डॉ. सत्यवान सौरभ
विद्यालयों में अध्यापकों के मोबाइल फ़ोन उपयोग को लेकर एक बार फिर बहस तेज़ हो गई है। कहीं नए आदेश जारी हो रहे हैं, कहीं निरीक्षण के दौरान शिक्षकों को चेतावनियाँ दी जा रही हैं, तो कहीं यह टिप्पणी सुनने को मिलती है कि “कक्षा में मोबाइल शिक्षक की लापरवाही का प्रतीक है।” पहली नज़र में यह बात अनुशासन और शिक्षा के हित में उचित प्रतीत होती है। सचमुच, जब शिक्षक पढ़ाने के बजाय मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त दिखाई दे तो विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
लेकिन जब इस पूरे विषय को सतह से नीचे जाकर देखा जाता है, तब एक अलग ही सच्चाई सामने आती है। सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में मोबाइल समस्या है, या फिर समस्या उस व्यवस्था की है जिसने शिक्षा को इतनी अधिक डिजिटल निर्भरता में बाँध दिया है कि शिक्षक के हाथ से मोबाइल अलग करना लगभग असंभव हो गया है?
आज शिक्षा व्यवस्था का लगभग हर कार्य ऑनलाइन माध्यमों पर आधारित हो चुका है। विद्यार्थियों की उपस्थिति पोर्टल पर भरनी है, विभागीय पत्र मोबाइल पर प्राप्त होते हैं, परीक्षा परिणाम ऑनलाइन अपलोड करने हैं, छात्रवृत्ति का डेटा डिजिटल करना है, यू-डाइस पोर्टल अपडेट करना है, विभिन्न सर्वे भरने हैं, बैठकों की सूचना व्हाट्सऐप समूहों में आती है और ऊपर से हर कुछ दिनों में कोई नया लिंक या नया ऐप शिक्षकों के सामने आ जाता है।
विडंबना देखिए कि एक ओर सरकार और विभाग “डिजिटल इंडिया” और “स्मार्ट एजुकेशन” का प्रचार करते हैं, दूसरी ओर उसी डिजिटल प्रक्रिया को निभाने वाला शिक्षक मोबाइल हाथ में ले तो वह संदेह के घेरे में आ जाता है। विभाग के आदेश व्हाट्सऐप पर आएँगे, जवाब तुरंत माँगा जाएगा, देर होने पर जवाबदेही तय होगी, लेकिन यदि शिक्षक मोबाइल का प्रयोग करे तो उसे अनुशासनहीनता का प्रतीक घोषित कर दिया जाएगा। यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था की दोहरी मानसिकता को उजागर करती है।
निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि मोबाइल का दुरुपयोग नहीं होता। कई स्थानों पर ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ कुछ शिक्षक पढ़ाई के समय निजी कॉल, सोशल मीडिया या अनावश्यक चैट में व्यस्त रहते हैं। यह न केवल शिक्षा की गरिमा के विरुद्ध है, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य के साथ भी अन्याय है। कक्षा ज्ञान का मंदिर है, निजी मनोरंजन का मंच नहीं।
लेकिन क्या कुछ लोगों की गलती के कारण पूरे शिक्षक समुदाय पर कठोर प्रतिबंध थोप देना न्यायसंगत होगा? यदि किसी वाहन चालक के कारण दुर्घटना होती है तो क्या पूरे समाज के वाहनों पर रोक लगा दी जाती है? यदि कुछ विद्यार्थी मोबाइल का दुरुपयोग करते हैं तो क्या पूरी तकनीक को दोषी मान लिया जाता है? किसी साधन का गलत उपयोग उस साधन की आवश्यकता और उपयोगिता को समाप्त नहीं कर देता।
असल समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसके उपयोग की संस्कृति है।
आज शिक्षक केवल अध्यापक नहीं रह गया है। वह शिक्षक के साथ-साथ डेटा एंट्री ऑपरेटर, पोर्टल मैनेजर, सर्वे कर्मचारी और प्रशासनिक सहायक की भूमिका भी निभा रहा है। कभी पोर्टल नहीं खुल रहा, कभी लिंक फेल हो रहा है, कभी देर रात तक रिपोर्ट माँगी जा रही है, तो कभी छुट्टी के दिन भी ऑनलाइन मीटिंग का संदेश आ जाता है। शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग अब यह महसूस करने लगा है कि पढ़ाने से अधिक समय कागजी और डिजिटल प्रक्रियाओं में खर्च हो रहा है।
स्थिति इतनी विचित्र हो चुकी है कि कई बार शिक्षक आधा दिन विद्यार्थियों को पढ़ाने में और आधा दिन मोबाइल या लैपटॉप पर सरकारी कार्य पूरा करने में बिताता है। ऊपर से अपेक्षा यह रहती है कि परिणाम भी उत्कृष्ट हों, रिकॉर्ड भी अपडेट रहे, हर पोर्टल समय पर भरा जाए और मोबाइल भी हाथ में न दिखाई दे। यह वैसा ही है जैसे किसी व्यक्ति से कहा जाए कि पानी में उतरकर भीगना मत।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि मोबाइल पर इतना ही विरोध है तो क्या शिक्षा विभाग अपने सभी आदेश ऑफलाइन देने को तैयार है? क्या हर विद्यालय में पर्याप्त कंप्यूटर, तेज इंटरनेट और तकनीकी कर्मचारी उपलब्ध हैं? क्या हर शिक्षक को अलग डिजिटल संसाधन दिए गए हैं? क्या सरकारी कार्यों के लिए अलग संस्थागत उपकरण उपलब्ध हैं?
सच्चाई यह है कि अधिकांश स्कूलों में बुनियादी डिजिटल सुविधाएँ भी पूरी नहीं हैं। कई शिक्षक अपने निजी मोबाइल, अपने इंटरनेट डेटा और अपने संसाधनों से सरकारी कार्य करते हैं। विभागीय आदेशों का पालन भी अपने खर्च पर करते हैं, लेकिन जब वही मोबाइल कक्षा में दिखाई देता है तो संदेह का वातावरण बन जाता है।
यह विरोधाभास केवल शिक्षा व्यवस्था का नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक दृष्टिकोण का भी हिस्सा बन चुका है। समाज आज तकनीक का लाभ तो चाहता है, लेकिन उसके उपयोग की जटिलताओं को स्वीकार नहीं करना चाहता। हम चाहते हैं कि शिक्षक आधुनिक भी हो, डिजिटल भी हो, हर जानकारी से अपडेट भी रहे, लेकिन मोबाइल हाथ में लेते ही उसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाए।
कोविड-19 महामारी के समय यही मोबाइल शिक्षा का सबसे बड़ा सहारा बना था। जब विद्यालय बंद थे, तब अध्यापक अपने मोबाइल के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाएँ ले रहे थे, नोट्स भेज रहे थे, वीडियो बना रहे थे और विद्यार्थियों तक शिक्षा पहुँचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे। उस समय समाज ने शिक्षकों को “डिजिटल योद्धा” कहा था। लेकिन महामारी के बाद वही मोबाइल अचानक अनुशासन का दुश्मन घोषित कर दिया गया।
दरअसल समस्या तकनीक नहीं, बल्कि संतुलन की कमी है। यदि शिक्षक मोबाइल का उपयोग शैक्षणिक सामग्री दिखाने, जानकारी खोजने, विद्यार्थियों के प्रश्नों का समाधान करने या विभागीय कार्य पूरा करने के लिए करता है, तो वही तकनीक शिक्षा को आधुनिक और प्रभावी बना सकती है। लेकिन यदि उसका उपयोग निजी मनोरंजन और समय बर्बादी के लिए हो, तो वह गलत है।
इसलिए आवश्यकता पूर्ण प्रतिबंध की नहीं, बल्कि स्पष्ट और संतुलित नीति की है। विद्यालयों में ऐसे दिशा-निर्देश बनाए जा सकते हैं जिनमें कक्षा के दौरान मोबाइल का उपयोग केवल शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों तक सीमित रहे। निजी कॉल, सोशल मीडिया और अनावश्यक चैट पर स्पष्ट रोक हो। यदि कोई शिक्षक लगातार दुरुपयोग करता है तो व्यक्तिगत स्तर पर कार्रवाई की जाए, लेकिन पूरी शिक्षकीय व्यवस्था को संदेह की निगाह से न देखा जाए।
इसके साथ-साथ शिक्षा विभाग को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि शिक्षा को डिजिटल बनाना है तो विद्यालयों में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ। हर सरकारी कार्य शिक्षक के निजी मोबाइल पर डाल देना और फिर उसी मोबाइल के उपयोग पर सवाल उठाना कहीं न कहीं व्यवस्था की असंगति को दर्शाता है।
आज का विद्यार्थी डिजिटल युग में जी रहा है। वह इंटरनेट, स्मार्टफोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया का हिस्सा है। ऐसे समय में यदि शिक्षक तकनीक से पूरी तरह दूर कर दिया जाएगा तो शिक्षा व्यवस्था समय से पीछे छूट जाएगी। आवश्यकता यह नहीं कि मोबाइल छीन लिया जाए, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाए कि उसका उपयोग जिम्मेदारी और मर्यादा के साथ हो।
शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है। यदि वही तकनीक का संतुलित उपयोग नहीं करेगा तो विद्यार्थियों को डिजिटल अनुशासन कौन सिखाएगा? विद्यालयों का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। डिजिटल अनुशासन भी उसी शिक्षा का हिस्सा है।
आज जरूरत यह है कि शिक्षक को दोषी मानने की मानसिकता बदली जाए। यह समझना होगा कि व्यवस्था ने उसके हाथ में केवल चॉक नहीं, बल्कि मोबाइल भी थमा दिया है। जब हर आदेश ऑनलाइन होगा, हर रिपोर्ट डिजिटल होगी और हर सूचना व्हाट्सऐप पर आएगी, तब मोबाइल शिक्षक की जेब में नहीं, उसकी जिम्मेदारियों में दिखाई देगा।
इसलिए समाधान प्रतिबंध नहीं, संतुलन है। मोबाइल को दुश्मन मानकर शिक्षा व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। तकनीक को समझदारी से अपनाना और उसके उपयोग की मर्यादा तय करना ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वरना स्थिति यही रहेगी— शिक्षक पढ़ाए भी, पोर्टल भी भरे और फिर पूछा जाए कि मोबाइल क्यों चला रहे हो?
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)





