रोजगार के भंवर में उलझता युवा भविष्य

The youth's future entangled in the vortex of employment

सत्य भूषण शर्मा

आज का युवा सपनों, संघर्षों और संभावनाओं का प्रतीक माना जाता है। उसके भीतर ऊर्जा है, प्रतिभा है, कुछ कर गुजरने का जज़्बा है, लेकिन विडम्बना यह है कि वही युवा आज बेरोजगारी के चक्रव्यूह में बुरी तरह फँसता जा रहा है। देश के करोड़ों शिक्षित युवक-युवतियाँ रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। उनके सपनों की उड़ान को परिस्थितियों ने जैसे कैद कर लिया हो।

सरकारें समय-समय पर रोजगार बढ़ाने के लिए नई योजनाएँ बनाती हैं, रोजगार कार्यालय खोले जाते हैं, युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के दावे किए जाते हैं, परन्तु जमीनी हकीकत इससे काफी अलग दिखाई देती है। नौकरी की तलाश में युवा कार्यालयों के चक्कर काटते रहते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिता देते हैं, फिर भी सफलता बहुत कम लोगों को मिल पाती है।

जब भी बेरोजगारी का विषय सामने आता है, तब हमारे मन में एक ऐसे युवा की तस्वीर उभरती है जो हाथों में फाइलें और प्रमाण पत्र लिए, थका हुआ, परेशान और उम्मीदों के सहारे एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक भटक रहा होता है। उसकी आँखों में सपने तो होते हैं, लेकिन परिस्थितियाँ उन सपनों को बार-बार तोड़ देती हैं। समाज के लिए यह केवल एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और नैतिक संकट भी बन चुकी है।

आज शिक्षा का स्वरूप भी चिंता का विषय बन गया है। महँगी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा। डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, लेकिन अवसर सीमित होते जा रहे हैं। नौकरी पाने के लिए योग्यता के साथ-साथ धन, सिफारिश, जातीय समीकरण और संपर्कों का महत्व बढ़ता दिखाई देता है। जिन युवाओं के पास ये साधन नहीं होते, वे निराशा और हताशा का शिकार हो जाते हैं।

बेरोजगारी का सबसे खतरनाक प्रभाव यह है कि यह युवाओं को गलत रास्तों की ओर धकेल देती है। जब मेहनत और प्रतिभा को उचित अवसर नहीं मिलता, तब कुछ युवा अपराध, नशे, हिंसा और अन्य गलत गतिविधियों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यह केवल उस युवा की नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की हानि है।

सरकारें युवाओं को स्वरोजगार हेतु ऋण और योजनाएँ उपलब्ध कराती हैं, लेकिन कई बार इन योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुँच पाता। लघु उद्योगों और छोटे व्यवसायों को पर्याप्त सहयोग न मिलने के कारण युवा आर्थिक रूप से मजबूत नहीं बन पाते। ऐसे में उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूटने लगता है।

यह समस्या केवल गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों तक सीमित नहीं रही। सम्पन्न परिवारों के युवा भी आज मानसिक दबाव, असफलता और भविष्य की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। सपनों का टूटना, अपेक्षाओं का बोझ और लगातार असफलता व्यक्ति को भीतर से कमजोर कर देती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को रोजगार से जोड़ा जाए, कौशल आधारित प्रशिक्षण को बढ़ावा मिले, उद्योगों और शिक्षा संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो तथा युवाओं को केवल डिग्री नहीं, बल्कि व्यवहारिक ज्ञान और आत्मविश्वास भी दिया जाए। यदि देश का युवा मजबूत होगा, तभी राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल बन सकेगा।

अंततः यही कहा जा सकता है कि बेरोजगारी केवल नौकरी न मिलने की समस्या नहीं, बल्कि टूटते सपनों, बिखरती उम्मीदों और संघर्ष करती युवा पीढ़ी की पीड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज, सरकार और व्यवस्था मिलकर युवाओं को सही दिशा, अवसर और सम्मान प्रदान करें, ताकि उनका भविष्य अंधकार में नहीं बल्कि सफलता और आत्मविश्वास की रोशनी में चमक सके।