हुकुमचंद नारद — जब एक जीवन, पत्रकारिता का संविधान बन गया

Hukumchand Narad — When a life became the constitution of journalism

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

किसी राष्ट्र का इतिहास केवल राजसत्ताओं, आंदोलनों और युद्धों से नहीं बनता; उसे दिशा वे व्यक्तित्व देते हैं, जो अपने समय के नैतिक विवेक बनकर खड़े होते हैं। हुकुमचंद नारद ऐसे ही विरल व्यक्तित्व थे, जिन्होंने कलम को शब्दों का माध्यम नहीं, जनविश्वास का दायित्व माना। 14 जनवरी 1902 को मप्र के सतना (तत्कालीन रीवा रियासत) में मूलचंद जी और मथुराबाई के घर जन्मे इस कर्मयोगी ने जीवनसंगिनी माणिक बाई के साथ संघर्ष, सादगी और सामाजिक प्रतिबद्धता से भरा जीवन जिया। 26 नवंबर 1953 को जबलपुर में उनका सांसारिक जीवन अवश्य थम गया, किंतु उनके विचारों का प्रकाश आज भी उतना ही प्रखर है।

समय ने उनके व्यक्तित्व को और विराट बनाया। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर ने जुलाई 2026 से एम.जे.एम.सी. पाठ्यक्रम के “मीडिया का इतिहास” विषय में उनके जीवन और कृतित्व को शामिल किया है। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में उनके नाम पर पत्रकारिता पीठ की स्थापना की घोषणा भी सिद्ध करती है कि इतिहास उन्हीं व्यक्तित्वों के विचारों को संस्थागत स्वरूप देता है, जिन्होंने सत्ता से पहले समाज, सुविधा से पहले सत्य, भय से पहले कर्तव्य और जनपक्षधरता को सर्वोच्च धर्म माना। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, उस पत्रकारिता-दर्शन का है, जो सिखाता है कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी शक्ति शब्द नहीं, चरित्र होता है।

हुकुमचंद नारद ने पत्रकारिता को केवल समाचार नहीं, समाज की आवाज़ बनाया। जबलपुर के लोकमत, शुभचिंतक और सारथी से शुरू उनकी यात्रा लीडर, भारत, अमृत बाजार पत्रिका, हिंदुस्तान स्टैंडर्ड, दैनिक विश्वामित्र, हितवाद, नागपुर टाइम्स, हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन न्यूज क्रॉनिकल तक पहुँची। पटना, लखनऊ और बंबई तक उनकी लेखनी जनमत को दिशा देती रही। एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया (वर्तमान पीटीआई) के प्रतिनिधि, हिंदी पंच के संस्थापक और सारथी-शुभचिंतक के नगर प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने पत्रकारिता को जनचेतना बनाया। उनके शब्दों में आक्रोश था, पर कटुता नहीं; संवेदना थी, पर दुर्बलता नहीं; निर्भीकता थी, पर अहंकार नहीं। वे जानते थे—कलम बिकती है तो समाज मौन होता है, सत्य लिखती है तो इतिहास बदलता है।

सत्य के पक्ष में खड़े होने का उदाहरण 1935 का जबलपुर समीप करोड़ी कांड है। अंग्रेज सैनिकों द्वारा महिलाओं पर हुए अत्याचारों को सत्ता दबाना चाहती थी, किंतु हुकुमचंद नारद ने उन्हें राष्ट्र के सामने उजागर किया। धमकियों और दबाव के बावजूद वे अडिग रहे। उनके प्रस्तुत तथ्य और प्रमाण ब्रिटिश संसद तक पहुँचे, जिससे दोषी सैनिकों को दंड मिला। उनके साहस की राष्ट्रवादी पत्रकारिता और जनमानस ने सराहना की। यह केवल खोजी पत्रकारिता नहीं, भारतीय आत्मसम्मान की विजय थी। गरीब, पीड़ित और उपेक्षित उनके लिए राष्ट्र की आत्मा थे; उनकी कलम उसी आत्मा की आवाज़ थी।

राष्ट्रीय जीवन का कोई निर्णायक मोड़ ऐसा नहीं था, जहाँ हुकुमचंद नारद की उपस्थिति न रही हो। 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में प्रचार समिति के संयोजक के रूप में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के स्वागत हेतु 52 हाथियों की व्यवस्था की। स्थानीय इतिहास उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का प्रखर स्वर मानता है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिका के कारण उन्हें मुंबई से गिरफ्तार कर 6 अक्टूबर 1942 से 28 अप्रैल 1943 तक जबलपुर कारागार में रखा गया। कारावास उनके शरीर को बाँध सका, विचारों को नहीं; वे प्रखर, स्पष्ट व जनसमर्पित होकर निकले। उनके लिए स्वतंत्रता केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, निर्भीक विचार, अभिव्यक्ति की स्वाधीनता और नागरिक सम्मान का संकल्प थी।

जिस कलम ने समाज के अधिकारों की आवाज़ उठाई, वही पत्रकारों के अधिकारों के लिए भी खड़ी हुई। हुकुमचंद नारद ने पत्रकारिता को केवल विचार नहीं, श्रम और अधिकारों का दायित्व माना। उस समय पत्रकार अल्प वेतन, असुरक्षित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अभाव से जूझ रहे थे। नारद ने पत्रकार को श्रमजीवी मानते हुए वेतन, सुरक्षा और अधिकारों की आवाज़ उठाई। 1950 में वे अखिल भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संगठन के प्रमुख प्रेरक और महाकौशल इकाई के प्रथम अध्यक्ष बने। उनके प्रयासों ने श्रमजीवी दर्जा, यूनियनों, वेतन बोर्डों और पत्रकार अधिकारों की नींव रखी। इसी योगदान ने उन्हें “श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन का जनक” का सम्मान दिलाया।

हुकुमचंद नारद ने पत्रकारिता को पेशा नहीं, जनसेवा का आजीवन व्रत बनाया। अंतिम समय तक वे पीड़ितों, रोगियों और असहायों के साथ रहे। शायद ही कोई दिन बीता हो, जब वे किसी दुखी से मिलने अस्पताल न पहुँचे हों। उनके निधन के तीन वर्ष बाद, 1956 में जबलपुर के नागरिकों ने जनसहयोग से शासकीय विक्टोरिया अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर से संलग्न विश्राम कक्ष उनकी स्मृति में बनवाया, जिसे देश में किसी श्रमजीवी पत्रकार की स्मृति का पहला स्मारक माना जाता है। गुजरात के पूर्व राज्यपाल एवं नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत श्रीमन्नारायण अग्रवाल ने इसका उद्घाटन कर उसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दी।

हुकुमचंद नारद का जनसम्मान स्मारकों और संस्थाओं में साकार हुआ। जबलपुर नगर निगम ने “हुकुमचंद नारद मार्ग” का नामकरण किया। सिविक सेंटर स्थित उनकी कांस्य प्रतिमा का 3 मई 1999 को तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अनावरण किया। यह केवल प्रतिमा नहीं, सत्य और जनसेवा को समर्पित जनपक्षधर पत्रकारिता का सम्मान थी। इसी अवसर पर “स्मृतियों के रक्त पलाश” स्मारिका प्रकाशित हुई। भोपाल स्थित भारत के एकमात्र समाचार-पत्र संग्रहालय—माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय—में उनकी स्मृति में शोध कक्ष स्थापित है। प्रतिवर्ष “हुकुमचंद नारद पत्रकारिता पुरस्कार” प्रदान किया जाता है, जो सत्यनिष्ठ, निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता की प्रेरणा है।

जब भी पत्रकारिता मूल्यों की कसौटी पर परखी जाएगी, हुकुमचंद नारद का जीवन मानदंड होगा। उन्होंने सिद्ध किया कि पत्रकार का दायित्व सत्ता का नहीं, समाज का प्रहरी बनना है। निर्भीकता, नैतिकता और जनपक्षधरता का उनका आदर्श ही उन्हें कालजयी बनाता है। वे आज भी उस पत्रकार के पथप्रदर्शक हैं, जो सत्य को सुविधा से, जनहित को स्वार्थ से और राष्ट्रधर्म को हर दबाव से ऊपर रखता है। हुकुमचंद नारद केवल इतिहास का अध्याय नहीं, हिंदी पत्रकारिता की अमर चेतना हैं, जो हर युग से कहती रहेगी—”सत्य लिखो, निर्भय लिखो और जनता के साथ खड़े रहो।”