सत्य भूषण शर्मा
धरती केवल मिट्टी, पानी और पत्थरों का निर्जीव गोला नहीं है, बल्कि यह अनगिनत जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों, जंगलों और सूक्ष्म जीवों से मिलकर बना एक जीवंत संसार है। प्रकृति का यही विविधतापूर्ण और संतुलित स्वरूप “जैव विविधता” कहलाता है। जब जंगलों में हिरण कुलांचे भरते हैं, तितलियाँ फूलों पर मंडराती हैं, पक्षी मधुर स्वर में गान करते हैं और नदियाँ जीवन का संगीत सुनाती हैं, तब वास्तव में पृथ्वी अपनी सम्पूर्ण सुंदरता में दिखाई देती है।
प्रतिवर्ष 22 मई को पूरी दुनिया में अन्तरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराने का महत्वपूर्ण अवसर है। आज जब पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, तब जैव विविधता संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
क्या है जैव विविधता?
सरल शब्दों में कहा जाए तो पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, सूक्ष्म जीवों तथा उनके प्राकृतिक आवासों की विविधता को जैव विविधता कहा जाता है। इसमें जंगल, नदियाँ, समुद्र, रेगिस्तान, पर्वत, खेत, वन्य जीव और पक्षी सभी शामिल हैं। यही विविधता प्रकृति को संतुलित बनाए रखती है।
यदि प्रकृति में केवल मनुष्य ही होता और अन्य जीव-जंतु या पेड़-पौधे नहीं होते, तो पृथ्वी पर जीवन असंभव हो जाता। हर जीव का अपना महत्व है। मधुमक्खियाँ फसलों के परागण में सहायता करती हैं, पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, नदियाँ जीवन देती हैं और वन्य जीव पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं।
भारत : जैव विविधता का अद्भुत खजाना
भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर राजस्थान के तपते रेगिस्तान तक, पश्चिमी घाटों के घने जंगलों से लेकर सुंदरबन के मैंग्रोव वनों तक प्रकृति ने भारत को अनूठी विविधता प्रदान की है।
देश में हजारों प्रकार की औषधीय वनस्पतियाँ, दुर्लभ पक्षी, वन्य जीव और समुद्री जीव पाए जाते हैं। बाघ, हाथी, गैंडा, मोर और एशियाई शेर जैसी अनेक प्रजातियाँ भारत की प्राकृतिक धरोहर हैं। भारतीय संस्कृति में भी प्रकृति को देवतुल्य माना गया है। तुलसी, पीपल, बरगद और नदियों की पूजा हमारी संस्कृति में प्रकृति संरक्षण की महान भावना को दर्शाती है।
विकास की अंधी दौड़ और संकट में प्रकृति
आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति का अत्यधिक दोहन शुरू कर दिया है। जंगलों की कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, प्लास्टिक प्रदूषण और रासायनिक खेती ने जैव विविधता को गहरा नुकसान पहुँचाया है।
आज अनेक जीव-जंतु विलुप्त हो चुके हैं और हजारों प्रजातियाँ समाप्ति के कगार पर हैं। कभी गांवों और शहरों में सहज दिखाई देने वाली गौरैया अब दुर्लभ होती जा रही है। नदियों का प्रदूषण जलचर जीवों के लिए संकट बन चुका है। समुद्रों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा मछलियों और अन्य जीवों की जान ले रहा है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम चक्र भी प्रभावित हो रहा है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ रही है तो कहीं बाढ़ और सूखा मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। इन सभी समस्याओं का सीधा संबंध जैव विविधता के असंतुलन से है।
जैव विविधता क्यों है जरूरी?
जैव विविधता केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ाती, बल्कि मानव जीवन की आधारशिला है। भोजन, दवाइयाँ, ईंधन, वस्त्र और अनेक जीवनोपयोगी संसाधन हमें प्रकृति से ही प्राप्त होते हैं।
विश्व की अनेक जीवनरक्षक दवाइयाँ पौधों और जड़ी-बूटियों से बनाई जाती हैं। कृषि उत्पादन भी प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि मधुमक्खियाँ और अन्य परागण करने वाले जीव समाप्त हो जाएँ तो खाद्यान्न उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित होगा।
पेड़-पौधे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं। जंगल वर्षा लाने में सहायक होते हैं। यदि जैव विविधता समाप्त हो जाएगी तो पृथ्वी पर जीवन का संतुलन भी बिगड़ जाएगा।
युवाओं और समाज की भूमिका
प्रकृति संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी। विशेष रूप से युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आना चाहिए।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में वृक्षारोपण अभियान, जल संरक्षण कार्यक्रम और पर्यावरण जागरूकता गतिविधियाँ नियमित रूप से आयोजित होनी चाहिए। लोगों को प्लास्टिक का कम उपयोग करने, जल बचाने और पर्यावरण मित्र जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा।
यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प ले, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा परिवर्तन संभव है।
तकनीक और पर्यावरण में संतुलन जरूरी
विज्ञान और तकनीक मानव जीवन को सरल बनाते हैं, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो प्रकृति के अनुकूल हो। “सतत विकास” की अवधारणा आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हमें ऐसी तकनीकों को अपनाना होगा जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाएँ। सौर ऊर्जा, वर्षा जल संरक्षण, जैविक खेती और हरित ऊर्जा जैसे उपाय पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भविष्य के लिए चेतावनी
यदि आज भी मानव समाज नहीं जागा तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और प्राकृतिक सुंदरता केवल कहानियों में ही देखने को मिलेगी। जंगलों का विनाश, बढ़ता तापमान और घटती जैव विविधता भविष्य के लिए गंभीर खतरा हैं।
मानव को यह समझना होगा कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा है। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना असंभव है।
निष्कर्ष
अन्तरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि हम पृथ्वी को सुरक्षित और सुंदर बनाना चाहते हैं तो हमें जैव विविधता के संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा।
आइए, इस अवसर पर हम सब यह संकल्प लें कि पेड़-पौधों, नदियों, वन्य जीवों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करेंगे तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने का प्रयास करेंगे। क्योंकि सच यही है—“प्रकृति बचेगी तो पृथ्वी बचेगी, और पृथ्वी बचेगी तो मानवता मुस्कुराएगी।”





