कौन जवाब देगा नीट की इस लगातार बिगड़ती व्यवस्था का?

Who will answer for this continuously deteriorating system of NEET?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

कड़े नियमों, डिजिटल निगरानी और सुधार के दावों के बावजूद जब परीक्षा व्यवस्था बार-बार संदेह में आ जाए, तो नीट-यूजी 2026 जैसी घटनाएँ पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर देती हैं। 3 मई को देशभर के 22 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने डॉक्टर बनने के सपने के साथ परीक्षा दी, लेकिन कुछ ही दिनों में यह विवादों में घिर गई। 12 मई को एनटीए द्वारा परीक्षा रद्द करने और मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के फैसले ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। राजस्थान एसओजी की प्रारंभिक जांच में “गेस पेपर” और प्रश्नों के मेल ने परीक्षा की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर चोट पहुँचाई। यह केवल परीक्षा रद्द होने की घटना नहीं, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र की गहरी संरचनात्मक विफलताओं का स्पष्ट संकेत बन गई।

जब लाखों विद्यार्थी किसी परीक्षा के लिए अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष समर्पित करते हैं, तो उनका पूरा भविष्य उसी एक दिन से जुड़ जाता है। नीट अभ्यर्थियों ने कोचिंग, टेस्ट सीरीज, निरंतर अभ्यास और मानसिक दबाव के बीच कठिन संघर्ष किया, लेकिन परीक्षा रद्द होने के फैसले ने उनकी मेहनत को अनिश्चितता में धकेल दिया। ग्रामीण और छोटे शहरों के छात्रों पर भी इसका गहरा असर पड़ा, जो सीमित संसाधनों में भी बड़े सपने लेकर आगे बढ़ रहे थे। उनके लिए यह परीक्षा केवल प्रवेश नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक उन्नति का अवसर थी, जो फिर से अधर में लटक गया।

जब किसी बच्चे के सपने को साकार करने के लिए परिवार अपनी पूरी जमा-पूंजी, कर्ज और संसाधन तक दाँव पर लगा देता है, तब ऐसा निर्णय उन्हें आर्थिक ही नहीं, गहरे मानसिक आघात से भी जकड़ देता है। मध्यमवर्गीय माता-पिता ने कोचिंग, हॉस्टल, किताबों और तैयारी पर अपनी सीमाओं से बाहर जाकर खर्च किया था। परीक्षा रद्द होने से यह निवेश अब सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि भावनात्मक टूटन में बदल गया है। कई घरों में तनाव और चिंता बढ़ गई है। माता-पिता के मन में अब यही सवाल गूंज रहा है कि क्या हर साल उनके बच्चों का भविष्य इसी तरह अनिश्चितता के अंधेरे में फँसा रहेगा?

मल्टी-लेयर सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, फ्लाइंग स्क्वाड और सीलबंद प्रोटोकॉल जैसी मजबूत व्यवस्थाओं के बावजूद जब बार-बार पेपर लीक और प्रश्नों के मिलान जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तो यह परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। राजस्थान के सीकर जैसे कोचिंग केंद्र में उजागर हुआ “गेस पेपर” का मामला यह दिखाता है कि समस्या केवल परीक्षा केंद्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की श्रृंखला में कहीं गहराई तक फैली हो सकती है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर भंडारण, परिवहन और वितरण तक हर चरण में यदि थोड़ी भी चूक रह जाए, तो पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है।

गलती सामने आने पर हर बार परीक्षा रद्द करना समाधान नहीं, बल्कि उसका सीधा बोझ छात्रों पर डाल देना बन जाता है, जबकि वास्तविक चूक करने वाली व्यवस्था अक्सर जवाबदेही से बच जाती है। यही सबसे बड़ा असंतुलन है। सिस्टम की खामियों को सुधारने के बजाय उसकी कीमत अभ्यर्थियों को समय, श्रम और मानसिक दबाव के रूप में चुकानी पड़ती है। यह सिलसिला बार-बार दोहराया जाता है, लेकिन जवाबदेही का स्पष्ट ढांचा आज भी कमजोर प्रतीत होता है। ऐसे में सवाल और भी तीखा हो जाता है कि जब सुरक्षा के इतने स्तर मौजूद हैं, तो आखिर चूक किस चरण में और किसकी लापरवाही से हो रही है?

एनटीए द्वारा यह कहना कि छात्रों को दोबारा आवेदन नहीं करना होगा और फीस वापस कर दी जाएगी, केवल एक औपचारिक प्रशासनिक घोषणा प्रतीत होती है, जबकि मूल संकट जस का तस बना हुआ है। नई परीक्षा तिथि को लेकर बनी अनिश्चितता ने पूरे मेडिकल प्रवेश कैलेंडर को अस्त-व्यस्त कर दिया है। एमबीबीएस व अन्य मेडिकल पाठ्यक्रमों के सत्र में संभावित देरी का प्रभाव किसी एक बैच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा। हर टलती तारीख का अर्थ छात्रों के जीवन में समय, अवसर और भविष्य का लगातार पीछे खिसकना है।

जब किसी एक परीक्षा पर उठे सवाल पूरे चिकित्सा शिक्षा ढांचे की साख को हिला दें, तो यह केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं, बल्कि सिस्टम की गहरी विफलता बन जाता है। एआईआईएमएस, जेआईपीएमईआर जैसे शीर्ष संस्थानों में प्रवेश नीट पर निर्भर है, और उसी परीक्षा की पारदर्शिता संदिग्ध हो जाए, तो पूरा मेडिकल भविष्य अस्थिर हो जाता है। छात्रों का असंतोष अब केवल भावनात्मक नहीं रहा, बल्कि एक संगठित और निर्णायक मांग में बदल चुका है—कड़ी सुरक्षा, वास्तविक डिजिटल पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था की।

सीबीआई जांच की घोषणा ने भले ही उम्मीद जगाई हो कि दोषियों तक पहुंच संभव होगी, लेकिन केवल जांच अपने आप में समस्या का समाधान नहीं बन सकती। असली आवश्यकता गहरे प्रणालीगत सुधारों की है—जो केवल तकनीक तक सीमित न होकर प्रशासनिक ढांचे और संरचना दोनों को मजबूत करें। यदि स्पष्ट और कठोर जवाबदेही तय नहीं की गई, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना कठिन होगा। परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, नियमित निगरानी और सख्त ऑडिट प्रणाली अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है।

जब एक ही परीक्षा 22 लाख से अधिक छात्रों के भविष्य का निर्णायक आधार बन जाए और वही बार-बार विवादों के घेरे में फँसती रहे, तो यह केवल शैक्षणिक असफलता नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्रतिभा के क्षरण का गंभीर संकेत है। हर बार छात्रों का समय, परिश्रम और मानसिक ऊर्जा दांव पर लगती है, जबकि व्यवस्था में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता। यह स्थिति अब सामान्य चिंता नहीं, बल्कि स्पष्ट चेतावनी बन चुकी है कि यदि तुरंत ठोस और निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो व्यवस्था पर से भरोसा पूरी तरह टूट सकता है।

बार-बार सामने आने वाली यह स्थिति अब एक गंभीर प्रश्न बन चुकी है कि क्या छात्र हमेशा परीक्षा की अनिश्चितता, रद्दीकरण और दोबारा तैयारी के बोझ में ही उलझे रहेंगे। इसका उत्तर किसी जांच या औपचारिक आश्वासन से नहीं निकल सकता। जरूरत ऐसी मजबूत और जवाबदेह व्यवस्था की है जहाँ त्रुटियों की संभावना कम हो और हर स्तर पर जिम्मेदारी स्पष्ट हो। तभी लाखों छात्रों के सपनों को व्यवस्था की चूक से बचाया जा सकेगा और उनका भविष्य सुरक्षित, पारदर्शी तथा स्थिर दिशा में आगे बढ़ सकेगा—वरना भरोसे का यह संकट और गहरा होगा और सबसे बड़ी कीमत प्रतिभा को चुकानी पड़ेगी।