स्क्रीन पर जांच, सवालों के घेरे में भविष्य : क्या डिजिटल मूल्यांकन छात्रों के साथ कर रहा है न्याय?

Screen tests, future in question: Is digital assessment doing justice to students?

सत्य भूषण शर्मा

देश की प्रमुख शैक्षणिक संस्था सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन द्वारा हाल ही में घोषित कक्षा 12 बोर्ड परीक्षा परिणामों ने इस वर्ष लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों को खुशी से अधिक चिंता और असमंजस में डाल दिया है। आधुनिक तकनीक के नाम पर लागू की गई “ऑन स्क्रीन मार्किंग” प्रणाली अब गंभीर बहस का विषय बनती जा रही है। बड़ी संख्या में विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक यह महसूस कर रहे हैं कि मूल्यांकन प्रक्रिया में कहीं न कहीं ऐसी कमियां रह गई हैं, जिनका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ रहा है।

बोर्ड परीक्षाएं केवल अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि विद्यार्थियों के करियर, उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और आत्मविश्वास की मजबूत नींव होती हैं। ऐसे में यदि परीक्षा परिणाम विद्यार्थियों के वास्तविक प्रदर्शन से मेल न खाएं, तो पूरी मूल्यांकन व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इस बार सबसे अधिक आश्चर्य उन विद्यार्थियों के परिणामों को देखकर हुआ, जिन्होंने पूरे वर्ष विद्यालय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया था। अनेक छात्रों ने प्री-बोर्ड परीक्षाओं में 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए, कोचिंग संस्थानों की टेस्ट श्रृंखलाओं में शानदार प्रदर्शन किया तथा शिक्षकों द्वारा भी उन्हें मेधावी माना गया। इसके बावजूद बोर्ड परीक्षा परिणामों में उनके अंक अपेक्षा से काफी कम दिखाई दिए। कई मामलों में यह अंतर केवल पांच-दस अंकों का नहीं, बल्कि बड़े प्रतिशत तक का रहा।

यदि हजारों विद्यार्थियों और अभिभावकों की शिकायतों का स्वर एक जैसा हो, तो इसे केवल संयोग नहीं माना जा सकता। अनेक शिक्षकों ने भी अनौपचारिक रूप से स्वीकार किया है कि ऑन स्क्रीन मार्किंग में उत्तरों का सूक्ष्म मूल्यांकन पारंपरिक पद्धति की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण सिद्ध हुआ है।

ज्ञात हो कि इस प्रणाली में विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल रूप में परीक्षकों के कंप्यूटर स्क्रीन पर भेजा गया। सिद्धांत रूप में यह व्यवस्था आधुनिक, पारदर्शी और समय बचाने वाली प्रतीत होती है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इसमें कई कमियां सामने आ रही हैं।

सबसे बड़ी समस्या उत्तरों की स्पष्टता को लेकर सामने आई है। साधारण पेन से लिखे गए उत्तर स्कैनिंग के दौरान कई बार हल्के या धुंधले दिखाई देते हैं। विज्ञान विषयों के चित्र, ग्राफ, रासायनिक संरचनाएं तथा गणितीय स्टेप्स स्क्रीन पर उतनी स्पष्टता से नजर नहीं आते, जितने मूल उत्तर पुस्तिका में दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में सही उत्तर भी परीक्षक की नजर से छूट जाने की संभावना बनी रहती है।

दूसरी महत्वपूर्ण समस्या समय और मानसिक दबाव से जुड़ी है। सीमित समय में बड़ी संख्या में कॉपियां जांचने का दबाव परीक्षकों पर बना रहता है। लगातार घंटों तक स्क्रीन पर कार्य करने से आंखों में थकान और मानसिक तनाव बढ़ता है, जिससे मूल्यांकन की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मूल्यांकन प्रक्रिया में मानवीय एकाग्रता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, और डिजिटल थकान इस एकाग्रता को कमजोर कर सकती है।

तीसरी बड़ी विसंगति विद्यालयी प्रदर्शन और बोर्ड परिणामों के बीच दिखाई देने वाला अत्यधिक अंतर है। यदि कोई छात्र पूरे वर्ष निरंतर अच्छा प्रदर्शन करता रहा हो, तो बोर्ड परीक्षा में उसके अंक अचानक बहुत कम आना कई सवाल खड़े करता है। निश्चित रूप से कुछ मामलों में विद्यार्थियों की अपेक्षाएं वास्तविकता से भिन्न हो सकती हैं, लेकिन जब बड़ी संख्या में समान शिकायतें सामने आएं, तो केवल विद्यार्थियों को दोष देना उचित नहीं कहा जा सकता।

आज अभिभावकों की सबसे बड़ी मांग यही है कि मूल्यांकन प्रक्रिया को पूर्णतः पारदर्शी बनाया जाए। विद्यार्थियों को उनकी उत्तर पुस्तिकाओं की स्पष्ट प्रतिलिपि उपलब्ध कराई जाए, प्रत्येक उत्तर पर दिए गए अंक स्पष्ट रूप से दर्शाए जाएं तथा पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाया जाए। कई अभिभावकों का यह भी कहना है कि पुनर्मूल्यांकन केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए।

शिक्षा विशेषज्ञों का सुझाव है कि जिन विद्यार्थियों के अंक विद्यालयी प्रदर्शन की तुलना में अत्यधिक कम आए हैं, उनकी कॉपियों की स्वतः दोबारा जांच होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त “डबल चेकिंग सिस्टम” लागू किया जा सकता है, जिसमें महत्वपूर्ण विषयों की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनः परीक्षण किसी दूसरे परीक्षक द्वारा भी किया जाए।

यह मुद्दा केवल अंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। कम अंक आने के बाद अनेक विद्यार्थी तनाव, अवसाद और आत्मग्लानि जैसी परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। कुछ छात्र स्वयं को असफल मानने लगे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि एक परीक्षा किसी व्यक्ति की सम्पूर्ण प्रतिभा का मापदंड नहीं हो सकती।

आज प्रतिस्पर्धा का दौर इतना तीव्र हो चुका है कि एक-दो प्रतिशत अंकों का अंतर भी कॉलेज प्रवेश और करियर अवसरों को प्रभावित कर देता है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, चार्टर्ड अकाउंटेंसी, कानून तथा विदेशों में उच्च शिक्षा प्रवेश जैसी प्रक्रियाओं में बोर्ड परीक्षा के अंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यदि मूल्यांकन में थोड़ी भी त्रुटि रह जाए, तो उसका प्रभाव विद्यार्थी के पूरे भविष्य पर पड़ सकता है।

शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, ज्ञान और रचनात्मकता विकसित करना होना चाहिए, न कि उन्हें केवल प्रतिशत की मशीन बनाना। तकनीक का उपयोग समय की आवश्यकता है, लेकिन तकनीक तभी सफल मानी जाएगी जब वह मानवीय संवेदनाओं, पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ जुड़ी हो।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों की चिंताओं को गंभीरता से सुने। यदि मूल्यांकन प्रणाली में कहीं भी खामी है, तो उसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

विद्यार्थियों को भी यह समझना होगा कि जीवन केवल एक परीक्षा परिणाम पर निर्भर नहीं करता। सफलता का मार्ग निरंतर प्रयास, धैर्य और आत्मविश्वास से निर्मित होता है। फिर भी यह शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि प्रत्येक विद्यार्थी को उसके परिश्रम का उचित, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण परिणाम मिले।