धरती पर मौजूद जंतुओं तथा पौधों के बीच संतुलन बनाए रखने और जैव विविधता के मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि जैव विविधता पर संकट इसी प्रकार मंडराता रहा और इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में स्थितियां इतनी खतरनाक हो जाएंगी कि पृथ्वी से पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी।
योगेश कुमार गोयल
धरती पर जीवन का आधार केवल मनुष्य नहीं है बल्कि जीव-जंतु, पक्षी, कीट-पतंगे और पेड़-पौधे भी इस पारिस्थितिकी तंत्र का उतना ही अहम हिस्सा हैं। फिर भी मनुष्य ने अपने स्वार्थों और तथाकथित विकास के नाम पर जिस प्रकार वनों की अंधाधुंध कटाई, वन्य जीवों के आवासों का विनाश और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है, उसने धरती की जैव विविधता को गहरे संकट में डाल दिया है। जैव विविधता केवल कुछ जीवों या पौधों की गिनती भर नहीं है, यह पूरी पारिस्थितिकी का वह संतुलन है, जो जीवन को संभव और सुरक्षित बनाता है लेकिन आज यह संतुलन बुरी तरह से बिगड़ चुका है और इसके गंभीर परिणाम पूरी दुनिया भुगत रही है। धरती पर अनेक वन्य प्रजातियां या तो पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्त होने के कगार पर हैं।
यही नहीं, हजारों प्रजातियां आज संकटग्रस्त मानी जाती हैं, जिनके अस्तित्व पर हर बीतते वर्ष के साथ खतरा और अधिक बढ़ रहा है। यह संकट केवल जीव-जंतुओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि वनस्पतियों की विविधता भी उसी तीव्र गति से घट रही है।
जैव विविधता के महत्व को रेखांकित करने और लोगों को इसके संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए हर वर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 20 दिसंबर 2000 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से की गई थी, जिसे 193 देशों ने समर्थन दिया था। 22 मई 1992 को नैरोबी एक्ट के तहत जैव विविधता पर अभिसमय को स्वीकार किया गया था, इसी कारण 22 मई को यह दिवस तय किया गया। इस वर्ष यह दिवस ‘वैश्विक प्रभाव के लिए स्थानीय स्तर पर कार्य करना’ विषय के अंतर्गत मनाया जा रहा है. जो इस तथ्य को उजागर करता है कि पृथ्वी को बचाने की शुरुआत छोटे-छोटे स्थानीय प्रयासों से ही होती है। आज स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि जंगलों के उजड़ने से हजारों पक्षी और जानवर अपने प्राकृतिक आवास से वंचित हो गए हैं। पक्षियों की वे प्रजातियां, जो किसानों के हित में कीट नियंत्रण का काम करती थी, जैसे गिद्ध, कौए, चील, बाज, तीतर, बटेर, मोर आदि, अब संकटग्रस्त हो चुकी हैं। यह केवल जैव विविधता का नुकसान नहीं बल्कि कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए भी खतरे की घंटी है। ऐसे पक्षी खेतों में कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण करते थे लेकिन इनके लुप्त होने से अब कृत्रिम कीटनाशकों की निर्भरता बढ़ रही है, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए घातक है।
पर्यावरणीय असंतुलन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग और लगातार बढ़ती आबादी जैव विविधता संकट के प्रमुख कारक हैं। एक ओर जहां जंगलों की अंधाधुंध कटाई के चलते पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवास खत्म हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पेड़-पौधों की दुर्लभ प्रजातियां भी मानव गतिविधियों के कारण धीरे-धीरे मिट रही हैं। यही कारण है कि जैव विविधता का संरक्षण आज केवल पर्यावरणविदों का मुद्दा नहीं बल्कि यह पूरी मानव जाति के अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन गया है। वन्यजीव और वनस्पतियां धरती पर जीवन की लंबी विकास यात्रा की अहम कड़ियां हैं। ये सभी प्रजातियां अरबों वर्षों के जैविक और पारिस्थितिक विकास का परिणाम हैं। वन्य जीवन में वे सभी जीव-जंतु और पौधे शामिल होते हैं, जिन्हें मनुष्य द्वारा पाला तो नहीं जाता लेकिन उनका अस्तित्व भी मानवीय गतिविधियों से सीधे तौर पर प्रभावित होता है। जैसे-जैसे जंगल उजड़ते हैं, इन प्रजातियों का जीवन संकटग्रस्त होता जाता है। दुर्भाग्य की बात यह है कि मनुष्य ने अपने भौतिक विकास और बढ़ती जनसंख्या के दबाव में इस पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन की अनदेखी की है।
यह तथ्य अब वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित हो चुका है कि जैव विविधता के घटने से पर्यावरण का असंतुलन बढ़ता है और इससे प्राकृतिक आपदाएं, जलवायु परिवर्तन, अकाल, सूखा, बाढ़, रोगों का प्रसार जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। मेरी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है कि जैव विविधता में आ रही कमी किस प्रकार हमारे संपूर्ण जीवन और पर्यावरण को अस्थिर बना रही है। यह केवल प्रकृति का संकट नहीं बल्कि यह हमारे भविष्य पर मंडराता हुआ खतरा है। धरती पर हर देश की अपनी विशिष्ट जलवायु और पारिस्थितिक पहचान होती है, जिससे वहां की जैव विविधता भी विशिष्ट होती है लेकिन वनों की कटाई, खनन, शहरीकरण, औद्योगीकरण, रासायनिक खेती, प्लास्टिक प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन जैसे मानवीय कारकों ने इस विविधता को संकट में डाल दिया है। दुर्भाग्य से यह संकट केवल कुछ स्थानीय प्रजातियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब यह वैश्विक स्तर पर विनाश की ओर बढ़ रहा है।
आज मानव अपने स्वार्थ और भौतिक जीवन के मोह में यह भूल गया है कि जीवन की आधारशिला प्रकृति ही है। वनों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और पारिस्थितिक तंत्र की अनदेखी मानव को उस दिशा में ले जा रही है, जहां जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। यदि समय रहते हमने चेतना नहीं दिखाई तो आने वाले समय में ऐसी कई प्रजातियां होंगी, जो केवल पुस्तकों और संग्रहालयों में ही मिलेंगी। विकास अनिवार्य है, इसमें कोई संदेह नहीं परंतु वह विकास, जो प्राकृतिक संसाधनों को खत्म करके हासिल हो, वह आत्मघाती है। हमें ऐसा विकास मॉडल अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें प्रकृति के साथ सहअस्तित्व को महत्व दिया जाए। यदि पेड़ कटेंगे, जल स्रोत सूखेंगे, जीव-जंतु लुप्त होंगे और पक्षी गायब होंगे तो यह केवल जैव विविधता की हानि नहीं होगी बल्कि पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
अब आवश्यकता इस बात की है कि जैव विविधता के संरक्षण को नीतिगत प्राथमिकता दी जाए। सरकारें यदि वन नीति, जल नीति, कृषि नीति और शहरी विकास नीति में पारिस्थितिक संतुलन को अनिवार्य रूप से शामिल करें तो जैव विविधता का संरक्षण संभव हो सकता है। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि यह केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि हर व्यक्ति का दायित्व है। प्रत्येक वृक्ष की रक्षा, जल स्रोतों का संरक्षण, प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा और जैव विविधता के महत्व को समझना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है। जैव विविधता केवल प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक नहीं बल्कि जीवन का मूल आधार है।
पृथ्वी की समृद्धि और जीवन की निरंतरता इसी विविधता पर निर्भर करती है। यदि आज हमने संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए तो कल हमें इसका भयावह मूल्य चुकाना पड़ेगा। जैव विविधता का संरक्षण अब केवल पर्यावरणीय मसला नहीं बल्कि मानव जाति की अस्तित्व रक्षा का संघर्ष बन चुका है।धरती पर मौजूद जंतुओं तथा पौधों के बीच संतुलन बनाए रखने और जैव विविधता के मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि जैव विविधता पर संकट इसी प्रकार मंडराता रहा और इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में स्थितियां इतनी खतरनाक हो जाएंगी कि पृथ्वी से पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। इसी पर विशेष लेख ‘‘इको सिस्टम के लिए जरूरी है जैव विविधता संरक्षण’’ संलग्न है।





