सिद्धांत की राजनीति, जनशक्ति पर जेपी के विचारों पर चर्चा

Discussion on JP's views regarding the politics of principles and people's power

रत्नज्योति दत्ता

नई दिल्ली: समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की राजनीतिक विरासत और लोकतंत्र, जनशक्ति तथा नैतिक राजनीति पर उनके विचारों की मौजूदा प्रासंगिकता पर एक नई जीवनी के विमोचन के दौरान चर्चा हुई।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) ने बुधवार को ‘जयप्रकाश नारायण: द पीपुल्स लीडर’ पुस्तक का विमोचन किया। अरविंदर सिंह द्वारा लिखित और नियोगी बुक्स द्वारा Pioneers of Modern India श्रृंखला के तहत प्रकाशित इस पुस्तक के विमोचन के बाद एक परिचर्चा भी आयोजित की गई।

पुस्तक में क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी चिंतक के रूप में नारायण की यात्रा को रेखांकित करते हुए मार्क्सवाद और गांधीवादी दर्शन से उनके शुरुआती जुड़ाव से लेकर सत्ता और प्राधिकार की उनकी मुखर आलोचना तक के बौद्धिक विकास को सामने रखा गया है। इसमें स्वतंत्र भारत के कुछ प्रमुख राजनीतिक आंदोलनों में उनकी भूमिका का भी उल्लेख है।

सिंह ने कहा कि जीवन में जेपी की राजनीतिक यात्रा को न तो ‘हैजियोग्राफी’ (अत्यधिक महिमामंडन) के रूप में और न ही अभियोग के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। “यह पुस्तक न तो hagiography है और न ही indictment,” बल्कि यह “राजनीति में अंतरात्मा और उस लोकतंत्र की कहानी है, जिसकी परीक्षा हुई और जिसका पुनर्नवीकरण हुआ,” उन्होंने कहा।

देहरादून निवासी लेखक, स्वतंत्र पत्रकार और साहित्य समीक्षक सिंह तीन दशक से अधिक समय से विभिन्न विषयों पर लिखते रहे हैं। उन्होंने ‘Morarji Desai: A Profile in Courage’ भी लिखी है।

जयप्रकाश नारायण, जिन्हें लोकप्रिय रूप से जेपी कहा जाता है, भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे। बाद में वह 1974-75 के जेपी आंदोलन के प्रमुख नेता बने, जिसने भ्रष्टाचार, शासन और राजनीतिक जवाबदेही के मुद्दों पर छात्रों और विपक्षी समूहों को लामबंद किया। उनका ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान आंदोलन का प्रमुख नारा बना और इसने भारतीय राजनीति की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करने वाले और द हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा ने कहा, “यह पुस्तक उस दौर को याद करने में मदद करेगी।”

परिचर्चा में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद और बीबीसी उर्दू सेवा के पूर्व प्रमुख कुरबान अली ने भाग लिया।

परिचर्चा में लोकतांत्रिक संस्थाओं, राजनीतिक जवाबदेही, विकेंद्रीकरण और नैतिक नेतृत्व को लेकर जारी बहस के संदर्भ में जेपी के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर भी चर्चा हुई। जनभागीदारी, राजनीतिक नैतिकता और सत्ता के केंद्रीकरण के प्रतिरोध पर उनका जोर आज के राजनीतिक विमर्श में भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बना हुआ है।