पी ओ के में गूंज रही ‘आजादी’ की गूंज : पाकिस्तानी जुल्म के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग

Echoes of ‘Azadi’ Resonate in PoK: People Take to the Streets Against Pakistani Oppression

अशोक भाटिया

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पी ओ के )में बुनियादी अधिकारों, महंगाई और बिजली की भारी कीमतों को लेकर पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ विद्रोह छिड़ गया है। हजारों लोग सड़कों पर उतरकर ‘आजादी’ के नारे लगा रहे हैं, जिसे दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना (जनरल आसिम मुनीर) द्वारा निहत्थे नागरिकों पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई जा रही हैं।पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में इस वक्त तनाव चरम पर है। हजारों लोग आजादी की मांग लिए सड़कों पर उतरे हैं। इस बीच पाकिस्तानी सेना की बर्बरता की ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जिन्हें देखकर आपका दिल भी पसीज जाएगा। पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की सेना पी .ओ .के के निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसा रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक हिंसा में अब तक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और सरकार विरोध दबाने के लिए हर तरह के नापाक हथकंडे अपना रही है। एक वीडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह एक शख्स पर पाक सेना ने तब तक फायरिंग की, जब तक वह गोलियों से छलनी नहीं हो गया।

जानकारी के मुताबिक यह वीडियो रावलाकोट का है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और लोग वैश्विक समुदाय से लगातार पाकिस्तान को उसकी इस घटिया करतूत के लिए जिम्मेदार ठहराने की मांग कर रहे हैं। वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बल एक निहत्थे स्थानीय नागरिक पर अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे हैं, जबकि वह नागरिक अपनी जान बचाने के लिए छिपने की जगह ढूंढ रहा है। इंटरनेट पर ऐसी दूसरी कई तस्वीरें भी सामने आई हैं।

प्रदर्शनकारियों ने चावल, दाल और आटे की महंगाई और आजादी की मांग उठा रहे है । प्रशासन पर वादों से मुकरने का आरोप भी लगाया जा रहा है । प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें रोकने के लिए गोलियां चलाई गईं, पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया और आंसू गैस के गोले छोड़े गए। इस कार्रवाई में कम से कम सात लोगों के घायल होने की खबर है। कोटली में भी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। पाकिस्तान विरोधी नारे लगाए गए।ददयाल में भी पाक सेना के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। पूरे इलाके में लोगों का गुस्सा दिखा, जिसका असर रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ा। मुजफ्फराबाद, रावलकोट, कोटली और भीमबर में बाजार, दुकानें और कारोबारी प्रतिष्ठान बंद रहे। शटडाउन के चलते जनजीवन प्रभावित हुआ। प्रदर्शनकारी लगातार सरकार और सेना के खिलाफ नारेबाजी करते रहे।प्रदर्शनकारियों ने पालंद्री में आंसू गैस के गोलों के अवशेष भी दिखाए, जिन्हें सुरक्षा बलों द्वारा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए दागा गया था। हजारों लोग पूरे दिन सड़कों पर डटे रहे और पाकिस्तानी प्रशासन के खिलाफ विरोध दर्ज कराते रहे। वहीं सुधनोटी में लकड़ी की छड़ियां लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों ने पाक सरकार और सेना को आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।

मुजफ्फराबाद में नीलम ब्रिज के पास प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें भी हुईं। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में फायरिंग की आवाजें सुनाई दी हैं। इससे इलाके में तनाव बढ़ा है। प्रदर्शनकारी 38 मांगों को पूरा करने की मांग कर रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख मांग सस्ती बिजली, आटा, चावल और दाल जैसी जरूरी वस्तुओं को कम कीमत पर उपलब्ध कराने की है।प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पाकिस्तान ने पी ।ओ ।के में मंगला डैम समेत कई बड़े हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट स्थापित किए हैं। उनका तर्क है कि चूंकि ये परियोजनाएं स्थानीय संसाधनों पर आधारित हैं, इसलिए यहां के लोगों को बेहद कम दरों पर बिजली उपलब्ध कराई जानी चाहिए। आरोप है कि संसाधन उनके इलाके से लिए जा रहे हैं, लेकिन उसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिल रहा।

आर्थिक मांगों के अलावा आंदोलन का एक बड़ा राजनीतिक पहलू भी है। प्रदर्शनकारी पी .ओ . के लेजिस्लेटिव असेंबली में रिफ्यूजी के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। ये सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं, जिन्हें भारत के हिस्से वाले कश्मीर से पी ।ओ ।के में आने वाला शरणार्थी बताया जाता है। हालांकि, इनमें से बड़ी संख्या में लोग पाकिस्तान के अन्य शहरों में रहते हैं।

आंदोलनकारियों का सवाल है कि जो लोग पी .ओ .के में रहते ही नहीं, वे यहां की विधानसभा सीटों पर वोट कैसे डाल सकते हैं। स्थानीय जनता का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं। उनका आरोप है कि इन आरक्षित सीटों का इस्तेमाल पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और सेना अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए करती है। हिजबुल के लोगों को इन सीटों पर चुनाव जिताने में भूमिका निभाती है।

उनका कहना है कि पी .ओ .के विधानसभा की कुल 45 सीटों में से 12 सीटें ऐसी हैं, जिन पर ISI और पाकिस्तानी सेना का प्रभाव रहता है। इसी प्रभाव के जरिए राजनीतिक समीकरण बदले जाते हैं और जरूरत पड़ने पर अपनी पसंद का प्रधानमंत्री भी बनवाया जाता है। इस संदर्भ में प्रदर्शनकारी अब्दुल्ला सईद शाह का उदाहरण भी दे रहे हैं, जिन्हें पीर मजहर सईद शाह के नाम से जाना जाता है।

उन पर जैश-ए-मोहम्मद के सिंध प्रांतीय प्रमुख होने के आरोप लगते रहे हैं। इसके बावजूद वह पी ।ओ ।के विधानसभा के सदस्य हैं और हाल तक सूचना एवं प्रसारण मंत्री का पद भी संभाल रहे थे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ऐसे उदाहरण राजनीतिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। यह पहली बार नहीं है जब पी ।ओ ।के में इस तरह का उबाल देखने को मिला हो। पिछले साल भी विरोध प्रदर्शन हुए थे।

कुछ समय पूर्व के प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने करीबी सहयोगी और राजनीतिक सलाहकार राणा सनाउल्लाह को बातचीत के लिए पी ।ओ ।के भेजा था। उस समय प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों की 38 में से 21 मांगें मानने का भरोसा दिया था। हालांकि, प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आठ महीने बीत जाने के बाद भी वे वादे पूरे नहीं किए गए। आंदोलनकारियों का दावा है कि पिछले वर्ष ब्रिगेडियर फैक अयूब की पी ।ओ ।के में ISI सेक्टर कमांडर के रूप में नियुक्ति के बाद सेना की कार्रवाई सख्त हो गई है। उसकी कमान में आम लोगों पर दबाव बढ़ा है। पी ।ओ ।के में तैनाती से पहले वह पंजाब सेक्टर के कमांडर रह चुके हैं। उनके विरोधियों का आरोप है कि लाहौर में की गई एक हिंसक कार्रवाई के कारण उसे ‘लाहौर का कसाई’ तक कहा जाता है।

इस समय पाक आर्मी गो बैक के नारे प्रदर्शनकारियों के बीच बस एक ही आवाज गूंज रही है— पाकिस्तान से आजादी । विधानसभा की आरक्षित सीटों को भंग करने की मांग से शुरू हुआ यह आंदोलन अब एक जन-विद्रोह में बदल चुका है। लोग पाकिस्तानी फौज को वापस जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं और पाक आर्मी गो बैक के नारों से रावलपिंडी से लेकर इस्लामाबाद तक के हुक्मरान सहम गए हैं।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने सरकार द्वारा इंटरनेट बंद करने, बल प्रयोग करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर आतंकवाद का लेबल लगाने की कड़ी निंदा की है। आयोग ने कहा है कि जब तक लोगों को उनके राजनीतिक अधिकार नहीं दिए जाएंगे, तब तक हिंसा का यह चक्र नहीं थमेगा।

गौरतलब है कि यह आंदोलन भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता को चुनौती देने का अवसर भी देता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पी ।ओ ।के के मुद्दे उठाए जा सकते हैं, जहां यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी ने पाकिस्तान की दमनकारी कार्रवाई की निंदा की और वैश्विक हस्तक्षेप की मांग की है।

भारत पी .ओ .के में पाकिस्तानी अत्याचारों को हाइलाइट कर सकता है, जैसा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने UNGA में पाकिस्तान को ‘वैश्विक आतंकवाद का केंद्र’ बताया था।हालांकि पाकिस्तान भारत को दोष दे रहा है, लेकिन वीडियो और स्थानीय बयान इसकी पोल खोल रहे हैं। भारत कूटनीतिक रूप से पी ।ओ ।के के लोगों के अधिकारों का समर्थन कर सकता है, जो पाकिस्तान की ‘आजाद कश्मीर’ की झूठे प्रचार को कमजोर करेगा। X पर तमाम ऐसे पोस्ट दिखते हैं कि पी .ओ .के युवा पाकिस्तानी सेना के प्रॉक्सी युद्ध के खिलाफ हैं, जो भारत के आतंकवाद विरोधी नैरेटिव को मजबूत करता है ।

यदि भारत UN, यूरोपीय संघ और अमेरिका जैसे सहयोगियों के साथ पी .ओ .के को मानवाधिकार मुद्दा बनाता है, तो पाकिस्तान पर GSP (यूरोपीय संघ का एक व्यापारिक कार्यक्रम है, जो विकासशील देशों को कम या शून्य शुल्क पर EU बाजारों में निर्यात की सुविधा देता है। यह मानवाधिकार, श्रम, पर्यावरण और सुशासन के मानकों के पालन पर आधारित है। पाकिस्तान को इसका लाभ मिलता है) जैसे कई अन्य संगठनों के व्यापार लाभों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे भारत की वैश्विक छवि मजबूत होगी और कश्मीर पर पाकिस्तानी दावों को कमजोर करेगा। इसके अलावा, आंदोलन पी ।ओ ।के में आतंकवादी भर्ती को प्रभावित कर सकता है।

सैन्य दृष्टि से, पी .ओ .के में अस्थिरता पाकिस्तानी सेना को कमजोर कर रही है, जो भारत के लिए LoC पर दबाव कम करने का मौका है। पाकिस्तान ने पंजाब से सैनिक भेजे, लेकिन यदि विद्रोह फैलता है, तो सेना का ध्यान आंतरिक दमन पर केंद्रित हो जाएगा। भारत सर्जिकल स्ट्राइक या ऑपरेशन सिंदूर जैसे कदमों से आतंकी ठिकानों को निशाना बना सकता है, जैसा कि 2025 में पहलगाम हमले के बाद हुआ। पी ।ओ ।के में संसाधनों (जल, खनिज) का शोषण बंद होने से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी, जो भारत को सिन्धु जल संधि पर मजबूत स्थिति देगा।

हालांकि, यदि पाकिस्तान दमन बढ़ाता है, तो शरणार्थी भारत की ओर आ सकते हैं, जो मानवीय संकट पैदा करेगा लेकिन भारत के लिए बांग्लादेश जैसी कार्रवाई करने का मौका भी दे सकता है। भारत को अपनी सेना को सतर्क रखना चाहिए, क्योंकि LoC पर गोलीबारी बढ़ सकती है.पी .ओ .के भारत के लिए जल संसाधनों का खजाना है। मंगला डैम जैसी परियोजनाएं पाकिस्तान को लाभ पहुंचाती हैं, लेकिन आंदोलन से ये प्रभावित हो सकती हैं। CPEC (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) पर असर पड़ेगा, जो भारत के लिए सामरिक लाभ है, क्योंकि यह ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से चीन को गल्फ तक पहुंच देता है। यदि पी .ओ .के में विद्रोह बालोचिस्तान से जुड़ता है, तो पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा कमजोर होगी। भारत को मानवीय सहायता प्रदान कर पी .ओ .के लोगों को आकर्षित करना चाहिए, लेकिन सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए जब तक आवश्यक न हो।