पेपर लीक पर छात्र आंदोलन से 2027 में राहुल-अखिलेश को कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा?

How much political benefit will Rahul and Akhilesh derive in 2027 from the student protests over the paper leak?

अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान आंदोलन के बाद अब छात्र आंदोलन का मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नई राजनीतिक जमीन तैयार करता दिखाई दे रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था की कथित गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों का गुस्सा अब केवल परीक्षा केंद्रों और धरना स्थलों तक सीमित नहीं है। यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक पहुंच चुका है और विपक्षी दल इसे सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल यही है कि क्या छात्रों का यह आक्रोश 2027 में भारतीय जनता पार्टी के लिए वही चुनौती बन सकता है, जिसकी उम्मीद विपक्ष ने 2022 में किसान आंदोलन के बाद की थी?इस पूरे घटनाक्रम में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की सक्रियता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। पेपर लीक के मुद्दे पर राहुल गांधी पहले से सरकार को घेरते रहे हैं, लेकिन छात्रों के आंदोलन ने उन्हें सीधे सड़क पर उतरने का अवसर दे दिया है। अखिलेश यादव के लिए यह मुद्दा इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं की नाराजगी लंबे समय से विपक्ष के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। छात्र आंदोलन को समर्थन देकर समाजवादी पार्टी एक ऐसे वर्ग तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है, जो आने वाले चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।मामला केवल नीट या किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणाम में देरी और भर्ती प्रक्रिया पर उठते सवालों ने लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, जहां लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। एक परीक्षा की तैयारी में परिवार की बचत, छात्र की उम्र और कई वर्षों का समय लग जाता है। ऐसे में परीक्षा रद्द होने या पेपर लीक की खबर केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रहती, बल्कि परिवारों के लिए आर्थिक और भावनात्मक संकट बन जाती है।

केंद्र सरकार ने 2024 में लोक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकने के लिए कानून बनाया था। इस कानून में पेपर लीक, संगठित नकल और परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी को अपराध बनाया गया तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान किया गया। इसके बावजूद जब लगातार नई घटनाओं को लेकर सवाल उठते हैं तो छात्रों का असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। यही वह बिंदु है जहां विपक्ष सरकार से पूछ रहा है कि कानून बनने के बाद भी व्यवस्था में वह भरोसा क्यों नहीं बन पाया, जिसकी छात्रों को सबसे ज्यादा जरूरत है।आंदोलन के बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देर रात वीडियो संदेश जारी कर पेपर लीक के खिलाफ और कड़े कदमों तथा नए कानून की बात करना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पेपर लीक लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए गंभीर पीड़ा का विषय है और सरकार दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगी। सरकार की ओर से यह संदेश उस समय आया जब छात्र आंदोलन लगातार विस्तार ले रहा था और विपक्षी दल इसे संसद और सड़क दोनों जगह उठा रहे थे।यहीं से इस आंदोलन का राजनीतिक पहलू सामने आता है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव दोनों जानते हैं कि छात्र आंदोलन को केवल सरकार विरोधी प्रदर्शन में बदल देना आसान नहीं है। छात्र किसी राजनीतिक दल के झंडे के नीचे आंदोलन शुरू नहीं करते। उनकी पहली मांग परीक्षा व्यवस्था में भरोसा, पारदर्शिता और भविष्य की सुरक्षा होती है। इसलिए विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह छात्रों की आवाज का समर्थन करते हुए आंदोलन पर अपना राजनीतिक कब्जा करने की कोशिश करता हुआ दिखाई न दे।

2022 का किसान आंदोलन इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए सबसे बड़ा उदाहरण है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लंबे आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने नवंबर 2021 में तीनों कानून वापस ले लिए थे। उस समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। समाजवादी पार्टी को उम्मीद थी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की नाराजगी भाजपा के खिलाफ बड़ा राजनीतिक माहौल बनाएगी। अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन किया और जयंत चौधरी के साथ मिलकर किसान मुद्दे को चुनावी अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया।लेकिन चुनाव परिणामों ने विपक्ष की उम्मीदों को पूरी तरह सच साबित नहीं किया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीतीं और उसके सहयोगियों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की कुल सीटें 273 तक पहुंचीं। समाजवादी पार्टी को 111 सीटें मिलीं, जबकि उसके सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल को 8 सीटें मिलीं। भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग 41.29 प्रतिशत रहा, जबकि समाजवादी पार्टी को 32.06 प्रतिशत वोट मिले। यानी किसान आंदोलन के बाद भाजपा की सीटें जरूर घटीं, लेकिन वह सत्ता से बाहर नहीं हुई।हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण बदल दिया। समाजवादी पार्टी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस के साथ गठबंधन ने भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया। इस परिणाम ने विपक्ष को यह विश्वास दिया कि युवा, रोजगार, भर्ती और पेपर लीक जैसे मुद्दे यदि जातीय और सामाजिक समीकरणों से जुड़ जाएं तो भाजपा के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। यही कारण है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से एक साल पहले छात्र आंदोलन विपक्ष के लिए सामान्य विरोध प्रदर्शन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

लेकिन यहां किसान आंदोलन और छात्र आंदोलन के बीच बड़ा अंतर भी है। किसान आंदोलन मुख्य रूप से एक संगठित सामाजिक वर्ग और मजबूत किसान संगठनों के नेतृत्व में चला था। उसके पास गांवों तक फैला हुआ संगठनात्मक ढांचा था। छात्र आंदोलन का स्वरूप अधिक बिखरा हुआ है। इसमें अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा, कोचिंग संस्थानों से जुड़े छात्र, बेरोजगार अभ्यर्थी और उनके परिवार शामिल हैं। यह आंदोलन बहुत बड़ा जनभावनात्मक मुद्दा तो बन सकता है, लेकिन उसे चुनावी वोट में बदलना अपने आप में कठिन है।दूसरी चुनौती यह है कि छात्र हर चुनाव में एक जैसा राजनीतिक व्यवहार नहीं करते। एक ही परिवार में माता-पिता किसी एक दल के समर्थक हो सकते हैं, जबकि युवा किसी दूसरे दल के। कई छात्र रोजगार और परीक्षा व्यवस्था से नाराज होने के बावजूद मतदान के समय कानून-व्यवस्था, जातीय समीकरण, कल्याणकारी योजनाओं, धार्मिक मुद्दों और स्थानीय उम्मीदवार को भी महत्व देते हैं। इसलिए यह मान लेना कि पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन सीधे भाजपा के वोट में बदल जाएगा, जल्दबाजी होगी।फिर भी इस आंदोलन को हल्के में लेना भाजपा के लिए जोखिम भरा हो सकता है। उत्तर प्रदेश में युवाओं की संख्या बहुत बड़ी है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों का प्रभाव केवल उनके वोट तक सीमित नहीं रहता। वे अपने परिवारों और गांवों में राजनीतिक चर्चा को प्रभावित करते हैं। यदि लगातार परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक और भर्ती में देरी का मुद्दा बना रहता है तो यह सरकार के खिलाफ धीरे-धीरे जमा होने वाली नाराजगी में बदल सकता है।

राहुल गांधी और अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा अवसर यही है कि वे इस आंदोलन को केवल सरकार विरोधी नारे तक सीमित न रखकर रोजगार, भर्ती कैलेंडर, परीक्षा सुरक्षा और जवाबदेही का ठोस राजनीतिक एजेंडा बनाएं। यदि विपक्ष केवल धरना, गिरफ्तारी और तस्वीरों तक सीमित रहा तो किसान आंदोलन की तरह छात्र आंदोलन का भी राजनीतिक लाभ सीमित रह सकता है। लेकिन यदि वह छात्रों की वास्तविक समस्याओं के समाधान का स्पष्ट मॉडल सामने रखता है, तो 2027 में यह मुद्दा भाजपा के खिलाफ व्यापक असंतोष को जोड़ने का काम कर सकता है।अंततः सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी या अखिलेश यादव छात्र आंदोलन से राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं या नहीं। राजनीति में हर दल जनता के आंदोलनों से जुड़कर लाभ लेने की कोशिश करता है। असली सवाल यह है कि क्या छात्र उन्हें अपना विश्वसनीय प्रतिनिधि मानेंगे? किसान आंदोलन के बाद विपक्ष को उम्मीद के मुताबिक लाभ नहीं मिला था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने दिखा दिया कि उत्तर प्रदेश का मतदाता सत्ता के लंबे प्रभुत्व को भी चुनौती दे सकता है। अब 2027 में पेपर लीक और रोजगार का मुद्दा कितना बड़ा चुनावी हथियार बनेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार छात्रों का भरोसा कितनी जल्दी वापस हासिल करती है और विपक्ष आंदोलन की आवाज को कितनी गंभीरता से राजनीतिक कार्यक्रम में बदल पाता है। फिलहाल इतना साफ है कि छात्र आंदोलन केवल परीक्षा व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है। उत्तर प्रदेश में यह अब सत्ता, विपक्ष और युवाओं के बीच भरोसे की लड़ाई बन चुका है।