गांधी फैमिली की सनातन के प्रति पूर्वाग्रह सोच

Gandhi family's prejudiced thinking towards Sanatan

संजय सक्सेना

भारतीय राजनीति और इतिहास में नेहरू-गाँधी परिवार का प्रभाव दशकों तक रहा है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज के समय तक, इस परिवार के नेतृत्व में नीति-निर्माण और सांस्कृतिक विमर्श तय किए गए। आलोचकों और सांस्कृतिक विचारकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस परिवार की वैचारिक दिशा कभी भी सनातन संस्कृति के अनुकूल या उसके गौरव को बढ़ाने वाली नहीं रही। इस दृष्टिकोण के अनुसार, पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर वर्तमान में राहुल गाँधी तक, इस परिवार ने बार-बार ऐसे निर्णय लिए और बयान दिए जिन्हें सनातन संस्कृति को कमतर दिखाने या उसे चोट पहुँचाने के प्रयास के रूप में देखा जाता है। इसके विपरीत, अन्य धर्मों की सामाजिक कुरीतियों या कट्टरता पर इस परिवार का रुख अक्सर उदासीन या तुष्टिकरण से प्रेरित रहा है। हाल ही में पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में छात्राओं को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने सनातन के ग्रंथों पर निशाना साधा। उन्होंने मनुस्मृति के ९वें अध्याय के तीसरे श्लोक (‘पिता रक्षति कौमारे…’) का आधा-अधूरा हवाला देते हुए दावा किया कि यह ग्रंथ महिलाओं की स्वतंत्रता के खिलाफ है और इसे उन्होंने ‘शर्मनाक’ बताया। उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर ‘मनुस्मृति माइंडसेट’ रखने का आरोप लगाया। आलोचकों और विचारकों ने राहुल गाँधी के इस ज्ञान को बेहद निंदनीय और चयनात्मक बताया। सनातन समाज में आज कोई भी मनुस्मृति को कानूनी या व्यावहारिक संहिता नहीं मानता। इसके विपरीत, राहुल गाँधी ने जानबूझकर सनातन संस्कृति को महिला-विरोधी दिखाने के लिए इसका सहारा लिया, जबकि वे अन्य धर्मों के ग्रंथों (जैसे कुरान या बाइबिल) में महिलाओं को लेकर लिखी गई रूढ़िवादी बातों या बुर्का प्रथा जैसी कुरीतियों पर पूरी तरह चुप्पी साध जाते हैं।

नेहरू गांधी परिवार में सनातन धर्म को नीचा दिखाने की शुरुआत देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से ही शुरू हो गई थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू पश्चिमी विचारों और समाजवाद से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की वकालत की, लेकिन आलोचकों का मानना है कि उनकी धर्मनिरपेक्षता केवल बहुसंख्यक सनातन समाज पर लागू होती थी। स्वतंत्रता के बाद जब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने विदेशी आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया, तो नेहरू ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ का नाम दिया। जब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाने लगे, तो नेहरू ने उन्हें वहां जाने से मना करने की कोशिश की थी। यह घटना दर्शाती है कि नेहरू सनातन संस्कृति के गौरव की पुनर्स्थापना को लेकर असहज थे।नेहरू सरकार ने कथित रूप से हिंदू समाज की कुरीतियों को दूर करने और महिलाओं के अधिकारों के लिए हिंदू कोड बिल पारित किया। सामाजिक सुधार की दृष्टि से यह आवश्यक कदम हो सकता था, लेकिन नेहरू ने अन्य धर्मों, विशेषकर मुस्लिम समाज की कुरीतियों (जैसे बहुविवाह और तीन तलाक) को बदलने का कोई साहस नहीं दिखाया। शरीयत कानून को वैसे ही छोड़ दिया गया। आलोचकों के अनुसार, सुधार की यह चयनात्मक नीति केवल सनातन समाज को निशाना बनाने और दूसरों को तुष्ट करने की रणनीति थी।

इसी तरह श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनीति को मजबूत करने के लिए वामपंथी इतिहासकारों और विचारकों को देश के शैक्षणिक संस्थानों पर नियंत्रण दे दिया। इसके परिणामस्वरूप, भारत के इतिहास की पुस्तकों में सनातन संस्कृति, वेदों, उपनिषदों और महान हिंदू राजाओं (जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, चोल और विजयनगर साम्राज्य) के इतिहास को छोटा कर दिया गया, जबकि आक्रांताओं का महिमामंडन किया गया।राजीव गाँधी के कार्यकाल में भी सांस्कृतिक चेतना को आघात पहुँचाने वाले कई निर्णय लिए गए:उनके कार्यकाल में शाह बानो मामला (1986) में जब सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो नामक एक पीड़ित मुस्लिम महिला के पक्ष में गुजारा भत्ता देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया, तो राजीव गाँधी सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में आकर संसद में कानून बदलकर अदालत के फैसले को पलट दिया। यह अन्य धर्मों की कुरीतियों पर आँखें मूँदने और तुष्टिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण बना। राजीव गाँधी ने राजनीतिक लाभ के लिए अयोध्या में राम जन्मभूमि के ताले तो खुलवाए, लेकिन सनातन समाज की इस मुख्य आस्था को कभी पूर्ण न्याय देने का प्रयास नहीं किया।

वहीँ यूपीए सरकार के दौरान, सोनिया गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी का रुख सनातन संस्कृति के प्रति और अधिक आक्रामक हो गया। इस कालखंड में सनातन समाज की सहिष्णुता पर गहरे प्रहार किए गए। साल 2007 में ‘सामुद्रिक सेतु’ (राम सेतु) को बचाने के लिए चल रहे आंदोलन के बीच, यूपीए सरकार के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर किया। इसमें लिखा गया कि भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और रामायण के अन्य पात्र केवल पौराणिक कथाओं के हिस्से हैं और उनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। करोड़ो सनातनी हिंदुओं के आराध्य देव के अस्तित्व को नकारना इस परिवार की सांस्कृतिक समझ पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। राजनीतिक लाभ के लिए तत्कालीन गृह मंत्रालय और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने ‘भगवा आतंकवाद’ या ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसे शब्दों का आविष्कार किया। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित जैसे लोगों को वर्षों तक बिना ठोस सबूतों के जेल में प्रताड़ित किया गया। सदियों से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और शांति का संदेश देने वाली सनातन संस्कृति को वैश्विक स्तर पर हिंसक सिद्ध करने का यह आत्मघाती प्रयास था।वर्तमान में राहुल गाँधी इस परिवार की वैचारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि वे अतीत के नेताओं की तुलना में और अधिक खुले तौर पर, आक्रामक रूप से और कभी-कभी भ्रामक तथ्यों का सहारा लेकर सनातन संस्कृति को निशाना बना रहे हैं।संसद में ‘हिंदू’ समाज पर विवादित टिप्पणी (2024): संसद के भीतर विपक्ष के नेता के रूप में भाषण देते हुए राहुल गाँधी ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए एक ऐसी टिप्पणी की, जिसे पूरे हिंदू समाज का अपमान माना गया। उन्होंने कहा कि जो लोग खुद को हिंदू कहते हैं, वे चौबीसों घंटे हिंसा, नफरत और असत्य की बातें करते हैं। यद्यपि बाद में स्पष्टीकरण दिया गया कि उनका निशाना केवल एक राजनीतिक दल था, लेकिन सदन में जिस तरह से उन्होंने यह बात कही, उसने करोड़ों सनातनी भावनाओं को आहत किया।

मुंबई की एक जनसभा में राहुल गाँधी ने कहा कि ‘हिंदू धर्म में एक शब्द होता है ‘शक्ति’, हम उस शक्ति से लड़ रहे हैं।’ सनातन परंपरा में ‘शक्ति’ देवी स्वरूपा, चेतना और सात्विक ऊर्जा का प्रतीक है। राजनीतिक लड़ाई में सनातन के सबसे पवित्र प्रतीकों का ऐसा नकारात्मक उपयोग उनकी सोच को दर्शाता है।चुनावों के समय राहुल गाँधी कोट के ऊपर जनेऊ पहन लेते हैं, खुद को कश्मीरी पंडित बताते हैं और मंदिरों के चक्कर लगाते हैं। लेकिन चुनाव बीतते ही उनके सहयोगी डीएमके जब सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू, मलेरिया और कोरोना’ से करते हैं और उसे समूल नष्ट करने की बात करते हैं, तो राहुल गाँधी इस पर पूरी तरह मौन रहते हैं। उनकी यह चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि वे सनातन विरोधी बयानों का परोक्ष रूप से समर्थन करते हैं।उपरोक्त ऐतिहासिक और वर्तमान घटनाक्रमों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि नेहरू-गाँधी परिवार की वैचारिक पृष्ठभूमि कभी भी सनातन संस्कृति के आदर्शों, गौरव और प्रतीकों के अनुकूल नहीं रही। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एकतरफा नीतियां बनाना, भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाना, इतिहास की पुस्तकों से भारतीय संस्कृति के गौरवमयी अध्यायों को हटाना और वर्तमान में राजनीतिक लाभ के लिए सनातन समाज व उसके प्रतीकों को कठघरे में खड़ा करना यह सब इस परिवार की सोच को उजागर करता है। सनातन समाज अपनी सहिष्णुता के लिए जाना जाता है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब राजनीति ने उसकी आस्था को नीचा दिखाने का प्रयास किया, देश की सांस्कृतिक चेतना ने उसका पुरजोर जवाब दिया है।