प्रकृति के पुनर्जन्म का भारत मॉडल: एक नई सभ्यता की शुरुआत

India's Model of Nature's Rebirth: The Dawn of a New Civilization

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

सभ्यताओं का भविष्य केवल संसदों में नहीं, खेतों की मिट्टी, जंगलों की हरियाली और जलस्रोतों की जीवनधारा में भी लिखा जाता है। ऐसे समय में जब दुनिया भूमि क्षरण, सूखे और मरुस्थलीकरण की गंभीर चुनौती से जूझ रही है, भारत ने आशा और संकल्प का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। वर्ष 2011 से 2020 के बीच देश ने 21.76 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि को पुनर्जीवित किया है, जो ‘बॉन चैलेंज’ के 26 मिलियन हेक्टेयर लक्ष्य का लगभग 84 प्रतिशत है। यह केवल भूमि बहाली का आंकड़ा नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय दृष्टि का प्रमाण है जिसने विकास और प्रकृति को विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री माना। भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि जलवायु नेतृत्व संपन्नता से नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, प्रतिबद्धता और सामूहिक प्रयासों से हासिल होता है।

संकल्प और संवेदनशीलता के साथ यह यात्रा वर्ष 2015 में शुरू हुई, जब भारत ने ‘बॉन चैलेंज’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई। प्रारंभ में लक्ष्य 2020 तक 13 मिलियन हेक्टेयर और 2030 तक अतिरिक्त 8 मिलियन हेक्टेयर भूमि बहाली का था, जिसे बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2019 में यूएनसीसीडी के 14वें पक्षकार सम्मेलन के दौरान बढ़ाकर 26 मिलियन हेक्टेयर कर दिया गया। 17 जून 2026 को विश्व मरुस्थलीकरण विरोधी दिवस पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा जारी दूसरी प्रगति रिपोर्ट ने इस प्रगति को वैश्विक मंच पर रखा। रिपोर्ट में तेलंगाना को सर्वाधिक भूमि पुनर्स्थापन करने वाला राज्य बताया गया, जबकि आंध्र प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश और ओडिशा का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। इन राज्यों ने वनरोपण, जल संरक्षण, एग्रोफॉरेस्ट्री और प्राकृतिक पुनरुत्थान से अनुपयोगी भूमि को फिर से जीवन दिया।

किसी भी पर्यावरणीय कार्यक्रम की सफलता तभी है जब उसका असर सीधे जनजीवन तक पहुंचे। भारत की भूमि बहाली यात्रा की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि उसने हरियाली के साथ आजीविका भी पैदा की। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 1.22 अरब व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित हुए। ग्रामीण युवा, महिलाएं और सीमांत किसान इसके प्रमुख लाभार्थी बने। जहां कभी बंजर भूमि बेरोजगारी, पलायन और निराशा का प्रतीक थी, वहां आज हरे खेत, फलदार बाग और पशुधन के लिए चारा दिखाई देता है। इस पहल ने मिट्टी को उपजाऊ बनाया, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति दी, गरीबी घटाई और गांवों को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया। यह सामाजिक न्याय और आर्थिक समावेशन का ऐसा मॉडल है, जिसकी प्रासंगिकता लंबे समय तक रहेगी।

इस उपलब्धि का पर्यावरणीय प्रभाव दीर्घकालिक है। स्वस्थ भूमि केवल फसल नहीं उगाती, बल्कि भविष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित करती है। पुनर्स्थापित भूमि कार्बन अवशोषण बढ़ाती है, मिट्टी की उर्वरता लौटाती है और जल चक्र को संतुलित करती है। इससे सूखा और बाढ़ जैसी आपदाओं की तीव्रता कम होती है। जैव विविधता को नया आवास मिलता है और पारिस्थितिक तंत्र मजबूत होता है। वैज्ञानिक लंबे समय से मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे प्रभावी और कम खर्चीला उपाय स्वस्थ भूमि है। भारत ने इस सत्य को व्यवहार में बदलकर दिखाया है, इसलिए वैश्विक भूमि बहाली विमर्श में उसकी भूमिका अग्रिम पंक्ति में है।

दुनिया के सामने ‘बॉन चैलेंज’ का लक्ष्य 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर भूमि पुनर्स्थापन का है। इस वैश्विक अभियान में भारत का योगदान प्रेरक और नेतृत्वकारी दोनों माना जा रहा है। यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल हुई है जब कई विकसित देश अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों और आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन साधने में संघर्ष कर रहे हैं। भारत ने सिद्ध किया है कि आर्थिक विकास और प्रकृति संरक्षण अलग राहें नहीं, बल्कि साथ-साथ चलने वाली प्रक्रिया हैं। यह उपलब्धि वैश्विक दक्षिण की क्षमता का संदेश है कि समाधान संसाधनों से नहीं, बल्कि दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता से निकलते हैं।

भारत की सफलता का मूल आधार उसकी नीतिगत स्पष्टता और जनभागीदारी है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, ग्रीन इंडिया मिशन, संयुक्त वन प्रबंधन समितियां और राज्यों की स्थानीय पहलें मिलकर काम कर रही हैं। स्थानीय समुदायों को भागीदार और संरक्षक बनाकर प्रयासों को स्थायित्व दिया गया है। एग्रोफॉरेस्ट्री ने खेती और वानिकी के बीच सहयोग बढ़ाया है, जबकि ड्रोन, सैटेलाइट निगरानी और भू-स्थानिक तकनीक ने निगरानी और मूल्यांकन को अधिक सटीक बनाया है। यही कारण है कि भारत का मॉडल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सहभागी विकास और पर्यावरण प्रबंधन का वैश्विक उदाहरण बन गया है।

फिर भी आत्मसंतोष का कोई कारण नहीं है। देश में अभी भी विशाल क्षेत्र भूमि क्षरण की समस्या से प्रभावित है। 2030 तक निर्धारित शेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयासों की गति और व्यापकता दोनों बढ़ानी होंगी। निजी क्षेत्र, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और युवा नवाचारकों को इस अभियान से अधिक गहराई से जोड़ना होगा। जलवायु वित्त की उपलब्धता बढ़ाना भी अनिवार्य है, ताकि छोटे किसान, वनवासी और आदिवासी समुदाय इस परिवर्तन के पूर्ण लाभार्थी बन सकें। साथ ही, सतत निगरानी, वैज्ञानिक मूल्यांकन और परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतियों में निरंतर सुधार यह सुनिश्चित करेंगे कि प्राप्त उपलब्धियां टिकाऊ और दीर्घकालिक बनी रहें।

भारत की यह हरित यात्रा केवल पर्यावरण संरक्षण का अध्याय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व की नई परिभाषा है। इसने सिद्ध किया है कि सच्ची प्रगति वही है, जिसमें प्रकृति और मानव दोनों का भविष्य सुरक्षित हो। 21.76 मिलियन हेक्टेयर भूमि की बहाली एक उपलब्धि अवश्य है, परंतु उससे भी बड़ा महत्व उस दृष्टि का है जिसने धरती को संसाधन नहीं, उत्तरदायित्व माना। आज पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। वह देख रही है कि एक राष्ट्र केवल लक्ष्य निर्धारित नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें समय से पहले वास्तविकता में बदलने का साहस भी दिखा रहा है। यह हरित क्रांति हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति हमारी विरासत नहीं, हमारी संतानों से लिया गया ऋण है। उसकी रक्षा करके ही हम समृद्ध, सुरक्षित और सतत भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।