सरकारी सामान्य बीमा कंपनियाँ : पूंजी की संजीवनी या स्थायी समाधान की तलाश?

Government General Insurance Companies: Capital Savings or Seeking a Permanent Solution?

रावेल पुष्प

भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के सामान्य बीमा व्यवसाय के सामने खड़ा संकट अब केवल कुछ सरकारी कंपनियों के लाभ-हानि का विषय नहीं रह गया है। यह प्रश्न करदाता के धन, करोड़ों पॉलिसीधारकों के हित, सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका और देश की वित्तीय स्थिरता से जुड़ गया है। चार सरकारी सामान्य बीमा कंपनियाँ—नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, न्यू इंडिया एश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस—आज भी देश के बीमा बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। 1972 में सामान्य बीमा व्यवसाय के राष्ट्रीयकरण के बाद 107 बीमा कंपनियों को इन चार प्रमुख कंपनियों में समाहित किया गया था।

समस्या यह है कि चारों कंपनियों की वित्तीय स्थिति एक जैसी नहीं है। न्यू इंडिया एश्योरेंस अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है, जबकि नेशनल, ओरिएंटल और यूनाइटेड इंडिया लंबे समय से solvency की चुनौती से जूझ रही हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में न्यू इंडिया एश्योरेंस ने लगभग ₹1,384 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया, जबकि यूनाइटेड इंडिया को लगभग ₹4,839 करोड़, ओरिएंटल इंश्योरेंस को लगभग ₹4,061 करोड़ और नेशनल इंश्योरेंस को लगभग ₹2,534 करोड़ का घाटा हुआ। तीनों कंपनियों का संयुक्त घाटा ₹11,400 करोड़ से अधिक रहा।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 31 मार्च 2026 को नेशनल इंश्योरेंस का solvency ratio लगभग -1.10, ओरिएंटल का -1.60 और यूनाइटेड इंडिया का -1.40 था। इसके विपरीत न्यू इंडिया एश्योरेंस का ratio 1.84 था।

प्रश्न है कि Solvency margin आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है।

बीमा कंपनी के लिए केवल लाभ कमाना पर्याप्त नहीं है। उसका सबसे महत्वपूर्ण दायित्व भविष्य में पॉलिसीधारकों के दावों का भुगतान करना है। इसलिए उसके पास संभावित जोखिमों और अप्रत्याशित दावों को झेलने के लिए पर्याप्त पूंजी होनी चाहिए।

IRDAI के framework में insurers के लिए control-level solvency ratio 1.50 times रखा गया है। इसका अर्थ है कि बीमाकर्ता को अपने जोखिमों के मुकाबले पर्याप्त solvency cushion बनाए रखना होगा। IRDAI स्वयं स्पष्ट करता है कि insurer को हर समय 1.50 का control-level solvency बनाए रखना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर shareholder को अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध करानी होती है।

इसलिए किसी कंपनी का accounting profit और उसकी solvency दो अलग-अलग बातें हैं।

Profitability आज की कमाई बताती है; solvency भविष्य की देनदारियों को पूरा करने की क्षमता।
यही अंतर सरकारी सामान्य बीमा कंपनियों की वर्तमान समस्या को समझने की कुंजी है।
अब हम ये‌ देखें कि क्या सरकार ने पहले भी इन कम्पनियों को बचाने के लिए पूंजी डाली?
उत्तर यही है कि डाली है—और पर्याप्त मात्रा में डाली है।
2020 में केंद्र सरकार ने नेशनल, ओरिएंटल और यूनाइटेड इंडिया में कुल ₹12,450 करोड़ के capital infusion को मंजूरी दी थी। सरकार ने स्वयं कहा था कि इस पूंजी का उद्देश्य उनकी वित्तीय एवं solvency स्थिति सुधारना, risk management मजबूत करना और profitable growth को बढ़ावा देना है। उसी समय सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि तत्कालीन परिस्थितियों में प्रस्तावित merger को रोककर कंपनियों की solvency और profitable growth पर ध्यान दिया जाएगा।

यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—
यदि पूंजी डालने के बाद कुछ वर्षों में तीनों कंपनियाँ फिर solvency संकट में पहुँच जाती हैं, तो क्या केवल और पूंजी डालना स्थायी समाधान हो सकता है?

इसका उत्तर उतना सहज नहीं है।

पूंजी किसी बीमार बीमा कंपनी को समय दे सकती है; लेकिन यदि underwriting business लगातार घाटे में है, pricing कमजोर है, claims का दबाव अधिक है और administrative cost ऊँची है, तो नई पूंजी भी धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है।

अर्थात—

Capital infusion आवश्यक हो सकता है, लेकिन वह structural reform का विकल्प नहीं है।

2018 में सरकार ने इन कम्पनियों के merger का रास्ता क्यों चुना था?

यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार स्वयं एक समय merger को समाधान का हिस्सा मान चुकी है।

2018 के बजट में सरकार ने National Insurance, United India और Oriental Insurance को एक single insurance entity में मिलाने की घोषणा की थी। सरकार ने कहा था कि merger से infrastructure का प्रभावी उपयोग होगा और solvency margin में सुधार की संभावना होगी। बाद में इस merged entity को stock exchange में सूचीबद्ध करने की योजना भी थी।

लेकिन 2020 में सरकार ने merger प्रक्रिया रोक दी और capital infusion तथा profitable growth को प्राथमिकता दी।

लगभग छह वर्ष बाद स्थिति को देखते हुए यह प्रश्न फिर विकराल बनकर सामने खड़ा है—

क्या उस समय merger को स्थगित करना सही रणनीति थी, या अब परिस्थितियाँ सरकार को उसी विकल्प पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर रही हैं?

चार सरकारी कंपनियाँ—एक ही मालिक, फिर भी आपस में प्रतिस्पर्धा
यह समस्या का एक कम चर्चित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है।

चारों कंपनियों का स्वामित्व सरकार के पास है, लेकिन वे बाजार में एक-दूसरे से भी प्रतिस्पर्धा करती हैं। यदि यह competition स्वस्थ pricing और बेहतर service के आधार पर हो तो इसका लाभ उपभोक्ता को मिल सकता है। लेकिन यदि market share हासिल करने के लिए premium को अनावश्यक रूप से कम किया जाए, तो इसका परिणाम underwriting losses के रूप में सामने आएगा ही।

आज के संकट की व्याख्या करते हुए उद्योग विश्लेषणों में कमजोर pricing discipline, खराब business mix, लगातार ऊँचे claims और volume के लिए discounting को प्रमुख कारणों में गिना गया है।

इसका अर्थ है कि समस्या केवल पूंजी की नहीं, business model की भी है।

New India Assurance की स्थिति अलग क्यों है?

चारों सरकारी कंपनियों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा।

New India Assurance वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग ₹1,384 करोड़ के लाभ और 1.84 के solvency ratio के साथ बाकी तीन कंपनियों से स्पष्ट रूप से बेहतर स्थिति में है। कंपनी के अपने financial disclosures में भी 31 मार्च 2026 तक ₹1,384 करोड़ का net profit और लगभग ₹23,619 करोड़ का net worth दर्ज है।

लेकिन यहाँ भी अति-आशावादी होने की जरूरत नहीं है। जुलाई 2026 की रिपोर्टिंग के अनुसार New India का जून 2026 quarter भी claims के दबाव में चुनौतीपूर्ण रहा और उसका combined ratio 121.44% तक पहुँच गया।

अर्थात New India मजबूत है, लेकिन उसे भी underwriting discipline की समस्या से पूरी तरह मुक्त नहीं माना जा सकता।

RBI की चिंता क्यों महत्वपूर्ण है?
अब यह विषय केवल Ministry of Finance या IRDAI तक सीमित नहीं है।

RBI की Financial Stability Report में तीन सरकारी सामान्य बीमा कंपनियों की solvency स्थिति पर चिंता सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार FY2025 और FY2026 के प्रत्येक quarter में इन तीनों की solvency regulatory threshold 1.5 से नीचे रही।

इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि insurance sector वित्तीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी बड़ी बीमा कंपनी की वित्तीय कमजोरी अंततः policyholders, creditors, shareholders और सरकारी खजाने पर असर डाल सकती है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि— “कंपनी को बचाया जाए या नहीं?”

बल्कि यह है— “उसे किस प्रकार बचाया जाए कि बार-बार taxpayer के पैसे की जरूरत न पड़े?”

IRDAI का दृष्टिकोण : कंपनी बड़ी हो या छोटी, solvency जरूरी
IRDAI का मुख्य उद्देश्य ownership structure तय करना नहीं, बल्कि policyholders की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

नियामक की दृष्टि से चाहे कंपनी सरकारी हो या निजी, उसे पर्याप्त capital और solvency बनाए रखनी ही होगी। IRDAI का 1.50 का control-level solvency requirement इसी दृष्टिकोण का हिस्सा है।

इसलिए किसी merger को केवल इसलिए उचित नहीं माना जा सकता कि उससे कंपनी बहुत बड़ी हो जाएगी।

बड़ी कंपनी जरूरी नहीं कि मजबूत कंपनी भी हो।

यदि चार कमजोर operational systems को जोड़कर एक बड़ा संगठन बना दिया जाए और underwriting, pricing तथा claims की समस्याएँ जस की तस रहें, तो merger केवल आकार बढ़ाएगा, बीमारी नहीं मिटाएगा।

फिर merger के पक्ष में तर्क क्या है?

Merger के पक्ष में कई मजबूत तर्क हैं।

पहला—scale
एक बड़ी कंपनी के पास बड़े स्तर पर procurement, technology, reinsurance, actuarial analysis और risk management की क्षमता होगी।
दूसरा—duplication में कमी
चार अलग-अलग headquarters, IT systems, administrative structures और overlapping branch networks की जगह एक integrated structure बनाया जा सकता है।
तीसरा—capital का बेहतर उपयोग
सरकार को चार कंपनियों की अलग-अलग capital requirements पूरी करने के बजाय एक consolidated balance sheet के आधार पर निर्णय लेने का अवसर मिलेगा।
चौथा—market power
एक बड़ा public-sector insurer private-sector companies के सामने अधिक प्रभावी प्रतिस्पर्धा कर सकता है।
पाँचवाँ—राष्ट्रीय स्तर का insurer
सरकारी सामान्य बीमा क्षेत्र में एक मजबूत public-sector institution की कल्पना लंबे समय से मौजूद रही है।
2018 में सरकार का प्रस्ताव भी तीन कंपनियों को मिलाकर एक entity बनाने का था और उसने merger से infrastructure के बेहतर उपयोग तथा solvency सुधार की संभावना बताई थी।
लेकिन merger के विरुद्ध भी गंभीर तर्क हैं
सबसे बड़ा प्रश्न है—
क्या मजबूत New India Assurance को तीन कमजोर कंपनियों के साथ मिलाना उचित होगा?
यदि एक financially healthy company को तीन financially stressed companies के साथ मिला दिया जाए, तो कमजोर balance sheets का बोझ मजबूत कंपनी पर आ सकता है।
दूसरा प्रश्न कर्मचारियों का है। Branch rationalisation, overlapping posts, transfer और manpower restructuring जैसे मुद्दे सामने आएँगे।
तीसरा प्रश्न integration cost का है। चार अलग-अलग IT, HR, accounting और operational systems को एक करना स्वयं बहुत महँगा और जटिल काम होगा।
इसलिए merger कोई जादुई छड़ी नहीं है।
कर्मचारी यूनियनों का पक्ष
यहाँ एक रोचक तथ्य है। सरकार के बाहर केवल अर्थशास्त्री या विश्लेषक ही merger की बात नहीं कर रहे।
General Insurance Employees’ All India Association ने अगस्त 2024 में वित्त मंत्री को दिए अपने memorandum में चारों PSU general insurance companies—National, New India, Oriental और United India—को एक single unified entity में मिलाने की मांग की थी।
यूनियन का दृष्टिकोण मूलतः यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनियों को कमजोर करके या अलग-अलग करके नहीं, बल्कि एक मजबूत सार्वजनिक संस्था के रूप में पुनर्गठित किया जाए।
यह दृष्टिकोण privatization की अपेक्षा consolidation को प्राथमिकता देता है।
हालाँकि कर्मचारी संगठनों की दृष्टि में रोजगार-सुरक्षा एक प्रमुख मुद्दा है, जबकि सरकार के लिए efficiency और financial sustainability भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए merger होने की स्थिति में workforce restructuring को चरणबद्ध और न्यायपूर्ण ढंग से करना होगा।
सरकार के सामने तीन रास्ते
वर्तमान स्थिति में सरकार के सामने मोटे तौर पर तीन विकल्प दिखाई देते हैं।
पहला रास्ता : केवल recapitalisation
सरकार पूंजी डालती रहे और कंपनियों को अलग-अलग चलाती रहे।
इसका लाभ यह है कि तत्काल solvency संकट से निपटा जा सकता है।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि यदि operating losses बने रहे तो कुछ वर्षों बाद फिर पूंजी की जरूरत पड़ेगी।
यह short-term stabilisation है, long-term solution नहीं।
दूसरा रास्ता : तीन कमजोर कंपनियों का merger
National + Oriental + United India को मिलाकर एक entity बनाई जाए और New India को अलग रखा जाए।
इसका लाभ यह हो सकता है कि New India की मजबूत balance sheet को कमजोर कंपनियों के साथ मिलाने का जोखिम न हो।
लेकिन तीन कमजोर entities को जोड़ने से अपने आप मजबूत business नहीं बन जाएगा।
सामान्य बीमा पेंशनर्स एसोसिएशन के एक कर्मठ नेता श्री बिजन बागची का स्पष्ट मत है कि चारों का strategic consolidation
चारों कंपनियों को एक राष्ट्रीय public-sector general insurer में मिलाया जाए।
यह सबसे बड़ा structural change होगा।
लेकिन इसके पहले स्वतंत्र actuarial और financial due diligence जरूरी होगी।
क्या चारों को एक कर देना ही सर्वोत्तम विकल्प है?
मेरी दृष्टि में “चार को एक करना” अपने आप में समाधान नहीं, लेकिन “चार को एक मजबूत, व्यावसायिक और उत्तरदायी संस्था में बदलना” एक गंभीर नीति विकल्प जरूर है।
Merger के साथ निम्नलिखित सुधार अनिवार्य होंगे—
वैज्ञानिक risk-based pricing;
underwriting में कठोर अनुशासन;
claims का data-driven management;
insurance fraud पर प्रभावी नियंत्रण;
actuarial assessment को वास्तविक business decisions से जोड़ना;
IT systems का integration;
duplicate offices का तार्किक पुनर्गठन;
manpower का rational deployment;
performance-based accountability;
professional और commercially empowered management;
सरकारी योजनाओं के लिए अलग और पारदर्शी compensation mechanism।
अंतिम बिंदु विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
यदि सरकार किसी सरकारी insurer से सामाजिक या सरकारी नीति के कारण ऐसा business करवाती है जो commercially viable नहीं है, तो उसका पूरा भार कंपनी के खाते पर नहीं डाला जाना चाहिए। सरकार को उस सामाजिक दायित्व के लिए transparent budgetary compensation देना चाहिए।
Asset valuation और solvency का नया प्रश्न
तीनों कंपनियों की negative solvency को देखते हुए एक दूसरा प्रश्न भी उठता है।
कंपनियों की कुछ पुरानी investments और assets का book value और उनका वर्तमान market value अलग हो सकता है। United India की ओर से यह तर्क भी सामने आया कि पुराने investments के market values अधिक होने के कारण वास्तविक financial buffer पारंपरिक solvency calculation से बेहतर हो सकता है।
यह एक महत्वपूर्ण technical issue है, लेकिन इसे operating losses का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
Asset revaluation balance sheet सुधार सकती है; खराब underwriting को नहीं।
इसीलिए solvency को वास्तविक risk profile से जोड़ने वाली risk-based capital व्यवस्था आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगी।
क्या taxpayer को बार-बार भुगतान करना चाहिए?
यह सबसे कठिन नैतिक और आर्थिक प्रश्न है।
सरकार यदि किसी public-sector insurer को बचाती है तो उसका उद्देश्य केवल कंपनी बचाना नहीं होना चाहिए; उद्देश्य policyholders की सुरक्षा और सार्वजनिक हित होना चाहिए।
लेकिन यदि कोई insurer लगातार घाटा करता है, solvency requirement पूरी नहीं करता और हर कुछ वर्षों में taxpayer capital मांगता है, तो सरकार को यह पूछना ही होगा—
“क्या हम बीमारी का इलाज कर रहे हैं या केवल उसका खर्च उठा रहे हैं?”
एक बार का recapitalisation उचित हो सकता है।
दूसरी बार भी परिस्थितियों के कारण उचित हो सकता है।
लेकिन बार-बार recapitalisation बिना structural reform के moral hazard पैदा कर सकता है—अर्थात management को यह भरोसा हो सकता है कि अंततः सरकार पूंजी उपलब्ध करा देगी।
एक संभावित व्यावहारिक मॉडल
सरकार को किसी जल्दबाजी के बजाय पाँच-चरणीय योजना पर विचार करना चाहिए।
पहला चरण : चारों कंपनियों की स्वतंत्र forensic तथा actuarial assessment।
दूसरा चरण : प्रत्येक product line की profitability का विश्लेषण—motor, health, fire, marine, agriculture आदि।
तीसरा चरण : यह पता लगाना कि कौन-सा loss commercial underwriting की वजह से है और कौन-सा सरकारी/social obligation की वजह से।
चौथा चरण : capital support को measurable performance conditions से जोड़ना।
पाँचवाँ चरण : दो-तीन वर्षों के भीतर consolidation/merger पर अंतिम निर्णय।
इससे merger राजनीतिक घोषणा न रहकर आर्थिक निर्णय बनेगा।
सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त करना समाधान नहीं
यह भी समझना जरूरी है कि सरकारी सामान्य बीमा कंपनियों की समस्याओं का अर्थ यह नहीं कि सार्वजनिक क्षेत्र की आवश्यकता समाप्त हो गई।
भारत जैसे विशाल देश में insurance केवल commercial product नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र, कृषि, प्राकृतिक आपदा, सामाजिक सुरक्षा, सरकारी योजनाएँ और economically vulnerable वर्गों के लिए public-sector insurance की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इसलिए सवाल होना चाहिए—
“Public sector रहे या न रहे?”
से अधिक महत्वपूर्ण सवाल है—
“Public sector किस रूप में financially sustainable रह सकता है?”
निष्कर्ष : पूंजी से आगे बढ़ने का समय
भारत की सरकारी सामान्य बीमा कंपनियों के सामने आज जो स्थिति है, वह सरकार के लिए एक अवसर भी है।
एक ओर तीन कंपनियों की solvency गंभीर रूप से कमजोर है और FY2026 में उनका संयुक्त घाटा ₹11,400 करोड़ से अधिक रहा; दूसरी ओर New India Assurance अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है।
ऐसी परिस्थिति में केवल और पूंजी डालना तत्काल संकट को टाल सकता है, लेकिन स्थायी समाधान की गारंटी नहीं देता।
2018 में सरकार स्वयं तीन सरकारी सामान्य बीमा कंपनियों के merger को infrastructure के बेहतर उपयोग और solvency सुधार से जोड़ चुकी है। 2020 में merger रोककर capital infusion और profitable growth को प्राथमिकता दी गई थी।
आज के अनुभव के बाद उस नीति की पुनः समीक्षा स्वाभाविक और आवश्यक है।
मेरी दृष्टि में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि merger को लक्ष्य नहीं, साधन माना जाए।
दरअसल बीमा क्षेत्र में सबसे बड़ी पूंजी केवल पैसा नहीं होती—विश्वास होता है। और पॉलिसीधारक का विश्वास तभी कायम रह सकता है जब उसे यह भरोसा हो कि जिस कंपनी को उसने अपना जोखिम सौंपा है, वह आज भी सक्षम है और कल भी उसके दावे का भुगतान करने की स्थिति में होगी।