों में समर्पित करते हुए कहा- ‘यह तेरा पंथ है।’ यही भाव आगे चलकर ‘तेरापंथ’ नाम का आधार बना। इसमें किसी व्यक्ति का अहंकार नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण का भाव निहित है।
आचार्य भिक्षु की एक और विलक्षण देन है- एक आचार्य, एक विचार और एक संगठन की व्यवस्था। यानी तेरापंथ धर्मसंघ का आधार बना एक नेतृत्व, एक विधान एवं एक प्ररूपणा। उन्होंने अनुभव किया कि जहां अनेक सत्ता-केंद्र होंगे, वहां मतभेद, संघर्ष और विघटन भी होंगे। इसलिए उन्होंने धर्मसंघ को एक अनुशासित नेतृत्व प्रदान किया। यह व्यवस्था किसी व्यक्ति-विशेष की प्रतिष्ठा के लिए नहीं थी, बल्कि संगठन की एकता, पारदर्शिता और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए थी। आज जब अनेक धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं नेतृत्व संघर्ष, गुटबाजी और वैचारिक विखंडन से जूझ रही हैं, तब आचार्य भिक्षु की यह संगठनात्मक दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होती है। उनकी दृष्टि में धर्म केवल व्यक्तिगत मोक्ष का मार्ग नहीं था, बल्कि समाज के नैतिक पुनर्निर्माण का माध्यम भी था। उनका विश्वास था कि समाज को बदलने के लिए पहले व्यक्ति को बदलना होगा। व्यक्ति का चरित्र बदलेगा तो परिवार बदलेगा, परिवार बदलेगा तो समाज बदलेगा और समाज बदलेगा तो राष्ट्र भी बदल जाएगा। इसलिए उन्होंने व्यक्ति-क्रांति को धर्म-क्रांति का आधार बनाया। उनका सम्पूर्ण चिंतन आत्मपरिष्कार से लोकपरिष्कार की यात्रा है।
आचार्य भिक्षु ने सत्य और अहिंसा को केवल दार्शनिक आदर्श नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें व्यवहार का विषय बनाया। सत्य उनके लिए निर्भीकता का पर्याय था और अहिंसा करुणा, सहिष्णुता तथा आत्मसंयम का जीवन-मूल्य। यही कारण है कि उनके विचार आगे चलकर आचार्य तुलसी के अणुव्रत आंदोलन, आचार्य महाप्रज्ञ की प्रेक्षाध्यान एवं अहिंसा यात्रा और वर्तमान आचार्य श्री महाश्रमण के नैतिक जागरण अभियानों में निरंतर विकसित होते रहे। महात्मा गांधी द्वारा सत्य और अहिंसा को राष्ट्रीय जीवन का आधार बनाने में भी भारतीय संत परम्परा की इसी चेतना की स्पष्ट अनुगूँज सुनाई देती है। आज के वर्तमान आचार्य श्री महाश्रमण अपने पदयात्रा-आधारित जनजागरण अभियानों, व्यसनमुक्ति, नैतिकता, सद्भावना, पर्यावरण संरक्षण और चरित्र निर्माण के संदेशों के माध्यम से वस्तुतः आचार्य भिक्षु के दर्शन को ही जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। उनका प्रत्येक कदम इस सत्य का प्रमाण है कि धर्म मंदिरों की सीमाओं में नहीं, बल्कि मनुष्य के व्यवहार में जीवित रहता है।
आज का संसार अभूतपूर्व संकटों से गुजर रहा है। धर्म के नाम पर संघर्ष हैं, विचारधाराओं के नाम पर विभाजन है, संगठन व्यक्तिवाद से ग्रस्त हैं और मनुष्य भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक अशांति से घिरा हुआ है। ऐसे समय में आचार्य भिक्षु का दर्शन केवल तेरापंथ के लिए नहीं, सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक बनकर सामने आता है। उनका संदेश है कि धर्म का आधार सत्य हो, नेतृत्व का आधार उत्तरदायित्व हो, संगठन का आधार अनुशासन हो और जीवन का आधार चरित्र हो। यदि व्यक्ति स्वयं बदलने का साहस कर ले, तो समाज परिवर्तन अपने आप प्रारंभ हो जाता है। आचार्य भिक्षु ने अपने समय से बहुत आगे की सोच रखी। उन्होंने धर्म को जड़ता से मुक्त कर विवेक से जोड़ा, साधुता को बाहरी पहचान से ऊपर उठाकर चरित्र से जोड़ा, संगठन को व्यक्तिवाद से मुक्त कर अनुशासन से जोड़ा और आध्यात्मिकता को लोकमंगल से जोड़ा। यही उनकी मौलिकता है, यही उनकी अमरता है।
27 जुलाई 2026 को जब आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष का समापन होगा, तब यह केवल एक वर्षव्यापी आयोजन का अंत नहीं होगा। यह उस युगद्रष्टा महापुरुष के प्रति कृतज्ञता का अवसर होगा, जिसने धर्म को नई दृष्टि दी, साधुता को नया स्वरूप दिया, मर्यादाओं को जीवन का आधार बनाया और व्यक्ति-क्रांति से धर्म-क्रांति का ऐसा दीप प्रज्वलित किया, जिसकी ज्योति तीन शताब्दियों बाद भी उतनी ही उज्ज्वल, प्रेरक और प्रासंगिक है। यही आचार्य भिक्षु की सबसे बड़ी विजय है और यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि।





