घरेलू महिलाओं को भी है, आर्थिक सबलता की आवश्यकता

Homemakers also need financial empowerment

डॉ. अंशुल उपाध्याय

भारत मे घरेलू महिलाओं को भी आर्थिक सबलता का अधिकार प्राप्त होना चाहिये।वे महिलाये जो नोकरी पेशा नही है।और घर पर रहकर ही अपने बच्चो और परिवार के पोषण के लिये अपना सारा समय लगा देती है।उनकी व्यक्तिगत जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उनके पति के द्वारा कुछ धनराशि प्रति माह प्राप्त होनी ही चाहिए। इससे न केवल महिलाओं को सबलता मिलेगी बल्कि घरेलू हिंसा के मामलो में भी कमी आएगी। भारत मे लगभग घरेलू दायरे में हिंसा को घरेलू हिंसा कहा जाता है। किसी महिला का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक, मनोवैज्ञानिक या यौन शोषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना जिसके साथ महिला के पारिवारिक सम्बन्ध हैं, घरेलू हिंसा में शामिल है।

“घरेलू हिंसा के विरुद्ध महिला संरक्षण अधिनियम की धारा, 2005” घरेलू हिंसा को पारिभाषित किया गया है “प्रतिवादी का कोई बर्ताव, भूल या किसी और को काम करने के लिए नियुक्त करना, घरेलू हिंसा में माना जाएगा। क्षति पहुँचाना या जख्मी करना या पीड़ित व्यक्ति को स्वास्थ्य, जीवन, अंगों या हित को मानसिक या शारीरिक तौर से खतरे में डालना या ऐसा करने की नीयत रखना और इसमें शारीरिक, यौनिक, मौखिक और भावनात्मक और आर्थिक शोषण शामिल है; या दहेज़ या अन्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध मांग को पूरा करने के लिए महिला या उसके रिश्तेदारों को मजबूर करने के लिए यातना देना, नुक्सान पहुँचाना या जोखिम में डालना ; या पीड़ित या उसके निकट सम्बन्धियों पर उपरोक्त वाक्यांश (क) या (ख) में सम्मिलित किसी आचरण के द्वारा दी गयी धमकी का प्रभाव होना; या पीड़ित को शारीरिक या मानसिक तौर पर घायल करना या नुक्सान पहुँचाना”

सर्वेक्षण में पाया गया है कि 32% विवाहित महिलाओं (18-49 वर्ष) ने शारीरिक, यौन या भावनात्मक वैवाहिक हिंसा का अनुभव किया है। वैवाहिक हिंसा का सबसे आम प्रकार शारीरिक हिंसा (28%) है, जिसके बाद महिलाओं के साथ भावनात्मक हिंसा और यौन हिंसा हुई है।महिलाओं के खिलाफ शारीरिक हिंसा के 80% से अधिक मामलों में अपराधी पति होता है। जिन पतियों ने स्कूली शिक्षा के 12 या अधिक वर्ष पूरे कर लिए हैं, उनमें शारीरिक, यौन, या भावनात्मक वैवाहिक हिंसा करने की संभावना आधी (21%) होती है। जबकि स्कूली शिक्षा न पूरी करने वाले 43% लोग हिंसा में संलिप्त होते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण भारत सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ज़्यादा पढ़ी-लिखी महिलाओं को अपने पति से घरेलू हिंसा का खतरा कम पढ़ी-लिखी की तुलना में 1.54 गुना ज़्यादा होता है।

एक गैर सरकारी संस्था के मुताबिक, भारत में लगभग पांच करोड़ महिलाओं को अपने घर में ही हिंसा का सामना करना पड़ता है। इनमें से मात्र 0.1 प्रतिशत ही हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आगे आती हैं। एनएफएचएस की रिपोर्ट के अनुसार भारत में विवाहित कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 31%(एनएफएचएस – 4), से 32% के बीच हैं। 2019-2021,
नई NHFS – 5 रिपोर्ट 12 मई 2022 के अनुसार भारत मे 92% महिलाये बिना मेहनताना लिये घरेलू काम करती हैं जबकि सिर्फ 27% पुरूष ही ऐसा करते है।

भारतीय महिलाओ को जो नौकरी पेशा नही है। अपने पति द्वारा प्रति माह कुछ धनराशि अवश्य दी जानी चाहिए, इससे ना केवल घरेलू हिंसा के मामलों में बल्कि महिलाओ के मानसिक तनावो में भी कमी आयेगी। कुछ महिलाएं जो पढ़ी लिखी है मगर नौकरी पेशा नही है उन्हें हर वक़्त ये बात कचोड़ती तो अवश्य होगी की काश वो भी औरो की तरह अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए ही सही कुछ रुपए कमा सकती।

चूंकि शिक्षा का व्यक्ति के मानसिक विकास मे महत्वपूर्ण योगदान होता है। और मानसिक विकास हो जाने के बाद व्यक्ति अपना अच्छा बुरा स्वयम समझ पाता है। ऐसे मे किसी मानसिक रूप से विकसित महिला का घर पर रहना कई बार उसकी मजबूरी होती हैं। कई बार बच्चो के पालन हेतू तो कई बार ससुराल वालों की सहमति से। और मन में चल रहे द्वंद का सामना जब महिलाएं नही कर पाती तो डिप्रेशन, हाई बीपी,मधुमेह जैसे रोगों का शिकार हो जाती हैं। इसलिए अगर महिलाओं को सबल बनाना है तो जरूरी नही परिवार के दायित्व के साथ उन्हे नौकरी पेशा होने को मजबूर किया जाये। इस समस्या का समाधान है,घरेलू महिलाओ को प्रति माह उनके पति द्वारा कुछ धनराशि प्रदान किया जाना।

भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए बहुत से प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में, जब हम भारत की महिलाओं को देखते हैं तब उनमें सशक्तिकरण केवल स्वयं रोजगार से जुड़ने पर नहीं आता अपितु उनके पास अगर कुछ मात्रा में धन रहे तो खुद व खुद उस धन को किस तरह से अपने रोजमर्रा की आवश्यकताओं में खर्च करना है यह समझ महिलाओं में आ जाती है। भारत में अधिकांश जगहों पर महिलाएं ग्रहणी है और अपना घर संभालती हैं। पर यह हमारी विडंबना है कि हमने अपने घर की महिलाओं को वित्त का अधिकार नहीं दिया ना ही वित्त संबंधी मामलों में हम घर की महिलाओं की सलाह लेते हैं। जबकि हमारे वित्तमत्री जी की स्वयं एक महिला है जो भारत का बजट बनती हैं। और दूसरी तरफ एक वह महिला है जो अपना घर चला रही हैं तो क्या उसमें इतनी भी समझ नहीं होगी कि वह घर के बजट को सही तरीके से चला सके अतः हम बेटियों को तो आगे से पढाते हैं सब उन्हें सक्षम बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं पर फिर हम ये क्यों भूल जाते हैं की हमारी बेटी ही तो कल किसी और के घर की बहु बनेगी। अतः अपनी बेटी को हमेशा धन देते रहना और बहू को उससे वंचित रखना क्या ये सही है??
इसलिए भारत में यह प्रावधान अवश्य ही होना चाहिए की विवाह के पश्चात यदि कोई महिला नौकरी पेशा नही है तो उसे उसक उसके पति के द्वारा मासिक तौर पर कुछ धनराशि आवश्य प्रदान की जाए।

इससे न केवल घरेलू महिलाएं अपनी जरूरत की चीजें खुद ले पाएंगी साथ ही घर की छोटी-छोटी चीजो के लिये उन्हें किसी और पर निर्भर नही होना होगा। जो उनके मानसिक स्वास्थ के साथ-साथ पारिवारिक शांति के लिए भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।