लंका से लेकर मन तक – हर अंधकार पर विजय के प्रतीक श्री हनुमान जी

From Lanka to the mind - Shri Hanuman ji, the symbol of victory over every darkness

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

चैत्र पूर्णिमा की दिव्य चांदनी जैसे ही धरा पर बिखरती है, चारों ओर “जय बजरंगबली” का गगनभेदी जयघोष गूंज उठता है। मंदिरों की घंटियां, शंखनाद और भक्ति-स्वर यह अनुभूति कराते हैं कि पवनपुत्र का पावन जन्मोत्सव आ पहुंचा है। हनुमान जन्मोत्सव केवल पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति और निस्वार्थ समर्पण के उस अमर आदर्श का उत्सव है, जिसने युगों से असंख्य लोगों को हर संकट से जूझने की प्रेरणा दी है। कलियुग के भय, अंधकार और अस्थिरता के बीच हनुमान जी का अवतरण यह विश्वास जगाता है कि सच्ची श्रद्धा, राम-नाम और अडिग साहस से कोई भी असंभव कार्य संभव हो सकता है। यही कारण है कि इस दिन भक्त उनके चरणों में शीश नवाकर अपने जीवन में शक्ति, निर्भयता और अटूट आस्था का वरदान मांगते हैं।

जब धर्म और शक्ति को नए प्रकाश की आवश्यकता थी, तब चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को माता अंजना और पिता केसरी के घर हनुमान जी का अवतरण हुआ। मान्यता है कि माता अंजना की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपने अंश से तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया। उसी समय पवन देव ने अपना दिव्य तेज अंजना के गर्भ में स्थापित किया, इसलिए वे “पवनपुत्र” कहलाए। बाल्यकाल में उनकी अलौकिक शक्ति तब प्रकट हुई, जब उन्होंने सूर्य को लाल फल समझकर निगल लिया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया और इंद्र के वज्र प्रहार से उनका जबड़ा घायल हो गया। तभी से वे “हनुमान” कहलाए। यह कथा केवल चमत्कार नहीं, बल्कि इस सत्य का प्रमाण है कि तप, ईश्वर-कृपा और समर्पण साधारण जीवन को असाधारण बना देते हैं।

रामायण में हनुमान जी का व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही प्रेरक भी। जब माता सीता की खोज असंभव लग रही थी, तब उन्होंने समुद्र लांघकर लंका पहुंचने का अद्वितीय साहस दिखाया। अशोक वाटिका में प्रभु राम का संदेश देकर उन्होंने निराशा में आशा जगा दी। रावण की सभा में वे निर्भीक होकर धर्म के पक्ष में खड़े रहे और अत्याचार बढ़ने पर लंका को अग्नि में जला दिया। लक्ष्मण के मूर्छित होने पर वे हिमालय पहुंचे और संजीवनी न पहचान पाने पर पूरा पर्वत उठा लाए। उनके हर पराक्रम में बल के साथ बुद्धि, निष्ठा, साहस और रामभक्ति की अमिट छाप दिखाई देती है। वे सिद्ध करते हैं कि सच्चा भक्त असंभव को भी संभव बना देता है।

जहाँ अपार शक्ति अक्सर अहंकार को जन्म देती है, वहीं हनुमान जी उसका सबसे उज्ज्वल अपवाद हैं। वे केवल बल के प्रतीक नहीं, बल्कि विनम्रता, संयम और सेवा के सर्वोच्च आदर्श भी हैं। लंका दहन जैसे महान पराक्रम के बाद भी उन्हें अपने सामर्थ्य का कभी अभिमान नहीं हुआ। उन्होंने स्वयं को सदैव “राम का दास” माना। आज का युग सफलता और शक्ति को ही सबसे बड़ा मानता है, पर हनुमान जी सिखाते हैं कि भक्ति, अनुशासन और विनम्रता के बिना हर सामर्थ्य अधूरा है। वे बताते हैं कि अहंकार पतन की ओर ले जाता है, जबकि सेवा और समर्पण मनुष्य को महान बनाते हैं। इसी कारण हनुमान जी केवल देवता नहीं, बल्कि जीवन की ऐसी प्रेरणा हैं, जो युवाओं को साहस, विद्यार्थियों को एकाग्रता और समाज को सच्चे चरित्र का मार्ग दिखाती है।

जब जीवन संकट, भय, निराशा और असफलता से घिर जाता है, तब हनुमान जी की भक्ति भीतर नई शक्ति जगा देती है। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण और सुंदरकांड केवल पाठ नहीं, आत्मबल जगाने वाले दिव्य मंत्र हैं। “संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा” केवल चौपाई नहीं, करोड़ों भक्तों का अनुभव है। मान्यता है कि इनके पाठ से भय, ग्रह-पीड़ा और नकारात्मकता दूर होती है। हनुमान जी का स्मरण मन को स्थिर, विचारों को सकारात्मक और कठिन समय में आत्मविश्वास से भर देता है। इसी कारण कलियुग में उन्हें शीघ्र कृपा करने वाले और संकट हरने वाले देवता माना गया है। उनके नाम का स्मरण मात्र ही हृदय में साहस और अटूट विश्वास जगा देता है।

हनुमान जन्मोत्सव का आगमन होते ही पूरा भारत भक्ति और उल्लास में डूब जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा, हवन, सुंदरकांड पाठ और भजन-कीर्तन की गूंज फैल जाती है। अयोध्या, वाराणसी, दिल्ली और मेहंदीपुर बालाजी मंदिर जैसे तीर्थों में लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। भक्त व्रत रखते हैं, सिंदूर चढ़ाते हैं और लड्डू-बूरा का भोग अर्पित करते हैं। अनेक स्थानों पर भव्य शोभायात्राएं निकलती हैं, जिनमें हनुमान जी की विशाल प्रतिमाएं, गदा और राम-नाम की पताकाएं वातावरण को दिव्य बना देती हैं। युवा “जय श्री राम” और “जय बजरंगबली” के जयघोष के साथ उत्साह से शामिल होते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक आस्था का विराट रूप बन जाता है।

आज के अशांत और प्रतिस्पर्धी समय में हनुमान जी की शिक्षाएं पहले से अधिक आवश्यक हो गई हैं। भागदौड़, तनाव और असफलताओं के बीच मनुष्य स्वयं को कमजोर और अकेला महसूस करता है। ऐसे में हनुमान जी धैर्य, साहस और विश्वास का मार्ग दिखाते हैं। वे सिखाते हैं कि कठिनाइयों से डरना नहीं, उनका सामना करना ही सच्चा पराक्रम है। विद्यार्थी उनसे एकाग्रता और परिश्रम सीखते हैं, युवा आत्मविश्वास और नैतिक बल पाते हैं, जबकि समाज उनसे निष्ठा और कर्तव्य का पाठ लेता है। हनुमान जन्मोत्सव के सत्संग और प्रवचन यह समझाते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी विजय दूसरों पर नहीं, बल्कि अपने भीतर के भय, क्रोध, लोभ और अहंकार पर होती है।

जब मनुष्य अपने भीतर की शक्ति को पहचान लेता है, तभी जीवन का सच्चा अर्थ प्रकट होता है। हनुमान जन्मोत्सव यही संदेश देता है कि वास्तविक बल शरीर में नहीं, आत्मा में होता है। यह पर्व केवल हनुमान जी के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा और धर्म के अमर आदर्श का स्मरण है। “मंगल मूरति मारुति नंदन” का जाप करते ही मन में राम-प्रेम, साहस और विश्वास जाग उठता है। इस पावन अवसर पर भय, नकारात्मकता और अहंकार को त्यागकर सेवा और समर्पण अपनाएं। संकटमोचन के चरणों में श्रद्धा अर्पित करें, क्योंकि जब तक “जय श्री राम” की ध्वनि गूंजेगी, तब तक “जय बजरंगबली” का प्रकाश भी अमर रहेगा।