स्वतंत्रता की चौखट पर विभाजन की टीस और एक अखंड भविष्य का मार्ग

The pang of partition on the threshold of independence and the path to an undivided future

अशोक भाटिया

भारत के इतिहास में 15 अगस्त का दिन जहाँ एक तरफ विदेशी दासता की सदियों पुरानी बेड़ियों को काटने और एक संप्रभु, लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में उभरने के असीम गौरव का प्रतीक है, वहीं इसके ठीक एक दिन पहले का दिन यानी 14 अगस्त, हमारे सामूहिक इतिहास के सबसे गहरे, अमिट और रक्तरंजित जख्म का स्मरण कराता है। देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर जब पूरा राष्ट्र उत्सव और उमंग की तैयारियों में डूबा है, तब देश के प्रधानमंत्री द्वारा विभाजन के दर्द को फिर से याद करना महज़ एक औपचारिक राजनीतिक वक्तव्य नहीं है। यह एक राष्ट्र के रूप में हमारे आत्मनिरीक्षण, ऐतिहासिक भूलों से सीख और राष्ट्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखने के संकल्प का सामूहिक आह्वान है। यह समय आज़ादी के उल्लास को मनाने के साथ-साथ उस कीमत को भी याद करने का है जो इस देश के लाखों बेगुनाह नागरिकों ने अपनी जान और आशियाने गंवाकर चुकाई थी।

साल 1947 का अगस्त महीना भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक ऐसा अभूतपूर्व विरोधाभास लेकर आया था, जिसकी मिसाल आधुनिक विश्व इतिहास में कहीं और नहीं मिलती। एक तरफ सदियों के लंबे संघर्ष, अनगिनत क्रांतियों, अनूठे आंदोलनों और स्वतंत्रता सेनानियों के अप्रतिम तप के बाद देश में स्वाधीनता की नई सुबह अंगड़ाई ले रही थी, तो दूसरी तरफ राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों की ‘बांटो और राज करो’ की कुटिल नीति ने देश के भूगोल पर एक ऐसी लकीर खींच दी, जिसने जमीन से ज्यादा इंसानी दिलों को बेरहमी से काट दिया। 1947 का वह विभाजन केवल दो नए देशों की राजनीतिक सीमाओं का निर्धारण नहीं था, बल्कि यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे दर्दनाक और सबसे अराजक विस्थापन था। रातों-रात करोड़ों लोग अपनी ही उस जन्मभूमि पर पराये और बेघर हो गए जहाँ उनकी पीढ़ियों की यादें दफन थीं। जिन गलियों और आबो-हवा में उन्होंने बचपन बिताया था, उन्हें एक झटके में छोड़कर सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए अनजानी और असुरक्षित मंजिलों की ओर भागना पड़ा।

ऐतिहासिक और प्रशासनिक आंकड़े बताते हैं कि इस मानवीय त्रासदी के दौरान लगभग दो करोड़ लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ना पड़ा और लाखों-लाख निर्दोष नागरिकों को सांप्रदायिक नफरत की वेदी पर अपनी जान गंवानी पड़ी। वह एक ऐसा भयावह दौर था जब ट्रेनें लाशों से भरकर आ रही थीं, जलते हुए घर इंसानी बस्तियों के खाक होने की गवाही दे रहे थे और नफरत की आग में पूरा पंजाब, बंगाल और देश के कई हिस्से सुलग रहे थे। यह वह ऐतिहासिक सत्य और दर्द है जिसे शब्दों के किसी भी जाल में पूरी तरह समेटना असंभव है। प्रधानमंत्री ने इसी विभीषिका को याद कर देश की सोई हुई चेतना को झकझोरा है ताकि हम आज़ादी की इस खुली हवा की असली कीमत को कभी कम न आंकें।

इसी ऐतिहासिक घाव को सम्मान देने और उससे सीख लेने के लिए साल 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। शुरुआती दौर में कुछ राजनीतिक और सामाजिक हलकों में इस बात पर बहस भी हुई कि आज़ादी के महान जश्न के ठीक एक दिन पहले इतने कड़वे और दर्दनाक इतिहास को खंगालने की क्या आवश्यकता है? क्या इससे पुरानी नफरत और दूरियां फिर से हरी नहीं हो जाएंगी? लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, इस दिवस के पीछे छुपा गहरा राष्ट्रीय दर्शन और इसकी प्रासंगिकता समाज के सामने पूरी तरह स्पष्ट हो गई। किसी भी जीवंत और दूरदर्शी राष्ट्र के लिए अपने इतिहास के केवल गौरवशाली, विजयी और चमकीले पन्नों को याद रखना ही काफी नहीं होता; बल्कि उसे अपने इतिहास के सबसे अंधकारमय, क्रूर और असहज करने वाले अध्यायों का सामना करने का साहस भी दिखाना पड़ता है। जो राष्ट्र अपने अतीत के घावों को छिपाता है, वह भविष्य में उनके दोबारा हरा होने का जोखिम उठाता है।

इस स्मृति दिवस को मनाने के पीछे मुख्य रूप से तीन गहरे राष्ट्रीय उद्देश्य छिपे हैं। पहला उद्देश्य उन लाखों बेगुनाह और गुमनाम नागरिकों के प्रति एक राष्ट्र के रूप में सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करना है, जिन्हें इतिहास की इस सबसे बड़ी भूल की वजह से असमय मौत के मुंह में जाना पड़ा। दशकों तक देश ने आज़ादी के बड़े-बड़े समारोह तो मनाए, लेकिन विभाजन की हिंसा में मारे गए उन साधारण परिवारों को वह राष्ट्रीय सम्मान और जगह नहीं मिल सकी जिसके वे हकदार थे। दूसरा उद्देश्य उस मानवीय जज्बे और अदम्य साहस को सलाम करना है, जो उन शरणार्थियों ने दिखाया जो अपना सब कुछ पाकिस्तान में छोड़कर खाली हाथ भारत आए थे। उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों, गरीबी और शिविरों के अपमानजनक दौर के बावजूद हार नहीं मानी। उन्होंने शून्य से अपने जीवन की शुरुआत की, अपनी मेहनत और लगन से न केवल खुद को पैरों पर खड़ा किया बल्कि आज के आधुनिक भारत के नवनिर्माण में भी एक मजबूत रीढ़ की हड्डी बनकर उभरे। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य हमारी आने वाली नई पीढ़ी के लिए एक निरंतर चेतावनी के रूप में कार्य करना है, जो उन्हें यह याद दिलाता रहे कि जब नफरत, कट्टरता और सामाजिक विभाजन चरम पर पहुंचते हैं, तो उसका अंत कितना भयानक और विनाशकारी होता है। यह एक ऐसी सीख है जो हमें वर्तमान में वैसी गलतियाँ करने से रोकती है।

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने अपनी बात में जिस सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पर जोर दिया, वह है समाज से सामाजिक विभाजन और नफरत के जहर को पूरी तरह खत्म करना, तथा देश के भीतर एकता, भाईचारे और आपसी सद्भाव को मजबूत करना। आज जब भारत अपनी आज़ादी के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है और वैश्विक पटल पर एक बड़ी आर्थिक तथा रणनीतिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, तब हमारी आंतरिक सुरक्षा और हमारा सामाजिक ताना-बाना ही देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। विश्व का इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी राष्ट्र के भीतर धर्म, जाति, क्षेत्र या भाषा के नाम पर दरारें पैदा हुई हैं, तब-तब बाहरी ताकतों ने उसका फायदा उठाकर उस देश को कमजोर किया है। 1947 का विभाजन भी हमारी इसी आंतरिक फूट, आपसी अविश्वास और ब्रिटिश हुक्मरानों की गहरी साजिश का संयुक्त परिणाम था।

आज के आधुनिक संदर्भ में विभाजन के इस दर्द को याद करने का मतलब यह कतई नहीं है कि हम अतीत के प्रतिशोध या कड़वाहट में जिएं, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ यह है कि हम वर्तमान में सक्रिय उन ताकतों और प्रवृत्तियों को पहचानें जो हमारे समाज को फिर से बांटने का प्रयास कर रही हैं। चाहे वह सोशल मीडिया पर फैलने वाली फेक न्यूज और नफरत हो, या फिर राजनीतिक लाभ के लिए किया जाने वाला ध्रुवीकरण, भारत को इन सभी संकीर्णताओं से ऊपर उठना होगा। विभिन्नताओं, विविध संस्कृतियों और अनेक भाषाओं से भरे इस विशाल देश में ‘विविधता में एकता’ केवल किताबों में लिखा जाने वाला कोई मुहावरा नहीं है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। यदि हम आंतरिक रूप से बंटे रहेंगे, तो हम कभी भी एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं कर पाएंगे।

80वें स्वतंत्रता दिवस के इस ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण पड़ाव पर जब हम खड़े हैं, तो विभाजन की यह टीस हमें एक मजबूत, पूरी तरह आत्मनिर्भर और सुरक्षित भारत बनाने की प्रेरणा देती है। यह हमें याद दिलाती है कि एक ऐसा भारत बनाना कितना जरूरी है जो अपनी सीमाओं की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हो, ताकि भविष्य में कभी भी किसी भी बाहरी या आंतरिक दुश्मन में देश के टुकड़े करने या इसकी संप्रभुता को चुनौती देने का दुस्साहस न हो। ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना तभी जमीन पर साकार हो सकती है जब कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक रहने वाला हर नागरिक खुद को किसी भी अन्य संकीर्ण पहचान से पहले एक सच्चा भारतीय माने। यह दर्द हमें सिखाता है कि जब राष्ट्रीय हित और देश की सुरक्षा को गौण कर दिया जाता है और व्यक्तिगत या दलीय हित हावी हो जाते हैं, तो राष्ट्र को उसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

अंततः, विभाजन के दर्द का छलकना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सात दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी हमारी राष्ट्रीय चेतना पर वह जख्म पूरी तरह भरा नहीं है, और न ही इसे भुलाया जाना चाहिए। लेकिन इस ऐतिहासिक स्मृति का उपयोग समाज में नफरत या प्रतिशोध की भावना को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और सच्चे राष्ट्रवाद की भावना को सींचने के लिए किया जाना चाहिए। आजादी के 80वें वर्ष में प्रवेश करते हुए भारत के पास दुनिया को शांति और प्रगति की राह दिखाने का एक अनूठा और ऐतिहासिक अवसर है। हमें एक ऐसे समरस समाज का निर्माण करना है जहाँ किसी भी नागरिक को भयभीत न होना पड़े, जहाँ न्याय, बंधुत्व और समानता के संवैधानिक सिद्धांत सर्वोपरि हों। विभाजन की विभीषिका में अपनी जान गंवाने वाली उन लाखों पवित्र आत्माओं के प्रति हमारी सच्ची और वास्तविक श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सब मिलकर एक ऐसा अखंड, समृद्ध, वैज्ञानिक सोच से लैस और समरस भारत बनाएं जो आने वाली सदियों तक पूरी मानवता को शांति और सह-अस्तित्व का संदेश देता रहे।