वैशाखी से बड़ा सहारा

A support greater than a crutch

सत्य भूषण शर्मा

रामप्रसाद की झुर्रियों में संघर्ष की पूरी कहानी लिखी हुई थी। पत्नी के असमय निधन के बाद उन्होंने अपने इकलौते बेटे अमित को माँ और पिता दोनों का प्यार देकर पाला था। खेतों में दिनभर मजदूरी करते, रात को दूसरों के हिसाब-किताब लिखते, तब कहीं जाकर बेटे की पढ़ाई का खर्च जुटा पाते थे। कई बार भूखे पेट सो गए, लेकिन बेटे की फीस कभी नहीं रुकने दी।

समय का पहिया घूमता गया। अमित पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बन गया। आलीशान घर, गाड़ी और प्रतिष्ठा सब कुछ उसके पास था। मगर सफलता की चमक में वह उन हाथों की कीमत भूल गया, जिन्होंने उसकी राहों के काँटे चुन-चुनकर हटाए थे।

अब पिता की हर बात उसे पुरानी और गैरजरूरी लगती। जब रामप्रसाद किसी बात को दोहराते, तो वह झुंझलाकर कह देता, “पिताजी, कितनी बार एक ही बात बोलेंगे?” कभी उनकी धीमी चाल पर नाराज़ हो जाता, कभी उनके काँपते हाथों पर। रामप्रसाद चुप रह जाते। उन्हें बेटे की ऊँची आवाज़ से अधिक दर्द उसकी बदलती संवेदनाओं से होता था।

एक बरसाती शाम आँगन में फिसलकर रामप्रसाद बुरी तरह गिर पड़े। उनके पैर की हड्डी टूट गई। अमित उन्हें शहर के सबसे अच्छे अस्पताल ले गया। महंगे डॉक्टर बुलाए गए, इलाज हुआ, दवाइयाँ आईं और घर में एक सुंदर व्हीलचेयर भी रख दी गई।

रिश्तेदारों और परिचितों के बीच अमित गर्व से कहता, “मैं अपने पिता की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ रहा हूँ।”

लेकिन उस चमकदार सेवा के पीछे एक खालीपन था, जिसे केवल रामप्रसाद महसूस कर रहे थे।

उस रात कमरे में सन्नाटा था। खिड़की से आती चाँदनी बूढ़े चेहरे पर पड़ रही थी। अमित दवा लेकर आया और बोला, “पिताजी, समय पर दवा ले लिया कीजिए। मैं आपके लिए सब कुछ कर रहा हूँ।”

रामप्रसाद की आँखें भर आईं। कुछ क्षण वे बेटे को देखते रहे। फिर काँपती हुई आवाज़ में बोले—

“बेटा, तकलीफ़ देकर मोहब्बत जताना, टांग काटकर वैशाखी देने जैसा है।”

अमित स्तब्ध रह गया।

पिता आगे बोले, “जब तुम छोटे थे और गिर जाते थे, तो मैं पहले तुम्हारे आँसू पोंछता था, बाद में मरहम लगाता था। आज तुम मरहम तो दे रहे हो, लेकिन जिन शब्दों से मेरे मन को चोट पहुँचती है, उनका इलाज किसके पास है?”

ये शब्द सुनकर अमित का सिर झुक गया। उसकी आँखों के सामने बचपन के दृश्य तैरने लगे—कंधों पर बैठाकर मेला दिखाने वाले पिता, बुखार में पूरी रात जागने वाले पिता, अपनी नई कमीज़ छोड़कर उसके लिए किताबें खरीदने वाले पिता।

उसे महसूस हुआ कि वह पिता के शरीर की सेवा तो कर रहा था, लेकिन उनके दिल को रोज़ घायल कर रहा था।

उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह पिता के चरणों में बैठ गया और फूट-फूटकर रो पड़ा।

“पिताजी, मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं आपकी मेहनत का ऋण तो कभी नहीं चुका सकता, लेकिन आज से आपको कभी अपने व्यवहार से दुख नहीं दूँगा।”

रामप्रसाद ने काँपते हाथों से बेटे का सिर सहलाया। वर्षों बाद उनके चेहरे पर सच्ची मुस्कान लौटी। उस दिन अमित समझ गया कि बुजुर्गों को सबसे अधिक जरूरत दवाइयों, व्हीलचेयर या पैसों की नहीं, बल्कि सम्मान, धैर्य और प्रेम की होती है।

उस घर में व्हीलचेयर तो पहले भी थी, लेकिन उस दिन पिता को अपने बेटे के बदलते हृदय का जो सहारा मिला, वह किसी भी वैशाखी से कहीं अधिक मजबूत था।

प्रेरणा :
यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम केवल सुविधाएँ देने या आर्थिक सहायता करने का नाम नहीं है। सच्चा प्रेम सम्मान, मधुर व्यवहार, संवेदनशीलता और अपनेपन से प्रकट होता है। हमारे शब्द कभी-कभी ऐसे घाव दे देते हैं जिन्हें दुनिया की कोई दवा नहीं भर सकती। इसलिए अपने माता-पिता और प्रियजनों को केवल सुविधाएँ ही नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान भी दें।