तनवीर जाफ़री
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गत 13-14 मई को चीन का बहुप्रतीक्षित दौरा किया। विश्व की इन दोनों महाशक्तियों के प्रमुखों की मुलाक़ात पर पूरे विश्व की निगाहें लगी हुई थीं। ख़ासकर अमेरिका-ईरान के मध्य चल रहे तनाव के बीच इस मुलाक़ात को काफ़ी अहम माना जा रहा था। दुनिया की नज़रें इस बात पर भी टिकी थीं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जोकि अनेक फ़्राँस,ब्रिटेन व यूक्रेन जैसे कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी असामान्य हरकतों से पेश आने व असहज करने वाले बयानों के लिये सुर्ख़ियों में रहते हैं, आख़िर चीन में उनकी भाषा,रवैय्या व बर्ताव कैसा रहेगा। बहरहाल,जिस अमेरिकी राष्ट्रपति के आगमन पर दुनिया के तमाम देश अपनी पलकें बिछाये रहते हैं और प्रायः अमेरिकी राष्ट्रपति के समकक्ष ही हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करते हैं वहीं बीजिंग में उनके स्वागत के लिये चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग स्वयं नहीं पहुंचे बल्कि उपराष्ट्रपति हान झेंग ने राष्ट्रपति ट्रंप का स्वागत किया। हान झेंग हालांकि सीधे तौर पर चीन के विदेश मंत्री नहीं हैं परन्तु विदेश मामलों में उनकी भूमिका मुख्यतः कूटनीतिक प्रतिनिधित्व, उच्च-स्तरीय मुलाक़ातें , और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की होती है।
ट्रंप और जिनपिंग के बीच बीजिंग में हुई एक उच्च‑स्तरीय बैठक के दौरान घटी एक असामान्य घटना ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा। बैठक के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अपने स्थान से उठने के बाद ट्रंप ने शी जिनपिंग के पास रखी उनकी व्यक्तिगत “डायरी” के पन्ने पलट कर चुपके से झांकने की कोशिश की। “निजी ताक-झांक” की इस हरकत को विशेषज्ञों व अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा ट्रंप की व्यक्तिगत शैली से जोड़कर देखा गया। इस घटना को दस्तावेज़ या नोट में बिना पूछे झांकना, दूसरे नेता को “पलायन” या नियंत्रण की स्थिति में दिखाना और संवाद‑दौरे के दौरान नर्म दबाव बनाने की चाल चलना आदि के रूप में भी परिभाषित किया गया। दुनिया ने चीन दौरे के दौरान उसी राष्ट्रपति ट्रंप राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ‘बॉडी लैंग्वेज ‘ पर भी नज़र रखी।
राष्ट्रपति ट्रंप चीन में अत्यंत संतुलित भाषा का प्रयोग करते और अपने चीनी समक्ष के सामने पूरी नरमी से पेश आते दिखाई दिये। अपनी चीन यात्रा के बाद अमेरिकी प्रशासन और स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा कई स्तरों पर बयान जारी किए गए जिनमें इस यात्रा को “ऐतिहासिक” और “सफल” बताया गया। ट्रंप ने अमेरिका वापस लौटने के बाद कहा कि शी जिनपिंग के साथ हुई बैठक को इतिहास में दो महान शक्तियों (G‑2) की ऐतिहासिक मुलाक़ात के रूप में याद किया जाएगा।उन्होंने इस मुलाक़ात को अविस्मरणीय भी कहा। उन्होंने बताया कि यह “दो महान देशों’ के नेताओं की मुलाक़ात थी । चीन यात्रा के बाद ईरान पर बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और चीन दोनों यह मानते हैं कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं मिलने चाहिए और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को “तुरंत खोलना” ज़रूरी है। परन्तु यह बात ट्रंप ने अमेरिका जा कर तो कही जबकि चीन की ओर से अपने बयान में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं हुआ। ट्रंप ने अपनी इस यात्रा को “सौदेबाज़ी की सफलता” और अमेरिकी उद्योगों के लिए बड़े अवसर के रूप में भी पेश किया।
उधर चीन की ओर से ट्रंप को ताइवान को लेकर सख़्त शब्दों में चेतावनी दी गयी जिसके बाद ताइवान मुद्दे पर ट्रंप की भाषा और रुख़ दोनों ही बदल गये। ट्रंप की यात्रा के बाद चीन ने अपनी “रेड लाइन” को दोहराया और ख़ासकर ताइवान मुद्दे पर अपना सख़्त लहजा रखा। चीनी विदेश मंत्रालय और राष्ट्रपति पक्ष के बयानों में ताइवान को अपना “अविभाज्य हिस्सा” बताया गया और यह चेतावनी दी गई कि अगर अमेरिका ने ताइवान के साथ सैन्य‑रणनीतिक संबंध बनाए या ताइवान को अधिक हथियार बेचे, तो यह दोनों ताक़तों के बीच “टकराव और यहां तक कि संघर्ष” को न्यौता दे सकता है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रंप के समक्ष चेतावनी भरे अंदाज़ में स्पष्ट शब्दों में ज़ोर देकर कहा कि ताइवान मुद्दा पूरी तरह चीन का “आंतरिक मामला” है और किसी बाहरी ताक़त को इसमें हस्तक्षेप करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी, “अगर इसे सही तरीक़े से नहीं संभाला गया तो दोनों देश टकराव या यहां तक कि संघर्ष की स्थिति में पहुंच सकते हैं। ” संभवतः यह पहला अवसर था जबकि किसी राष्ट्राध्यक्ष ने अमेरिकी राष्ट्रपति के समक्ष चेतावनी भरे लहजे में ‘टकराव और संघर्ष’ की बात कही हो।
चीन की इस चेतावनी के बाद जो अमेरिका व्यवहार में ताइवान को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक व सैन्य सहयोगी मानता आया है, उसे चीन से अपनी सुरक्षा के नाम पर हथियार देता है और चीन के विरोध के बावजूद उसकी स्वतंत्र‑जैसी स्थिति को बनाए रखने के लिए रणनीतिक तौर पर समर्थन देता है। उसी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ताइवान को चीन से वापसी के बाद अब औपचारिक रूप से ताइवान को आज़ादी का ऐलान करने के ख़िलाफ़ चेतावनी दे दी है। ट्रंप ने कहा है कि “मैं नहीं चाहता कि कोई स्वतंत्रता की ओर बढ़े। ट्रंप ने यह भी कहा कि “सोचिए, हमें युद्ध लड़ने के लिए 9,500 मील दूर जाना पड़ेगा। मैं ऐसा नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि हालात शांत हों। मैं चाहता हूं कि चीन भी शांत रहे। ” ग़ौरतलब है कि जो अमेरिका क़ानूनी तौर पर ताइवान को आत्मरक्षा के लिए संसाधन मुहैया कराने के लिए बाध्य था उसी अमेरिका को चीनी राष्ट्रपति की चेतावनी के बाद चीन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखने के कारण अब संतुलन साधना पड़ रहा है। उधर चीन स्पष्ट रूप से ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है। और वो ये भी कहता रहता है कि जरूरत पड़ने पर वह बल प्रयोग से उसे अपने अधीन कर सकता है।
चीन ने ईरान युद्ध को लेकर भी अमेरिकी रुख़ का समर्थन करने के बजाये इसे इस तरह की लड़ाई बताया जो “मूल रूप से होनी ही नहीं चाहिए थी” गोया अमेरिका-इस्राईल द्वारा ईरान पर थोपा गया युद्ध। चीन ने अमेरिका और ईरान के बीच जल्द समाधान की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। व्यापारिक स्तर पर भी ट्रंप को उतनी बड़ी सफलता हासिल नहीं हुई जितनी उम्मीद की जा रही थी। क्योंकि उनके साथ एलन मस्क,टिम कुक,जेन्सेन हुआंग,संजय मेहरोत्रा,केली ऑर्टबर्ग जैसे विश्व के 17 प्रमुख अमेरिकी उद्योगपति और कॉर्पोरेट अधिकारी बीजिंग गए थे। कुल मिलाकर ट्रंप को बीजिंग से जहां ताइवान को लेकर चेतावनी मिली वहीं ईरान मामले को लेकर भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल सका। ट्रंप की इस यात्रा के लिये बस यही कहा जा सकता है कि ‘बड़े बे आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’।





