आम आदमी पार्टी, कांग्रेस में अंतर्द्वंद्व व अराजकता

Infighting and chaos in Aam Aadmi Party and Congress

प्रो. नीलम महाजन सिंह

क्रांतिकारी आंदोलन व भ्रष्टाचार के खिलाफ़ निर्मित आम आदमी पार्टी 2026 तक अपनी आरंभिक विचारधारा से भटक गई है। अन्ना के गांधीवादी विचार व जनसेवा अब ‘आप’ के उद्देश्य नहीं रह गए हैं। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में ‘आप’ पूर्णतः एक राजनीतिक दल बन गया है, जिसमें भ्रष्ट नेताओं का प्रशासनिक दुरुपयोग स्पष्ट नज़र आ रहा है।

पिछले दिनों ‘आप’ के सात राज्यसभा सांसदों के बड़े पैमाने पर बीजेपी में शामिल होने के बाद, नेतृत्व में उथल-पुथल, कानूनी चुनौतियों व 2025 के दिल्ली चुनाव में हार के बीच पार्टी अपनी ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। इसका भविष्य काफी हद तक पंजाब में अपनी बची हुई सरकार को बनाए रखने व आगे किसी भीतरी टूट को रोकने पर निर्भर करता है।

‘आप’ के भविष्य को आकार देने वाले मुख्य कारण बड़े पैमाने पर पलायन व भाजपा में विलय हो सकते हैं। इससे नेतृत्व में खालीपन पैदा हो गया है व पार्टी के मनोबल को गहरा झटका लगा है। दिल्ली चुनाव के बाद फिर से खड़ा होना ‘आप’ के लिए मुख्य चुनौती है। पार्टी का ध्यान अब पूरी तरह से पंजाब पर केंद्रित हो गया है, जहाँ उसके पास बहुमत है।

हालाँकि, 2022 की पंजाब जीत में अहम भूमिका निभाने वाले नेताओं (जैसे राघव चड्ढा) के पार्टी छोड़ने से पार्टी के इस बचे हुए मज़बूत गढ़ पर खतरा मंडरा रहा है। यहाँ बढ़ती अस्थिरता व अंदरूनी कलह की खबरें भी आ रही हैं। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लगातार चल रही कानूनी कार्रवाइयों से भी जूझ रहा है। इन कार्रवाइयों का असर पार्टी के कामकाज और उसके प्रभावी प्रबंधन की क्षमता पर पड़ा है।

पार्टी इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहाँ उसे ‘करो या मरो’ जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। हाल की हार व अंदरूनी अस्थिरता के कारण पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की महत्वाकांक्षाओं को झटका लगा है, जिससे एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजनीतिक विकल्प के तौर पर उसकी हैसियत खतरे में पड़ गई है।

आम आदमी पार्टी पिछले चार महीनों से अपनी हार के बाद अपनी राजनीतिक मशीनरी को फिर से खड़ा करने और पुनर्गठित करने के लिए पर्दे के पीछे चुपचाप काम कर रही है। भ्रष्टाचार-विरोधी ताकत से संकटग्रस्त पार्टी तक का सफर ‘आप’ के लिए उतार-चढ़ाव का समय रहा है। ‘आप’ के भविष्य की स्थिति को समझने के लिए उसकी पृष्ठभूमि को समझना अनिवार्य है।

आम आदमी पार्टी की शुरुआत से लेकर अब तक जिन अहम सदस्यों को पार्टी से निकाला गया या जिन्हें बाहर जाने पर मज़बूर किया गया, उनमें 2015 में पार्टी के संस्थापक योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आशुतोष, डॉ. कुमार व अंजलि दमानिया शामिल हैं। इन्हें कथित तौर पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निकाला गया था।

आपसी मतभेदों के चलते पार्टी छोड़ने वाले अन्य लोगों में शाज़िया इल्मी, कैप्टन जी.आर. गोपीनाथ व मयंक गांधी शामिल हैं। योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण को ‘पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी’ (PAC) से हटा दिया गया था। अक्सर इन नेताओं ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व या पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी से जुड़ी समस्याओं को पार्टी छोड़ने का कारण बताया।

इस दौरान राघव चड्ढा, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल व चार अन्य सांसदों के पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने की चर्चा रही है। राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सात सदस्यों ने एक समूह के तौर पर पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया और राज्यसभा के सभापति को इसकी जानकारी भी दे दी गई।

‘आप’ की कहानी विचारधारा के बारे में कम व परिस्थितियों के हिसाब से ढलने के बारे में अधिक दिखाई देती है। एक मध्यम आकार की पार्टी के रूप में, जिसने 2015 व 2020 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली पर कब्ज़ा करके और उसे बरकरार रखकर भारतीय राजनीतिक इतिहास में अपनी जगह बनाई।

अशोक मित्तल मिठाइयाँ बेचते थे। उन्होंने लवली यूनिवर्सिटी की स्थापना की। छापेमारी और प्रवर्तन निदेशालय के भय से उनके भाजपा में शामिल होने की चर्चा रही। पार्टी मुख्यालय में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाक़ात भी की गई।

दो-तिहाई से कम समर्थन मिलने और अकेले पड़ गए केजरीवाल के लिए विधानसभा चुनावों में भाजपा की दिल्ली में ज़बरदस्त जीत ने पार्टी को हिलाकर रख दिया। यह पार्टी लोकसभा में बीजेपी के दबदबे के बावजूद स्थानीय लोगों की पहली पसंद बनी हुई थी।

बीजेपी में शामिल हुए प्रमुख कांग्रेस नेताओं में अशोक चव्हाण, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री; गौरव वल्लभ, कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता; मिलिंद देवड़ा, कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री; रवनीत सिंह बिट्टू, पंजाब से सांसद; ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिन्होंने 2020 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा और अब केंद्रीय मंत्री हैं; जतिन प्रसाद, उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता, जो अब बीजेपी सरकार में मंत्री हैं; आर.पी.एन. सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री; सुनील जाखड़, पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष; कैप्टन अमरिंदर सिंह, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री; अनिल एंटनी, वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी के बेटे; जयवीर शेरगिल, पूर्व कांग्रेस प्रवक्ता; किरण रेड्डी, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री; सुधीर शर्मा, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मंत्री; तथा जगदीश शेट्टार, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं।

अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के 6 पूर्व विधायकों ने भी हाल ही में बीजेपी का दामन थामा है। उत्तराखंड में कई स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है। ये नेता कांग्रेस की मौजूदा कार्यशैली से असंतुष्ट बताए जाते हैं।

सारांशतः राजनीतिक विचारधारा का अनुसरण कठिन होता जा रहा है। आर्थिक छापेमारी, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और आयकर विभाग से संबंधित कार्रवाइयों के कारण व्यापारी और राजनेता सत्ता की ‘जी हजूरी’ में व्यस्त दिखाई देते हैं। राजनीतिक लोकतंत्र में व्यक्तिगत अवसरवाद व धन की भूमिका लगातार बढ़ती दिख रही है। यही आज की राजनीतिक सच्चाई है, जिसमें आम जन के साथ धोखाधड़ी हो रही है।

‘आया राम, गया राम’ की यह उठक-बैठक राजनीतिक स्वार्थ का प्रतीक बन चुकी है।

प्रो. नीलम महाजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक, दूरदर्शन व्यक्तित्व, मानवाधिकार संरक्षण से जुड़ी सॉलिसिटर व परोपकारक)