दल-बदल की राजनीति और लोकतंत्र का भविष्य

The Politics of Defection and the Future of Democracy

भारतीय लोकतंत्र राजनीतिक अवसरवाद का बंधक बनता जा रहा है?

विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में जनता को लोकतंत्र का वास्तविक स्वामी माना जाता है। संविधान की मूल भावना भी यही है कि सत्ता का स्रोत जनता है, जनता जर्नादन का जनादेश सर्वोपरि है।मतदाता किसी प्रत्याशी को केवल उसके व्यक्तिगत गुणों के आधार पर नहीं चुनता,बल्कि उसके राजनीतिक दल,विचारधारा,नेतृत्व और चुनावी घोषणापत्र पर विश्वास व्यक्त करता है।यही कारण है कि चुनाव परिणाम केवल सीटों की गणना नहीं,बल्कि जनता की सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति होते हैं।दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में जिस प्रकार दल-बदल की प्रवृत्ति बढ़ी है,उसने लोकतंत्र की आत्मा जनादेश की पवित्रता और राजनीतिक नैतिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।एक ओर भाजपा व एन डी ए की केंद्र सरकार वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रही है।विकसित भारत,आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत जैसे लक्ष्य राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं।दूसरी ओर राजनीतिक दलों के भीतर बढ़ती अस्थिरता,वैचारिक प्रतिबद्धता का क्षरण और सत्ता प्राप्ति की बढ़ती होड़ लोकतंत्र को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर रही है।जनता जिन प्रतिनिधियों को किसी दल के चुनाव चिन्ह पर चुनकर भेजती है,वे कुछ वर्षों बाद या कभी-कभी कुछ महीनों बाद ही अपना दल बदल लेते हैं।इससे सबसे अधिक आघात मतदाता के विश्वास को पहुँचता है।भारतीय राजनीति में दल-बदल की समस्या नई नहीं है।वर्ष 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल द्वारा एक ही दिन में कई बार पार्टी बदलने की घटना के बाद “आया राम,गया राम” भारतीय राजनीति का स्थायी मुहावरा बन गया। 1967से1971के बीच देशभर में पांच सौ से अधिक विधायकों द्वारा दल बदलने की घटनाएँ दर्ज की गईं।राजनीतिक अस्थिरता इतनी बढ़ गई कि केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा।इसी के परिणामस्वरूप वर्ष 1985 में संविधान के 52वें संशोधन द्वारा दसवीं अनुसूची अर्थात दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया। बाद में 91वें संविधान संशोधन के माध्यम से इसे और कठोर बनाया गया।कानून बनने के बावजूद समस्या समाप्त नहीं हुई।नेताओं ने कानून की कमियों को समझ लिया और व्यक्तिगत दल-बदल के स्थान पर सामूहिक टूट,विलय और इस्तीफों की रणनीति अपनाई।आज स्थिति यह है कि सरकारें कई बार चुनावी जनादेश से कम और राजनीतिक प्रबंधन से अधिक बनती-बिगड़ती दिखाई देती हैं।राजनीतिक सुधारों के लिए कार्य करने वाली संस्था ए डी आर (ऐशोसिएसन फॉर ड्रेमोक्रिऐसी रिफॉर्स)की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 से 2020 के बीच देश भर में 405 विधायक दल बदलकर दोबारा चुनाव मैदान में उतरे।इनमें से 182 विधायक अर्थात लगभग 45 प्रतिशत एक ही दल में शामिल हुए।इसी अवधि में170विधायक कांग्रेस छोड़कर अन्य दलों में चले गए जबकि केवल 18 विधायक भाजपा छोड़कर अन्य दलों में गए। एडीआर ने यह भी उल्लेख किया कि मध्य प्रदेश,गोवा,मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में सरकारों के गिरने के पीछे विधायकों का दल-बदल प्रमुख कारण रहा।महाराष्ट्र का राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र में दल-बदल की सबसे बड़ी प्रयोग शाला बनकर सामने आया।वर्ष 2022में शिवसेना के 55 में से लगभग 40 विधायक एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में अलग हो गए।इसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी बड़ी टूट हुई और अजित पवार गुट अलग हो गया।जनता ने जिस महाविकास आघाड़ी या जिस राजनीतिक संरचना को वोट दिया था,कुछ ही वर्षों में उसका स्वरूप पूरी तरह बदल गया।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि महाराष्ट्र ने भारतीय राजनीति में “विधायक आधारित सत्ता परिवर्तन” का नया मॉडल प्रस्तुत किया है।इससे यह प्रश्न और प्रबल हुआ कि लोकतंत्र में वास्तविक महत्व मतदाता के वोट का है या निर्वाचित प्रतिनिधियों की बाद की राजनीतिक निष्ठाओं का।मध्य प्रदेश का उदाहरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।वर्ष 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद 22कांग्रेस विधायकों ने इस्तीफा दे दिया।परिणामस्वरूप कमलनाथ सरकार गिर गई और राज्य में सत्ता परिवर्तन हो गया।बाद में इनमें से अधिकांश नेता दूसरे दल के टिकट पर पुनः चुनाव लड़े।यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में दल-बदल और सत्ता परिवर्तन के सबसे चर्चित उदाहरणों में गिना जाता है।कर्नाटक में वर्ष 2019 में 17विधायकों के इस्तीफे ने एच.डी. कुमारस्वामी सरकार को गिरा दिया।कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सत्ता से बाहर हो गया और नई सरकार का गठन हुआ।राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे भी दल-बदल कानून की सीमाओं का उदाहरण बताया।गोवा,मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में भी निर्वाचित विधायकों के दल बदलने से राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए।कई बार विपक्ष सत्ता पक्ष में बदल गया और कई बार सत्तारूढ़ दल विपक्ष में पहुँच गया।इससे लोकतांत्रिक स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ा।एडीआर की रिपोर्ट ने भी इन राज्यों में सरकार परिवर्तन के पीछे दल-बदल को प्रमुख कारण बताया है।पश्चिम बंगाल में भी दल-बदल की राजनीति लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।वर्ष 2021 के विधान सभा चुनाव से पहले और बाद में तृणमूल कांग्रेस तथा भाजपा के बीच नेताओं और विधायकों का आना-जाना जारी रहा।राजनीतिक गलियारों में समय-समय पर तृणमूल कांग्रेस के कुछ विधायकों की नाराजगी और संभावित टूट की चर्चाएँ भी उठती रही हैं।लोकतंत्र के लिए केवल दल-बदल ही समस्या नहीं है,बल्कि लगातार बनी रहने वाली राजनीतिक अनिश्चितता भी चिंता का विषय है।दिल्ली और पंजाब की राजनीति में भी इस विषय ने नया आयाम ग्रहण किया है।आमआदमी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ नेतृत्व के सार्वजनिक मतभेद सामने आए। राज्यसभा तक पहुँचे कुछ नेताओं और पार्टी नेतृत्व के बीच खुला टकराव राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना।इससे यह बहस तेज हुई कि क्या राजनीतिक दलों के भीतर वैचारिक लोकतंत्र कमजोर हो रहा है और क्या जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही केवल दल के प्रति है या मतदाताओं के प्रति भी।पंजाब में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ राजनीतिक पुनर्संरेखण की चर्चाएँ तेज हो चुकी हैं।कांग्रेस,आम आदमी पार्टी, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच नेताओं के संभावित स्थानांतरण को लेकर लगातार अटकलें लग रही हैं।उत्तर प्रदेश में भी भाजपा,समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस आगामी विधान सभा चुनावों को देखते हुए संगठनात्मक विस्तार में लगी हुई हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही नेताओं और विधायकों के दल बदलने की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।यद्यपि यह अभी राजनीतिक विश्लेषण का विषय है,फिर भी ऐसी आशंकाएँ लोकतांत्रिक अस्थिरता की ओर संकेत करती हैं।राज्यसभा चुनावों में बढ़ती क्रॉस वोटिंग ने समस्या को और जटिल बना दिया है।कभी यह दुर्लभ घटना मानी जाती थी,आज यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती दिखाई देती है।हिमाचल प्रदेश,उत्तर प्रदेश,झारखंड, कर्नाटक और अन्य राज्यों में क्रॉस वोटिंग ने राजनीतिक दलों के भीतर अनुशासन और वैचारिक निष्ठा दोनों पर प्रश्न खड़े किए हैं।उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कुछ विधायकों द्वारा राज्यसभा चुनाव में अलग रुख अपनाने के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित तक करना पड़ा।सबसे बड़ी समस्या दल-बदल विरोधी कानून के क्रियान्वयन में दिखाई देती है।किसी विधायक या सांसद की सदस्यता समाप्त करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा अध्यक्ष के पास होता है।अनेक मामलों में निर्णय लेने में महीनों और कभी-कभी वर्षों का समय लग जाता है।इस दौरान संबंधित जनप्रतिनिधि राजनीतिक लाभ उठाते रहते हैं।कई मामलों में न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा है। इससे स्पष्ट है कि वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि अध्यक्ष स्वयं किसी राजनीतिक दल से आते हैं,इसलिए निष्पक्षता को लेकर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है।लंबे समय से यह सुझाव दिया जा रहा है कि दल-बदल संबंधी मामलों का निर्णय किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था अथवा निर्वाचन आयोग जैसी निष्पक्ष एजेंसी को सौंपा जाए। इससे निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय हो सकती है।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दल-बदल से लाभ किसे मिलता है? लोकतंत्र को नहीं,जनता को नहीं और विकास को भी नहीं।इसका सबसे बड़ा लाभ राजनीतिक दलों और सत्ता की राजनीति करने वाले नेताओं को मिलता है।जनता जिस विचारधारा के समर्थन में मतदान करती है,उसका प्रतिनिधि यदि बाद में दूसरी विचारधारा का झंडा उठा ले तो मतदाता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है।यही कारण है कि दल-बदल को अनेक राजनीतिक चिंतक”जनादेश की चोरी”तक कहने लगे हैं।विडंबना यह भी है कि लगभग सभी राजनीतिक दल इस विषय पर दोहरा आचरण अपनाते दिखाई देते हैं।जब उनके विधायक टूटते हैं तो लोकतंत्र खतरे में बताया जाता है, और जब दूसरे दलों के विधायक उनके पक्ष में आते हैं तो उसे जनसमर्थन की विजय कहा जाता है।यह दोहरा राजनीतिक चरित्र लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।यदि भारत को वास्तव में वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है तो केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं होगा।राजनीतिक स्थिरता,लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और जनादेश का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।निवेश,प्रशासन,सुशासन और विकास की निरंतरता तभी संभव है जब राजनीतिक व्यवस्था स्थिर और विश्वसनीय हो।समय की माँग है कि दल-बदल विरोधी कानून को और प्रभावी बनाया जाए।यदि कोई विधायक या सांसद दल बदलता है तो उसकी सदस्यता तत्काल समाप्त होनी चाहिए।उसे पुनः जनता के बीच जाकर नया जनादेश प्राप्त करना चाहिए।दल-बदल मामलों के निस्तारण की समय सीमा निर्धारित होनी चाहिए।राज्यसभा चुनावों में पारदर्शिता बढ़ाई जानी चाहिए और राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की व्यवस्था नहीं,बल्कि जनता के विश्वास की रक्षा का दायित्व भी है।यदि जनादेश बार- बार राजनीतिक अवसरवाद,सत्ता की गणित और जोड़-तोड़ का शिकार होता रहा तो लोकतंत्र की नैतिक शक्ति कमजोर होगी। वर्ष 2047 के विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब राजनीतिक दल अपने तात्कालिक स्वार्थों से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता देंगे।आज प्रश्न किसी एक दल का नहीं,बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता का है।यदि जनादेश सुरक्षित रहेगा तो लोकतंत्र मजबूत होगा।यदि जनादेश राजनीतिक अवसरवाद का बंधक बनता रहा तो लोकतंत्र का भविष्य निरंतर प्रश्नों के घेरे में बना रहेगा।विकसित भारत की यात्रा में यह केवल राजनीतिक नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा है।