तेल, व्यापार और कूटनीति: ईरान जंग ने भारत को क्या सिखाया

Oil, Trade, and Diplomacy: What the Iran Conflict Taught India

ईरान युद्ध का अंत दुनिया के लिए राहत की खबर है, लेकिन इसे स्थायी शांति मान लेना भूल होगी। भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि तेल आपूर्ति का सबसे बड़ा मार्ग पूरी तरह बंद नहीं रहेगा। इससे ऊर्जा संकट की आशंका कम हुई है। लेकिन पेट्रोल-डीजल के दामों में तत्काल राहत, महंगाई में तेज गिरावट या आर्थिक दबाव के अचानक समाप्त होने की उम्मीद करना यथार्थवादी नहीं होगा। वास्तव में यह युद्ध भारत के लिए एक चेतावनी है। दुनिया की बदलती भू-राजनीति में ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति अब अलग-अलग विषय नहीं रहे। वे एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। होर्मुज फिलहाल खुलने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन भारत के सामने असली सवाल यह है कि क्या वह भविष्य में अपनी अर्थव्यवस्था को किसी एक समुद्री रास्ते या किसी एक क्षेत्रीय संकट के भरोसे छोड़ सकता है? युद्धविराम ने भारत को कुछ समय दिया है। अब यह समय तय करेगा कि देश इस संकट से सबक लेकर आगे बढ़ता है या अगली वैश्विक उथल-पुथल का इंतजार करता है।

राजेश जैन

110 दिनों तक चली अमेरिका-ईरान जंग आखिरकार एक समझौते के साथ थम गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि युद्ध के जिन उद्देश्यों को लेकर अमेरिका मैदान में उतरा था, उनमें से कोई भी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ। दूसरी ओर ईरान अपनी सत्ता, परमाणु ढांचे और क्षेत्रीय प्रभाव को बचाने में सफल दिखाई देता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इसका भारत पर क्या असर होगा?

भारत इस संघर्ष का प्रत्यक्ष पक्ष नहीं था, फिर भी दुनिया के किसी भी बड़े ऊर्जा संकट की तरह इसकी सबसे बड़ी कीमत भारत जैसे आयात-निर्भर देशों को चुकानी पड़ी। तेल महंगा हुआ, रुपया दबाव में आया, महंगाई बढ़ी, उर्वरक उत्पादन प्रभावित हुआ और आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ी। अब जबकि युद्धविराम हो गया है और होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की घोषणा की गई है, सवाल यह है कि क्या भारत के लिए संकट समाप्त हो गया है या असली चुनौती अभी बाकी है।

युद्ध रुका है, संकट नहीं

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि युद्धविराम और सामान्य स्थिति में फर्क होता है। अमेरिका और ईरान के बीच हुई 14 बिंदुओं वाली डील में होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने का प्रावधान है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कल से तेल आपूर्ति पहले जैसी हो जाएगी। होर्मुज दुनिया की ऊर्जा धमनियों में से एक है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है। भारत के लिए इसका महत्व और भी अधिक है क्योंकि उसका अधिकांश कच्चा तेल खाड़ी देशों से आता है। समस्या यह है कि युद्ध के दौरान समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगें, सुरक्षा जोखिम, बीमा प्रीमियम और संभावित राजनीतिक अस्थिरता अभी भी बरकरार हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि होर्मुज में पूरी तरह सामान्य यातायात बहाल होने में कई महीने लग सकते हैं। इसका मतलब है कि कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल और स्थायी गिरावट की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।

भारत की सबसे बड़ी चिंता: ऊर्जा सुरक्षा

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का हर उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल था। संघर्ष के चरम पर यह 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इससे भारत का आयात बिल अचानक बढ़ गया। सरकार ने शुरुआती महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाईं। इसका बोझ तेल विपणन कंपनियों पर पड़ा। बाद में कीमतों में वृद्धि करनी पड़ी, लेकिन तब भी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ा। अब यदि तेल फिर से 70 डॉलर के आसपास भी आ जाए तो भी पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ते होने की संभावना कम है। सरकार और तेल कंपनियां पहले युद्धकालीन नुकसान की भरपाई करना चाहेंगी। यानी आम उपभोक्ता के लिए राहत की राह अभी लंबी है।

महंगाई का नया चेहरा

तेल केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव परिवहन, बिजली, उद्योग, कृषि और उपभोक्ता वस्तुओं तक जाता है। युद्ध के दौरान भारत में थोक महंगाई दर 43 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई। परिवहन लागत बढ़ी तो वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ीं। खाद्य पदार्थों से लेकर निर्माण सामग्री तक लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हुआ। अगर होर्मुज में कोई नया तनाव पैदा होता है और तेल कीमतें फिर ऊपर जाती हैं तो भारत में महंगाई का दबाव दोबारा बढ़ सकता है।

यानी भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरों को लेकर अधिक सतर्क रहना पड़ेगा। इससे निवेश और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।

रुपये पर दबाव अभी खत्म नहीं

ऊर्जा आयात बढ़ने का सबसे बड़ा असर विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये पर पड़ता है। युद्ध के दौरान भारत का आयात बिल बढ़ा और डॉलर की मांग भी। परिणामस्वरूप रुपया कमजोर हुआ। कमजोर रुपया केवल तेल ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन और अन्य आयातित वस्तुओं को भी महंगा बनाता है। यदि खाड़ी क्षेत्र में फिर अस्थिरता बढ़ती है तो रुपया एक बार फिर दबाव में आ सकता है। इसलिए युद्धविराम के बावजूद भारतीय वित्तीय बाजार पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं।

कृषि पर छिपा हुआ खतरा

इस युद्ध का सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे गंभीर प्रभाव भारतीय कृषि पर पड़ा है। भारत यूरिया और एलएनजी के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है। युद्ध के कारण इनकी आपूर्ति प्रभावित हुई। नतीजतन उर्वरक उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। यदि यह स्थिति लंबे समय तक रहती तो खेती की लागत और खाद्य महंगाई दोनों बढ़ सकती थीं। हालांकि फिलहाल आपूर्ति बहाल होने की उम्मीद है, लेकिन इस संकट ने भारत को एक बार फिर याद दिलाया है कि खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

कूटनीति : शांति प्रक्रिया में लगभग अदृश्य रहा भारत

इस पूरे संकट का एक भू-राजनीतिक पहलू भी है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में ओमान, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों की भूमिका दिखाई दी। रूस और चीन लगातार सक्रिय रहे। लेकिन भारत, जो दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और खाड़ी क्षेत्र से गहरे आर्थिक संबंध रखता है, शांति प्रक्रिया में लगभग अदृश्य रहा। यह स्थिति भारत की विदेश नीति के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है। क्या भारत केवल आर्थिक शक्ति बनकर रह जाएगा या भविष्य में क्षेत्रीय और वैश्विक संकटों में प्रभावशाली कूटनीतिक भूमिका भी निभाएगा? विशेष रूप से तब, जब खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं और भारत के ऊर्जा हित सीधे इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

हमारे लिए तीन सबक

इस युद्ध ने भारत को तीन बड़े सबक दिए हैं। पहला, ऊर्जा निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। जब तक भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर रहेगा, तब तक किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ता रहेगा।

दूसरा, रणनीतिक भंडारण और ऊर्जा विविधीकरण को और तेज करना होगा। रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से तेल आयात बढ़ाने की नीति को और मजबूत करना पड़ेगा।

तीसरा, अक्षय ऊर्जा अब केवल पर्यावरणीय एजेंडा नहीं बल्कि आर्थिक और सामरिक आवश्यकता है। सौर, पवन, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में निवेश भारत को भविष्य के ऐसे संकटों से बचा सकता है।

क्या हालात फिर बिगड़ सकते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर दुर्भाग्य से ‘हां’ है। अमेरिका-ईरान समझौते में कई महत्वपूर्ण मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम सहमति नहीं बनी है। इजराइल इस समझौते का हिस्सा नहीं है। होर्मुज के भविष्य के संचालन और संभावित टोल व्यवस्था पर भी विवाद की संभावना बनी हुई है। यदि इन मुद्दों पर अगले 60 दिनों में सहमति नहीं बनती तो तनाव फिर बढ़ सकता है। यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। बीमा कंपनियां, शिपिंग कंपनियां और निवेशक अभी इंतजार की मुद्रा में हैं।