एन जी भट्ट
राजस्थान की तीन राज्यसभा सीटों के लिए हो रहे चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचित होना लगभग तय माना जा रहा है। भाजपा ने पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया और डॉ. अलका गुर्जर को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस ने अपने वर्तमान सांसद नीरज डांगी पर पुनः भरोसा जताया है। तीन सीटों के लिए केवल तीन ही प्रमुख उम्मीदवार मैदान में होने से चुनावी मुकाबले की स्थिति नहीं बन पाई है। यह परिस्थिति राजस्थान की वर्तमान राजनीतिक शक्ति-संतुलन और दोनों दलों की रणनीतिक प्राथमिकताओं को भी दर्शाती है।
राजस्थान से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए होने वाले द्विवार्षिक निर्वाचन के लिए सोमवार को भारतीय जनता पार्टी की ओर से डॉ अलका सिंह गुर्जर एवं डॉ सतीश पूनिया ने रिटर्निंग ऑफिसर भारत भूषण शर्मा को नामांकन पत्र प्रस्तुत किये। अलका सिंह गुर्जर द्वारा नामांकन पत्र दाखिल करते समय मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सांसद मदन राठौड़ एवं पूर्व मंत्री नाथू सिंह गुर्जर उपस्थित थे। डॉ सतीश पूनिया द्वारा नामांकन पत्र दाखिल करते समय मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, मदन राठौड़, उप मुख्यमंत्री श्रीमती दीया कुमारी एवं उप मुख्यमंत्री प्रेम चंद बैरवा उपस्थित थे। डॉ अलका सिंह ने दो नामांकन पत्र दाखिल किये एवं डॉ सतीश पूनिया ने चार नामांकन पत्र दाखिल किये।
राज्यसभा चुनाव सामान्यतः राजनीतिक दलों की संगठनात्मक ताकत, विधायकों की संख्या और दलगत अनुशासन की परीक्षा माने जाते हैं। राजस्थान विधानसभा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है। ऐसे में दो सीटों पर भाजपा की जीत पहले से ही सुनिश्चित मानी जा रही थी। कांग्रेस के पास भी इतनी संख्या है कि वह अपनी एक सीट आसानी से जीत सकती है। यही कारण है कि दोनों दलों ने अपने-अपने उम्मीदवारों के चयन में राजनीतिक संदेशों और भविष्य की रणनीति को प्राथमिकता दी।
भाजपा द्वारा डॉ. सतीश पूनिया को राज्यसभा भेजने का निर्णय विशेष महत्व रखता है। पूनिया लंबे समय तक राजस्थान भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे हैं और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। विधानसभा चुनावों के बाद उन्हें कोई बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं मिली थी, इसलिए राज्यसभा का यह अवसर उनके राजनीतिक अनुभव और संगठन के प्रति योगदान का सम्मान माना जा रहा है। साथ ही यह संकेत भी है कि पार्टी उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका देना चाहती है। दूसरी ओर डॉ. अलका गुर्जर का चयन भाजपा की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है। राजस्थान की राजनीति में गुर्जर समाज का प्रभाव महत्वपूर्ण है। महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने के साथ-साथ सामाजिक संतुलन साधने की दृष्टि से भी उनका चयन भाजपा के लिए लाभकारी माना जा रहा है। इससे पार्टी महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समावेशन का संदेश देने में सफल रही है।
कांग्रेस ने नीरज डांगी को दोबारा उम्मीदवार बनाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी अपने अनुभवी और सक्रिय सांसदों पर विश्वास बनाए रखना चाहती है। डांगी राज्यसभा में राजस्थान से जुड़े विभिन्न मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाते रहे हैं। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि संसद के उच्च सदन में उनका अनुभव और सक्रियता कांग्रेस की आवाज को मजबूत बनाएगी। ऐसे समय में जब कांग्रेस संगठनात्मक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रही है, अनुभवी नेताओं को आगे बढ़ाना उसकी प्राथमिकता दिखाई देती है।
निर्विरोध निर्वाचन की संभावना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इससे चुनावी प्रतिस्पर्धा से जुड़ी अनिश्चितताओं का अंत हो जाता है। सामान्यतः राज्यसभा चुनावों के दौरान क्रॉस वोटिंग, राजनीतिक जोड़-तोड़ और दल-बदल जैसी चर्चाएँ सुर्खियों में रहती हैं। लेकिन इस बार राजस्थान में ऐसी कोई स्थिति नहीं बन रही है। इससे राजनीतिक दलों का समय और संसाधन दोनों बचेंगे तथा विधानसभा का वातावरण भी अपेक्षाकृत शांत रहेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल सांसद चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि दोनों दलों के संगठनात्मक संदेशों का माध्यम भी है। भाजपा ने संगठन और सामाजिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी है, जबकि कांग्रेस ने अनुभव और निरंतरता पर भरोसा जताया है। इससे आने वाले समय में दोनों दलों की राजनीतिक दिशा और प्राथमिकताओं का भी संकेत मिलता है।
राजस्थान की राजनीति में राज्यसभा चुनाव अक्सर राष्ट्रीय राजनीति के संकेतक माने जाते हैं। इस बार का निर्विरोध चुनाव यह दर्शाता है कि विधानसभा में संख्याबल की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है और राजनीतिक दल अपने संसदीय प्रतिनिधित्व को लेकर आश्वस्त हैं। यदि नाम वापसी की अंतिम तिथि तक कोई अप्रत्याशित घटनाक्रम नहीं होती,तो भाजपा के डॉ. सतीश पूनिया और डॉ. अलका गुर्जर तथा कांग्रेस के नीरज डांगी निर्विरोध राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होंगे।
कुल मिलाकर राजस्थान का यह राज्यसभा चुनाव राजनीतिक संघर्ष से अधिक राजनीतिक संदेश का चुनाव बन गया है। इसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने संगठन, सामाजिक समीकरणों और भविष्य की रणनीति को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया है। निर्विरोध निर्वाचन लोकतांत्रिक प्रक्रिया की एक शांत और सहज तस्वीर प्रस्तुत करता है, वहीं यह भी बताता है कि राजस्थान की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में दोनों प्रमुख दल अपनी-अपनी स्थिति को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं।





