ताजमहल विवाद: मिथक बनाम इतिहास

The Taj Mahal Controversy: Myth vs. History

डॉ. सत्यवान सौरभ

ताजमहल भारत की सांस्कृतिक धरोहर और विश्व की सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। मुगल सम्राट शाहजहाँ द्वारा अपनी पत्नी मुमताज महल की स्मृति में निर्मित यह अद्भुत स्मारक प्रेम, कला और स्थापत्य सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 1632 से 1653 के बीच निर्मित यह संगमरमर का मकबरा आज विश्व के सात अजूबों में शामिल है। किंतु समय-समय पर इसकी उत्पत्ति और निर्माण को लेकर विवाद भी उठते रहे हैं। कुछ लोग इसे हिन्दू मंदिर या राजमहल बताते हैं और तथाकथित “तेजो महालय” सिद्धांत को आधार बनाकर इसकी ऐतिहासिकता पर प्रश्न खड़े करते हैं। हाल के वर्षों में फिल्म “द ताज स्टोरी” ने इस बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। ऐसे में आवश्यक है कि भावनाओं या अफवाहों के बजाय ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक प्रमाणों और प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर इस विषय को समझा जाए।

ताजमहल आगरा में यमुना नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। समकालीन इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपनी प्रसिद्ध रचना “पादशाहनामा” में विस्तार से उल्लेख किया है कि मुमताज महल की मृत्यु के बाद शाहजहाँ ने उनकी स्मृति में इस मकबरे का निर्माण करवाया। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 20 हजार कारीगरों और शिल्पकारों ने 22 वर्षों तक कार्य कर इस इमारत को पूरा किया। निर्माण में फारसी, तुर्क, भारतीय और मध्य एशियाई कारीगरों की भूमिका रही। मकराना (राजस्थान) का सफेद संगमरमर तथा विभिन्न प्रदेशों से लाए गए कीमती पत्थरों का उपयोग इसकी भव्यता को अद्वितीय बनाता है।

ताजमहल की वास्तुकला मुगल शैली का श्रेष्ठ उदाहरण मानी जाती है, जिसमें इस्लामी मेहराबों, फारसी गुंबदों और भारतीय स्थापत्य तत्वों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। चारबाग शैली का उद्यान, चारों ओर खड़ी मीनारें, संगमरमर पर की गई नक्काशी और कुरान की आयतों की कलात्मक लिखावट इसे विश्वस्तरीय धरोहर बनाती है। यूनेस्को ने वर्ष 1983 में इसे विश्व धरोहर घोषित करते हुए “मुगल स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण” कहा था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) भी इसे स्पष्ट रूप से मुगलकालीन मकबरा ही मानता है।

ताजमहल को लेकर विवादों की आधुनिक शुरुआत वर्ष 1989 में पुरुषोत्तम नागेश ओक की पुस्तक “ताजमहल : द ट्रू स्टोरी” से मानी जाती है। ओक ने दावा किया कि ताजमहल वास्तव में “तेजो महालय” नामक शिव मंदिर था, जिसे शाहजहाँ ने कब्जे में लेकर मकबरे में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने अपने तर्कों में “ताज” शब्द की संस्कृत व्युत्पत्ति, कुछ स्थापत्य विशेषताओं तथा बंद कमरों का उल्लेख किया। किंतु इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इन दावों को प्रमाणहीन बताया।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी भी समकालीन हिन्दू ग्रंथ, शिलालेख, राजकीय दस्तावेज या ब्रिटिशकालीन सर्वेक्षण में “तेजो महालय” नामक किसी मंदिर का उल्लेख नहीं मिलता। यदि वास्तव में इतनी विशाल संरचना पूर्व में मंदिर होती, तो उसके संदर्भ किसी न किसी ऐतिहासिक अभिलेख में अवश्य मिलते। न्यायालयों ने भी समय-समय पर इन दावों को खारिज किया है। वर्ष 2000, 2005 और 2017 में दायर याचिकाओं पर अदालतों ने कहा कि ऐसे दावे ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाते। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन्हें ठोस प्रमाणों के अभाव में स्वीकार नहीं किया।

ताजमहल के तथाकथित “22 बंद कमरे” लंबे समय से जिज्ञासा और विवाद का विषय बने हुए हैं। ये कमरे ताजमहल के बेसमेंट क्षेत्र में स्थित हैं, जिन्हें सुरक्षा कारणों से लंबे समय से बंद रखा गया है। कुछ समूह दावा करते हैं कि इन कमरों में हिन्दू मूर्तियाँ, शिवलिंग या अन्य धार्मिक प्रमाण छिपाए गए हैं। हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने स्पष्ट किया है कि ये कमरे इमारत की संरचनात्मक मजबूती के लिए बनाए गए सहायक कक्ष हैं। अधिक आर्द्रता, कार्बन डाइऑक्साइड तथा पर्यटकीय गतिविधियों से संगमरमर को नुकसान पहुँचने की आशंका के कारण इन्हें आम लोगों के लिए बंद रखा गया।

पुरातत्वविद् के.के. मोहम्मद सहित कई विशेषज्ञ इन कमरों का निरीक्षण कर चुके हैं। उनके अनुसार अंदर सामान्य दीवारें, मेहराबें और क्षतिग्रस्त प्लास्टर के अतिरिक्त कुछ भी असाधारण नहीं है। वर्ष 2022 में सार्वजनिक हुई तस्वीरों में भी इन कमरों में कोई धार्मिक प्रतीक या मूर्ति दिखाई नहीं दी। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन कमरों को लेकर फैलाई जाने वाली अधिकांश बातें कल्पना और सनसनी पर आधारित हैं।

हाल के समय में फिल्म “द ताज स्टोरी” ने इस विवाद को फिर जीवित कर दिया। फिल्म में ताजमहल को शिव मंदिर सिद्ध करने की कोशिश की गई है और 22 बंद कमरों के रहस्य को रहस्यमय ढंग से प्रस्तुत किया गया है। हालांकि इतिहासकारों का मानना है कि यह प्रस्तुति ऐतिहासिक तथ्यों की अपेक्षा कल्पनाओं और राजनीतिक विमर्श से अधिक प्रेरित है। कला और सिनेमा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, किंतु जब इतिहास को प्रस्तुत किया जाए तो तथ्यात्मक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है।

ताजमहल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसकी वास्तुकला में भारतीय और फारसी कलात्मक परंपराओं का अद्भुत मेल दिखाई देता है। कमल जैसे भारतीय प्रतीकों का प्रयोग यह दर्शाता है कि मुगल स्थापत्य स्थानीय कला और संस्कृति से प्रभावित था। इसे किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित करना इतिहास की व्यापकता को संकुचित करना होगा।

आज ताजमहल हर वर्ष लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है और भारत की पर्यटन अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। प्रदूषण, अम्ल वर्षा, यमुना के घटते जलस्तर और पर्यावरणीय क्षति जैसी चुनौतियाँ पहले से ही इसके संरक्षण के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। ऐसे समय में तथ्यहीन विवादों से अधिक आवश्यकता इस विश्व धरोहर के संरक्षण और संवर्धन की है।

अंततः ताजमहल इतिहास, कला और मानवीय संवेदनाओं की अमर कृति है। इतिहास का मूल्यांकन प्रमाणों और शोध के आधार पर होना चाहिए, न कि अफवाहों और राजनीतिक आग्रहों के आधार पर। मिथकों और विवादों से ऊपर उठकर हमें इस धरोहर को भारत की सांस्कृतिक एकता और साझा विरासत के प्रतीक के रूप में देखना चाहिए। यही दृष्टिकोण इतिहास के प्रति जिम्मेदार और भविष्य के प्रति सजग समाज की पहचान है।

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)