अधिक मास नहीं तो दीपावली गर्मी में और होली का त्यौहार बरसात में आ सकते हैं
पंडित जितेन्द्र मोहन भट्ट –
भारतीय जीवन पद्धति विश्व में अनूठी है। यहां हर माह, हर दिन, हर सुबह सूरज की किरणें किसी न किसी त्यौहार या उत्सव का संदेश लेकर आती है। वैसे हर महीना एक-दूसरे से अधिक श्रेष्ठ एवं अधिक पवित्र माना जाता है, परन्तु इन सब में पुरूषोत्तम मास सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह लगभग तीन वर्षों में आता है। इस वर्ष दो ज्येष्ठ मास होंगे। 17 मई से 15 जून तक अधिक मास रहेगा।
कैसे अस्तित्व में आया पुरूषोत्तम मास ?
जिस चन्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति (राशि परिवर्तन) नहीं होती है, उस मास को मल मास या अधिक मास कहा जाता है।
यस्मिन मासे न संक्रान्ति, संक्रान्ति द्वय मेव वा ।
मल मास स विज्ञेयो, मासे त्रिंशत्तमे भवेत ।।
एक सौर वर्ष में 365 दिन तथा एक चन्द्र वर्ष में 354 दिन होते हैं। इस प्रकार दोनों में लगभग 11 दिनों का अन्तर होता है। जो लगभग तीन वर्ष में एक माह हो जाता है। अत: काल गणना को त्रुटिरहित बनाने के लिए 32 माह 16 दिन चार घड़ी के अन्तर से यानि हर तीसरे वर्ष एक चन्द्रमास बढ़ा दिया जाता है। बढ़े हुए इस महीने को अधिक मास या मल मास कहते हैं। इससे यह सुविधा होती है कि भारतीय त्यौहार, उत्सव एवं पर्व लगभग समान ऋतुओं में मनाए जाते हैं अन्यथा दीपावली गर्मी में, होली का त्यौहार बरसात ऋतु मई-जून में आ सकते हैं।
मलमास कैसे हुआ पुरूषोत्तम मास ?
मल मास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होने से शुभ कार्य जैसे विवाह, यज्ञोपवित, देव प्रतिष्ठा, नामकरण संस्कार, वधु प्रवेश, गृह प्रवेश आदि वर्जित माने गए हैं। वृहन्तारदीय पुराण में वर्णित “पुरूषोत्तम मास महात्म्य” के अनुसार इस माह का कोई स्वामी नहीं होने एवं शुभ कार्यों की वर्जना से इस माह की सर्वत्र निन्दा होने लगी। इससे दुःखी होकर मल मास भगवान श्रीकृष्ण के पास रोते हुए कहने लगा। हे प्रभु मेरा कोई नाम नहीं है, न मेरा कोई स्वामी है, सब मुझे अछूत समझ कर मेरा अपमान करते हैं। मेरे महीने में कोई शुभ कार्य भी नहीं करते हैं। कृपया आप मुझे शरण दें। प्रभु को दया आयी। कहा, मैं तुम्हारा स्वामी हूँ, मैं अपना पुरूषोत्तम नाम तुम्हें देता हूँ। मेरे समान ही तुममें यही गुण होंगे।
अहर्यते यथा लोके प्र:थित पुरूषोत्तम ।
तथा ययापि लोकेषु प्रधित पुरूषोत्तम ।।
अर्थात् उन गुणों के कारण जिस प्रकार वेदों, लोकशास्त्रों में पुरूषोत्तम नाम से विख्यात है उसी प्रकार यह मलमास भी भूतल पर पुरूषोत्तम नाम से प्रसिद्ध होगा और मैं स्वयं उसका स्वामी होऊँगा। तुम जगत में पूजनीय होंगे, तुम्हारे इस महीने में जो भक्त लोग पूजन, जप, तप, व्रत, स्नान, उपवास, दान-पुण्य आदि करेंगे, वे तुमसे वरदान प्राप्त करेंगे। मैं उनकी दरिद्रता का नाश करूँगा, उन्हें सुख, सम्पत्ति, सन्तति एवं सौभाग्य की प्राप्ति होगी तथा मनवांछित फल मिलेगा। पुरूषोत्तम मास के व्रति जीवन में हर प्रकार के सुख भोगकर अन्त में मेरे लोक को प्राप्त होंगे। इस प्रकार मल मास भगवान (पुरूषोत्तम) का नाम पुरूषोत्तम प्राप्त कर प्रसन्न हुआ।
पुरूषोत्तम मास के विधि विधान
प्रात:कालीन कर्म –
पुरूषोत्तम मास के व्रति को प्रात: ब्रह्म मुहुर्त में उठना चाहिए। आंखे खुलते ही दोनों हथेलियों में लक्ष्मी, ब्रह्मा एवं सरस्वती के दर्शन करें। भूमि वन्दना करें एवं मांगलिक वस्तुओं का दर्शन करें। माता-पिता, गुरू, ईश्वर एवं सूर्य को नमन करें। शौचादि कर्मों से निवृत्त होकर मुख शुद्धि करें। तिल एवं आंवले के चूर्ण से पहले मल-मल कर स्नान करें। सभी देवता, नदियां, तीर्थों से प्रार्थना करें कि वे मुझे पवित्र करें। हाथ में जलाजली बना कर तिल, जौ एवं दूध से देवता पितृ तथा मनुष्यों के लिए तर्पण करें। शुद्ध वस्त्र पहन तिलक लगावें, शिव, विष्णु देवी एवं देवताओं के मंदिर में जाकर दर्शन करें। सूर्यनारायण एवं तुलसी माता को जल चढ़ावें। घर में शुद्ध स्थान पर बैठकर षोड़पोषचार से पूजन करें। चावल का अष्टकमल दल बना कर कलश की स्थापना कर उसमें गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी एवं पवित्र तीर्थों के जल का आह्वान करें। कलश पर ताम्बे का पात्र रख राधाकृष्ण (पुरूषोत्तम) की मूर्ति को पीले रेशमी वस्त्रों सहित स्थापित करें। पुरूषोत्तम मास के पुरूषोत्तम ही देवता है। अत: इनका पूरे माह पूजन एवं आराधना करें। पुरूषोत्तम मास में भगवत भजन, कीर्तन, पुराण, रामायण आदि धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, चिंतन एवं सत्संग करना चाहिए। श्रीमद्भागवत एवं पुरूषोत्तम मास का पारायण या श्रवण पुण्यदायक माना गया है। गीताजी के पुरूषोत्तम योग नामक 15वें अध्याय का पाठ करना भी श्रेयस्कर होता है।
व्रति के नियम
व्रति तेल, राई, उड़द, चूना, जंभीरी, नींबू, दालें, मॉंस, मदकारी, नशीली वस्तुएं, दुर्गन्धयुक्त भोज्य सामग्री नहीं खावें। जूठा, कच्चा, जला हुआ, दो बार पकाया, दूषित, बिना ढके अन्न आदि का परित्याग करें। सिंघाड़ा, कद्दू, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली, छत्रांक, लौकी, कटहल, तरबूज आदि नहीं खायें। बाजार से खरीदी पक्की सामग्री कचौड़ी, पकौड़ी, सेव आदि काम में न लेवें। घर पर बनायी सामग्री से ईश्वर को भोग लगाकर ही प्रसाद ग्रहण करें। पराये अन्न का परित्याग करें। पत्तल पर भोजन करें। ताम्बे के बर्तन में भरे दहे, दूध और घी का परित्याग करें। हविष्यान भोजन अर्थात गेहूं, चावल, जौ, साबुत मूंग, मिश्री, तिल, सावा, सैंधा नमक, फल, घी, दूध, दही आदि का सेवन करें। एक समय अपराह्न में भोजन करें। भूमि पर शयन करे, ब्रह्मचर्य का पालन करें। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, कुसंग न करें। किसी की निन्दा, चुगली एवं अपमान न करें। सदा सत्य एवं प्रिय वचन बोलें। अच्छा स्वास्थ्य एवं सामर्थ्य हो तो उपवास, एकान्तर चान्द्रायज कुच्छांदि व्रत करें। घर मंदिर एवं जलाशय के किनारे दीपक जलाने से लक्ष्मी जी की प्राप्ति होती है।
दान –
अपनी आर्थिक स्थिति और घर के मुखिया की सहमति से दानादि करें। पुराणों में पुरुषोत्तम मास में ब्रह्माण्ड का दान लिखा है। प्रतीक के रूप में 35 मालपूवों से कांसे के पात्र का संपुठ बना सात तागों से बांध कर दान करना चाहिये। श्रीमद्भागवत की पुस्तक को पीले कपडे में बांध, अलंकृत कर स्वर्ण सिंहासन पर आसीन कर दान करना चाहिये। अपनी शक्ति के अनुसार अन्न, फल, वस्त्र, बर्तन एवं धन का दान करें। सभी प्रकार के दान को कृष्णार्पण (भगवान) को अर्पण करें।
उद्यापन –
पुरुषोतम मास के व्रत की फल प्राप्ति के लिए उद्यापन करना चाहिये। पुरूषोत्तम मास को कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी इसके लिए उपयुक्त है। प्रात: पूर्व में बताई गई दैनिक क्रियाओं के बाद किसी ब्राह्मण आचार्य का वरण कर उद्यापन कार्य प्रारम्भ करें। सर्वतोभद्र का मन्डला बना कर चारों कोनों में चार कलश की स्थापना करें। जिस पर राधाकृष्ण (पुरूषोत्तम) की मूर्ति जो कलश पर विराजमान है, उसे मध्य में स्थापित करें। कलशों पर पात्र कपड़ा एवं श्रीफल रखें। दीपक प्रज्ज्वलित कर मंत्री द्वारा षोड़षोपचार से पूजा करें। आरती पुष्पांजली कर क्षमा प्रार्थना करें। अपनी शक्ति के अनुसार यज्ञ करें एवं ब्राहाण भोजन करावे। अगले दिन पुरुषोत्तम मास में जिन-जिन वस्तुओं का परित्याग किया था, उनका दान कर स्वयं ग्रहण करें। इस प्रकार प्रसन्नचित्त हो व्रत का समापन करें।
प्रति तीन वर्ष बाद आने वाला पुरुषोत्तम मास मनुष्य के जीवन में दुर्लभ अवसर है। व्यकि स्वयं के आचरण, व्यवहार, मूल्यों एवं घर्म का मूल्यांकन कर पाता है। प्रातः जल्दी उठना, स्नान, ध्यान, देव-दर्शन, कथा-श्रवण, आध्यात्मिक चिन्तन, सादगीपूर्ण रहन-सहन, खान-पान, संयमित जीवन से मनुष्य में स्फूर्ति रहती है। मनुष्य सदाचारी बनता है। मन प्रफुल्लित रहता है। जीवन में सुख, सतोष एवं ऊर्जा की प्राप्ति होती है। ओम्
(लेखक पंडित जितेन्द्र मोहन भट्ट सेवानिवृत्त जिला शिक्षा अधिकारी है)





