समान काम, समान वेतन की बदलती कसौटी

The Evolving Criteria for Equal Pay for Equal Work

सौरभ वार्ष्णेय

सदी बदल गई है, लेकिन समानता का सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब समानता को देखने का संवैधानिक चश्मा पहले की तुलना में अधिक बारीक हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इसी बदलाव को रेखांकित किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल यह तथ्य कि दो कर्मचारी एक जैसा काम कर रहे हैं और उनकी जिम्मेदारियां भी समान हैं, अपने-आप में समान वेतन का संवैधानिक अधिकार पैदा नहीं करता। वेतन-समानता के दावे को परखते समय भर्ती का स्रोत, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और सेवा-नियमों जैसे पहलुओं को भी देखना होगा। यह टिप्पणी पहली नजर में उन कर्मचारियों के लिए असहज लग सकती है जो समान काम करने के बावजूद अलग वेतन पा रहे हैं। आखिर एक शिक्षक यदि वही कक्षा पढ़ा रहा है, वही पाठ्यक्रम पढ़ा रहा है और उसी तरह की जिम्मेदारियां निभा रहा है, तो उसके वेतन में अंतर क्यों हो? लेकिन न्यायालय का तर्क यह है कि सरकारी सेवा में वेतन केवल वर्तमान काम के आधार पर तय नहीं होता। किसी कर्मचारी की पिछली सेवा, भर्ती का तरीका, योग्यता और अनुभव भी उसके वेतन निर्धारण का आधार हो सकते हैं। यही इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात है। समान काम और समान वेतन हमेशा एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की बात कही गई है, जबकि अनुच्छेद 39(स्र) राज्य को पुरुषों और महिलाओं के लिए समान काम पर समान वेतन की दिशा में नीति बनाने का निर्देश देता है। न्यायपालिका ने लंबे समय तक इन संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत को सामाजिक न्याय के महत्वपूर्ण औजार के रूप में विकसित किया। लेकिन समय के साथ अदालतों ने यह भी महसूस किया कि सरकारी सेवाओं की वास्तविकता केवल पदनाम और वर्तमान काम तक सीमित नहीं है। एक ही पद पर काम कर रहे दो कर्मचारियों की नियुक्ति अलग-अलग माध्यमों से हो सकती है। एक कर्मचारी वर्षों की सेवा के बाद पदोन्नत होकर आया हो सकता है, जबकि दूसरा उसी पद पर सीधे भर्ती हुआ हो। दोनों का वर्तमान काम समान हो सकता है, लेकिन उनकी सेवा-यात्रा समान नहीं होती।सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी इसी अंतर को रेखांकित करती है। अदालत के अनुसार, समान वेतन का दावा करने वाले कर्मचारी को केवल काम की समानता नहीं, बल्कि प्रासंगिक सेवा-शर्तों में वास्तविक समानता भी स्थापित करनी होगी। यह बदलाव दरअसल समानता के सिद्धांत को खत्म करना नहीं, बल्कि उसकी व्याख्या को अधिक व्यापक बनाना है।

जीपी संगीता बनाम केरल राज्य एवं अन्य के मामले में विवाद शिक्षकों के वेतनमान को लेकर था। एक ओर सीधे भर्ती होकर जूनियर हायर सेकेंडरी स्कूल शिक्षक बने कर्मचारी थे, वहीं दूसरी ओर पदोन्नति अथवा स्थानांतरण के माध्यम से इस पद पर आए शिक्षक थे। दोनों वर्गों से संबंधित शिक्षक समान स्तर पर काम कर रहे थे और उनकी जिम्मेदारियों में भी व्यापक समानता थी। सीधे भर्ती हुए शिक्षकों का तर्क स्वाभाविक था. जब काम एक है, जिम्मेदारी एक है और पद भी समान है तो वेतनमान अलग क्यों?लेकिन अदालत ने सवाल को केवल वर्तमान कार्य तक सीमित नहीं रखा। पदोन्नति से आए शिक्षकों की पिछली सेवा को भी महत्वपूर्ण माना गया। वे पहले से स्थायी और पूर्णकालिक लोअर स्कूल शिक्षक के रूप में सेवा कर रहे थे। उनकी लंबी सेवा और पूर्व सेवा-स्थिति को देखते हुए उन्हें मिलने वाला वेतनमान केवल नए पद की जिम्मेदारियों का भुगतान नहीं था, बल्कि उनकी पिछली सेवा और अर्जित स्थिति की निरंतरता से भी जुड़ा था। यही वह बिंदु है जहां समान काम और समान सेवा-स्थिति के बीच अंतर सामने आता है।

यह सवाल पूरी बहस के केंद्र में है। इसका जवाब न तो पूरी तरह हां है और न ही पूरी तरह नहीं। यदि दो कर्मचारी वास्तव में समान योग्यता, समान अनुभव, समान भर्ती प्रक्रिया और समान सेवा-शर्तों के तहत एक ही काम कर रहे हैं, तो वेतन में मनमाना अंतर निश्चित रूप से समानता के संवैधानिक सिद्धांत पर सवाल खड़ा कर सकता है।लेकिन यदि दो कर्मचारियों की सेवा में महत्वपूर्ण अंतर है. मसलन, एक लंबे अनुभव के बाद पदोन्नत होकर आया है और दूसरा सीधे भर्ती हुआ है . तो केवल वर्तमान काम की समानता के आधार पर दोनों का वेतन बिल्कुल समान कर देना भी हर परिस्थिति में न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।सरकारी सेवा में अनुभव का अपना मूल्य है। वर्षों की सेवा के दौरान कर्मचारी ने न केवल काम किया होता है, बल्कि संस्थागत ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और जिम्मेदारियों का एक इतिहास भी अर्जित किया होता है। पदोन्नति के माध्यम से ऊपर आने वाले कर्मचारी के वेतन में उस सेवा-इतिहास का प्रतिबिंब होना असामान्य बात नहीं है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने योग्यता और अनुभव को उचित वर्गीकरण का आधार माना है, बशर्ते वर्गीकरण सेवा-नियमों और संवैधानिक कसौटियों पर टिकता हो।

अक्सर समानता का अर्थ यह समझ लिया जाता है कि हर व्यक्ति के साथ हर परिस्थिति में बिल्कुल एक जैसा व्यवहार किया जाए। लेकिन संवैधानिक कानून में समानता का अर्थ हमेशा एकरूपता नहीं होता। अनुच्छेद 14 उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है। इसका अर्थ है कि यदि लोगों के बीच वास्तविक और प्रासंगिक अंतर है, तो कानून या सेवा-नियम उस अंतर के आधार पर अलग व्यवहार कर सकते हैं। शर्त यह है कि वर्गीकरण मनमाना न हो और उसका संबंध उस उद्देश्य से हो जिसे व्यवस्था हासिल करना चाहती है। मसलन, यदि किसी पद पर लंबे अनुभव वाले कर्मचारी को अधिक वेतन मिलता है तो उसका आधार केवल यह नहीं है कि वह अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति है। इसका आधार सेवा में अर्जित अनुभव और जिम्मेदारी हो सकता है। दूसरी तरफ, यदि अनुभव का आधार केवल कागज पर बनाया गया हो और उसका वास्तविक सेवा-शर्तों से कोई संबंध न हो, तो मामला अलग हो सकता है।

इसलिए अदालत की टिप्पणी को यह कहकर पढऩा उचित नहीं होगा कि अब समान काम के लिए समान वेतन का सिद्धांत समाप्त हो गया है। अधिक सटीक बात यह है कि उस सिद्धांत को लागू करने की कसौटी अधिक व्यापक हो गई है। अदालत ने भर्ती के स्रोत को भी महत्वपूर्ण माना है। यह सवाल स्वाभाविक है कि भर्ती का स्रोत किसी कर्मचारी के वेतन से क्यों जुडऩा चाहिए? सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं. सीधी भर्ती, पदोन्नति, स्थानांतरण या अन्य निर्धारित प्रक्रियाएं। प्रत्येक माध्यम के लिए अलग पात्रता, अनुभव और सेवा-शर्तें निर्धारित हो सकती हैं।पदोन्नत कर्मचारी ने पहले से सरकारी सेवा में एक निश्चित अवधि बिताई होती है। उसे पदोन्नति मिलने से पहले किसी दूसरे पद पर अनुभव प्राप्त हुआ होता है। वहीं सीधे भर्ती होने वाला व्यक्ति नए सिरे से उस कैडर में प्रवेश करता है।इस अंतर को पूरी तरह नजरअंदाज कर देना सेवा संरचना को प्रभावित कर सकता है। अगर हर नए पद पर पहुंचते ही पुराने और नए कर्मचारियों को हर मामले में समान वेतन दे दिया जाए, तो पदोन्नति और सेवा-अनुभव से जुड़े वेतन ढांचे पर भी असर पड़ सकता है।इसलिए अदालत का दृष्टिकोण सेवा-व्यवस्था की पूरी संरचना को ध्यान में रखता है।यहां एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समान काम करने वाले सीधे भर्ती कर्मचारियों की चिंता को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उनके पास पिछली सेवा नहीं है।सरकार और उसके विभागों की जिम्मेदारी है कि वे वेतनमान निर्धारित करते समय स्पष्ट, पारदर्शी और तर्कसंगत नियम बनाएं। यदि अलग वेतन का आधार अनुभव है तो अनुभव की गणना कैसे होगी? यदि योग्यता आधार है तो समान पद के लिए अलग-अलग योग्यता क्यों निर्धारित की गई? यदि भर्ती का स्रोत महत्वपूर्ण है तो उसका वेतन पर प्रभाव सेवा-नियमों में स्पष्ट क्यों न हो? यही वह क्षेत्र है जहां प्रशासनिक पारदर्शिता बेहद जरूरी हो जाती है। अदालतें प्रत्येक मामले में सेवा-नियमों और तथ्यों की जांच कर सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले विवादों को कम करने का बेहतर तरीका स्पष्ट नियम बनाना है। इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख हुआ, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने माना। इसका सामान्य अर्थ है कि किसी निर्णय में ऐसे बाध्यकारी कानूनी सिद्धांत की अनदेखी हुई हो जिसे उस मामले में ध्यान में रखा जाना चाहिए था।यह पहलू बताता है कि समान वेतन का प्रश्न केवल तथ्यों का प्रश्न नहीं है; यह न्यायिक मिसालों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों से भी जुड़ा हुआ है।सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व फैसलों के आधार पर यह स्पष्ट किया कि वेतन-समानता का दावा करते समय केवल पदनाम या काम की समानता पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। यह दृष्टिकोण भविष्य के सेवा-विवादों में भी महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सबसे व्यापक संदेश यही है कि संविधान के पुराने सिद्धांतों को बदलती प्रशासनिक और सामाजिक वास्तविकताओं के संदर्भ में समझा जाता है।पिछली सदी में समान काम, समान वेतन का सिद्धांत कर्मचारियों के शोषण और मनमाने वेतन-अंतर के खिलाफ महत्वपूर्ण सुरक्षा के रूप में विकसित हुआ। लेकिन आज सरकारी सेवा व्यवस्था कहीं अधिक जटिल है। संवर्गों में सीधी भर्ती, पदोन्नति, स्थानांतरण, वरिष्ठता, योग्यता और अनुभव की अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं।

ऐसे में सिर्फ यह पूछना कि ‘काम समान है या नहीं’ पर्याप्त नहीं हो सकता। सवाल यह भी है कि कर्मचारी वहां तक कैसे पहुंचा, उसकी योग्यता क्या है, उसका अनुभव कितना है और सेवा-नियम क्या कहते हैं।यह दृष्टिकोण समानता को कमजोर करने के बजाय उसके अर्थ को अधिक संदर्भपूर्ण बनाता है।इस फैसले के बाद सरकारों और विभागों के सामने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वेतनमान में अंतर स्पष्ट और वैध आधार पर हो। कर्मचारियों को भी यह समझना होगा कि समान कार्य का दावा करते समय केवल दैनिक जिम्मेदारियों की समानता पर्याप्त नहीं होगी।दूसरी ओर, सेवा-नियम इतने जटिल भी नहीं होने चाहिए कि कर्मचारी अपने अधिकारों को समझ ही न सकें। वेतन निर्धारण की प्रक्रिया जितनी स्पष्ट होगी, न्यायालयों में विवाद की संभावना उतनी ही कम होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समान काम के लिए समान वेतन को न तो हर वेतन-अंतर का स्वत: समाधान माना जाए और न ही अप्रासंगिक सिद्धांत समझा जाए। यह एक संवैधानिक मूल्य है, लेकिन उसका अनुप्रयोग तथ्यों और सेवा-नियमों पर निर्भर करता है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी को व्यापक संदर्भ में देखें तो संदेश साफ है. समानता का अर्थ हर कर्मचारी को हर परिस्थिति में समान वेतन देना नहीं है। समानता का अर्थ है कि समान परिस्थितियों में मौजूद लोगों के साथ बिना उचित कारण अलग व्यवहार न हो।