मई, मोदी, मेलोनी, मेलोडी, मैत्री और मितव्ययिता

May, Modi, Meloni, Melody, Friendship and Frugality

विनोद कुमार विक्की

कभी दूरदर्शन पर मासूमियत से पूछा जाता था, “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?” और जवाब मिलता था, “मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!”

अब जमाना बदल गया है। अब जवाब कुछ यूँ है, “सेल्फी देखो, खुद समझ जाओ!”

मई माह में देश में ‘ट्रिपल एम’ की चर्चा परवान पर है, मोदी, मेलोडी और मेलोनी। वैसे ‘म’ से मैत्री और मितव्ययिता भी चलन में है।

राजनीति अब सिर्फ नीतियों तक सीमित नहीं रही, उसमें चॉकलेट का फ्लेवर भी घुल चुका है। फर्क बस इतना है कि कोई इसे कूटनीति की मिठास बता रहा है, तो कोई इसे प्रचार की चाशनी।

बंगाल में दस रुपये की झालमुढ़ी खरीदी कर मितव्ययिता का शंखनाद किया गया जिससे आलोचकों की जीभ पर मिर्ची और झाल का संयुक्त स्वाद प्राप्त हुआ। जबकि समर्थकों ने इसे सादगी का प्रतीक बताया, मानो देशहित अब थाली में नहीं, ठेले पर परोसा जा रहा हो।

उधर, इटली में चॉकलेट का कूटनीतिक आदान-प्रदान हुआ। महँगे तोहफों के इस दौर में सस्ती मेलोडी ने जो कमाल किया, वह किसी ‘इकोनॉमिक रिफॉर्म’ से कम नहीं। एक पैकेट चॉकलेट और एक मुस्कुराती सेल्फी, बस, हो गई अंतरराष्ट्रीय मित्रता की मिठास सील!

हालाँकि, इस मिठास प्रकरण से कुछ लोगों का ‘शुगर लेवल’ अचानक बढ़ गया है।

आलोचकों की मानें, तो जनता को पैदल चलने, मेट्रो में सफर करने, विदेशी यात्रा न करने की सीख देने वाले खुद आसमान नाप रहे हैं! सादगी का उपदेश ज़मीन पर और उसका प्रदर्शन हवाई यात्रा के साथ!

वस्तुत: सादगी भी इन दिनों ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का हिस्सा बन चुकी है।

आलोचकों को शिकायत रहती है कि उनके द्वारा हर काम उल्टा-पुल्टा किया जाता है। उदाहरण के तौर पर 9 फ़रवरी को मनाया जाने वाला ‘चॉकलेट डे’ मई के तीसरे सप्ताह में मनाया गया! इस पर समर्थकों का मंतव्य भी कम दिलचस्प नहीं कि बंगाल, असम आदि राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यस्तता के कारण यह ‘मधुर आयोजन’ समय से थोड़ा आगे खिसक गया।

मैत्री और मितव्ययिता का यह नया मॉडल बड़ा दिलचस्प है, जहाँ दस रुपये की झालमुढ़ी और मेलोडी मिलन को समर्थक मितव्ययिता के चश्मे से देखते हैं तो विरोधी आलोचना के लेंस से।

बहरहाल, मई की तपिश में ‘म’ से मोदी, मेलोनी, मैत्री, मेलोडी और मितव्ययिता सुर्खियों में है।