सुनील कुमार महला
बच्चे किसी भी देश का भविष्य और उसकी वास्तविक नींव होते हैं। यदि उनका बचपन ही मजदूरी के बोझ तले दब जाएगा, तो एक स्वस्थ, शिक्षित और समृद्ध समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। बाल श्रम बच्चों के बचपन, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के अधिकारों का सीधा हनन करता है। इसलिए इसका उन्मूलन केवल कानूनी आवश्यकता ही नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, औजार नहीं। उनका वास्तविक स्थान फैक्ट्रियों और कार्यस्थलों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में है। बाल श्रम को रोकना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामाजिक कर्तव्य भी है।
बाल श्रम के विरुद्ध वैश्विक स्तर पर एक सशक्त आवाज बुलंद करने और लोगों को जागरूक बनाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। यह दिवस बच्चों से मजदूरी करवाने की प्रथा के खिलाफ जन-जागरूकता फैलाने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित है। आज भी बाल श्रम विश्व की एक गंभीर समस्या बनी हुई है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना तथा समाज से बाल श्रम जैसी कुप्रथा को जड़ से समाप्त करना है।वास्तव में, आज भी दुनिया भर में करोड़ों बच्चे शिक्षा और खेलकूद से दूर रहकर खतरनाक उद्योगों, फैक्ट्रियों तथा घरेलू कार्यों में मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। बाल श्रम उनके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो, ताकि वे मजदूरी छोड़कर विद्यालय जा सकें और अपने जीवन को बेहतर बना सकें।
इस दिवस को मनाने के प्रमुख उद्देश्यों में बाल श्रम को समाप्त करना, इसके प्रति जागरूकता फैलाना, सरकारों और संस्थाओं को बाल श्रम विरोधी कड़े कानून बनाने तथा उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने के लिए प्रेरित करना और बच्चों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालकर उनका उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करना शामिल है।
यहां उल्लेखनीय है कि विश्व बाल श्रम निषेध दिवस की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) द्वारा वर्ष 2002 में की गई थी। पिछले वर्ष (2025) इस दिवस की थीम ‘समानता और न्याय: बाल श्रम का अंत’ रखी गई थी। इस थीम का मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना था कि सामाजिक असमानताओं को दूर किए बिना बाल श्रम का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। वहीं, वर्ष 2026 की थीम ‘हमारी प्रतिबद्धता: बाल श्रम मुक्त भविष्य’ निर्धारित की गई है। यह थीम दुनिया भर के देशों और संगठनों को अपने संकल्पों को पूरा करने तथा बाल श्रम को पूरी तरह समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाने का आह्वान करती है।आईएलओ की रिपोर्टों के अनुसार, आज भी दुनिया भर में लगभग 16 करोड़ बच्चे बाल श्रम करने के लिए विवश हैं, जिनमें से अनेक अत्यंत खतरनाक परिस्थितियों में कार्य करते हैं। कुछ अन्य आंकड़ों के अनुसार विश्व में लगभग 13.8 करोड़ (138 मिलियन) बच्चे अभी भी बाल श्रम में संलग्न हैं, जबकि इनमें से लगभग 5.4 करोड़ (54 मिलियन) बच्चे ऐसे खतरनाक कार्यों में लगे हुए हैं जो उनके स्वास्थ्य और विकास के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करते हैं।उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज भी बाल श्रम का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में पाया जाता है, जहां लगभग 61 प्रतिशत बाल श्रमिक कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त सेवा क्षेत्र (दुकानें, होटल, ढाबे, घरेलू कार्य आदि) में लगभग 27 प्रतिशत तथा उद्योग क्षेत्र (कारखाने, खदानें और निर्माण कार्य आदि) में लगभग 13 प्रतिशत बाल श्रमिक कार्य करते हैं।यदि हम यहां पर अपने देश भारत की बात करें, तो यहां खेतों और कृषि कार्यों में, ईंट-भट्टों पर, ढाबों, चाय की दुकानों और होटलों में, घरेलू नौकर के रूप में, कल-कारखानों और लघु औद्योगिक इकाइयों में, कालीन, कांच, पटाखा, बीड़ी तथा वस्त्र उद्योगों में, साथ ही खदानों और निर्माण स्थलों पर बाल श्रम की घटनाएं अक्सर देखने और सुनने को मिलती हैं। ऐसी खबरें समय-समय पर समाचार पत्रों और मीडिया की सुर्खियां भी बनती रहती हैं। बाल श्रम की समस्या प्रायः गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से जुड़ी होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 24 के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों और अन्य खतरनाक कार्यों में लगाने पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसके अतिरिक्त बाल श्रम (निषेध एवं नियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के अंतर्गत दोषियों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है।यह भी उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के लक्ष्य 8.7 के तहत वर्ष 2025 तक बाल श्रम के सभी रूपों को समाप्त करने का संकल्प लिया गया था, जिसकी दिशा में विभिन्न देश निरंतर कार्य कर रहे हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि बाल श्रम का पूर्ण उन्मूलन तभी संभव है, जब प्रत्येक बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और विकास के समान अवसर उपलब्ध हों। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। परिवारों को रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सहायता प्रदान करनी होगी, ताकि बच्चों को मजदूरी के बजाय शिक्षा की ओर प्रेरित किया जा सके। साथ ही, बाल श्रम संबंधी कानूनों का कठोरता से पालन सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।समाज में लोगों को बाल श्रम के दुष्परिणामों तथा बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूक करना समय की मांग है। कौशल विकास और रोजगार के अवसरों का विस्तार करके, बाल श्रमिकों के पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था करके तथा सरकार, समाज और परिवार के संयुक्त प्रयासों से बाल श्रम को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।
हमें सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि बच्चे देश और समाज की अमूल्य धरोहर हैं। उनका सुरक्षित और खुशहाल बचपन ही राष्ट्र के सुरक्षित, सशक्त और समृद्ध भविष्य की आधारशिला है। जब देश का प्रत्येक बच्चा सुरक्षित, शिक्षित और स्वस्थ होगा, तभी समाज और राष्ट्र का भविष्य वास्तव में उज्ज्वल बन सकेगा। सरल शब्दों में कहें तो जब हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान प्राप्त होगा, तभी देश और समाज का भविष्य सुरक्षित, समृद्ध और गौरवशाली होगा। इसलिए बाल श्रम का उन्मूलन केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है।





