‘पप्पू’ से जननायक तक: राहुल गांधी का नया सियासी अवतार

From 'Pappu' to 'Jan-Nayak': Rahul Gandhi's New Political Avatar

दिलीप कुमार पाठक

भारतीय राजनीति में शायद ही किसी नेता ने छवि के मोर्चे पर इतने उतार-चढ़ाव देखे होंगे जितने राहुल गांधी ने देखे हैं। एक दौर था जब विरोधियों ने उन्हें ‘पप्पू’ कहकर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग की हदें पार कर दी थीं। लेकिन आज, जब वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर हैं, तो उनकी राजनीति में एक अलग परिपक्वता दिखाई देती है। हाल ही में राजस्थान के कोटा से शुरू हुआ उनका ‘छात्रों की गूंज’ आंदोलन और पेपर लीक के खिलाफ उनका आक्रामक रुख यह साफ करता है कि राहुल गांधी अब सिर्फ विरासत की राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि सड़क और संसद दोनों जगह जनता की नब्ज पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी के इस राजनीतिक सफर को दो हिस्सों में देखा जा सकता है – पहला भारत जोड़ो यात्रा से पहले का और दूसरा उसके बाद का। कन्याकुमारी से कश्मीर और फिर मणिपुर से मुंबई तक की यात्राओं ने राहुल गांधी की पूरी छवि को बदल कर रख दिया। इन यात्राओं ने उन्हें बंद कमरों की वातानुकूलित राजनीति से निकालकर तपती धूप और आम लोगों के बीच ला खड़ा किया। जब वे ट्रक ड्राइवरों, कुली भाइयों, मैकेनिकों और आम बेरोजगार युवाओं से गले मिलते दिखे, तो जनता को उनमें एक ऐसा नेता नजर आने लगा जो उनकी बात सुनने के लिए तैयार था। यही कारण है कि आज मीडिया और जनता उन्हें एक गंभीर राजनेता के रूप में देखने लगी है।

आज देश का युवा बेरोजगारी और पेपर लीक जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धांधली ने छात्रों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। ऐसे समय में राहुल गांधी ने सीधे छात्रों के बीच जाकर उनकी आवाज को उठाया है। जब सरकार ने तकनीकी कारणों से टेलीग्राम जैसी ऐप पर पाबंदी लगाने की कोशिश की, तो राहुल ने खुलकर कहा कि ‘हमला पेपर लीक माफिया पर होना चाहिए, छात्रों के प्लेटफॉर्म पर नहीं।’ कोटा की गलियों से शुरू हुई ‘छात्रों की गूंज’ ने यह साबित किया है कि राहुल अब युवाओं के मुद्दों को अपनी राजनीति का मुख्य हथियार बना चुके हैं। संसद में विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी के तेवर बदले हुए हैं। वे अब सिर्फ सरकार के फैसलों का विरोध नहीं करते, बल्कि आंकड़ों और तर्कों के साथ सरकार को घेरते हैं, कई बार तो पूरी सरकार के मंत्री, प्रधानमंत्री अकेले राहुल के सवालों के जवाब नहीं दे पाते। ईवीएम की विश्वसनीयता से लेकर देश के आर्थिक फैसलों और कॉरपोरेट एकाधिकार पर उनके सीधे सवाल सरकार को असहज करते हैं। इंडिया गठबंधन को एक साथ बांधकर रखना और विपक्ष की बिखरती हुई ताकतों को एक मंच पर लाना और यह कहना की मैं शिव की तरह सारा ज़हर पी लूँगा, लेकिन गठबंधन को टूटने नहीं दूँगा…. अब तो लगभग -लगभग सारे के सारे नेता राहुल को इंडिया ब्लॉक में मान ही चुके हैं.. यह उनकी एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है।

आज के दौर में राहुल गांधी को ना तो कोई खारिज कर सकता है और ना ही उनकी अनदेखी कर सकता है। वे केवल एक बड़े राजनीतिक परिवार के वारिस नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे नेता के रूप में उभर चुके हैं जो देश के युवाओं, दलितों, पिछड़ों और शोषितों की आवाज बनने का दम रखता है। वे केवल बड़े मंचों से भाषण नहीं दे रहे, बल्कि देश के वंचितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के साथ खड़े होकर उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का एक मजबूत और विश्वसनीय चेहरा बन चुके हैं। आर्थिक मोर्चे पर महंगाई, निजीकरण और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को सीधे आम आदमी की थाली और जेब से जोड़कर उन्होंने अपनी राजनीति को हवाई दावों से दूर, जमीन पर लाकर खड़ा किया है। ‘छात्रों की गूंज’ जैसे आंदोलनों से उन्होंने दिखा दिया है कि वे भविष्य की राजनीति के लिए तैयार हैं। कोटा के कोचिंग संस्थानों से लेकर सुदूर गांवों के युवाओं के बीच शुरू हुई इस गूंज ने देश की युवा चेतना को यह भरोसा दिलाया है कि उनकी लड़ाई का एक झंडाबरदार दिल्ली में मौजूद है। अब राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस अभूतपूर्व जन-समर्थन, सहानुभूति और नैतिक बढ़त को एक मुकम्मल चुनावी वोट बैंक में तब्दील करने की है। यदि कांग्रेस की यह नई सांगठनिक मशीनरी राज्यों के आगामी चुनावों में इस नई ऊर्जा को जीत में बदल पाई, तो राहुल गांधी का यह मूल्यांकन भारतीय राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत साबित होगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वे इस जन-समर्थन को आने वाले समय में चुनावी जीत में कितना बदल पाते हैं।