सत्ता नहीं, मिट्टी की राजनीति का आखिरी योद्धा — सुभाष यादव

Not of power, but of the soil—the last warrior of grassroots politics: Subhash Yadav

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

कुछ लोग इतिहास में दर्ज होते हैं, कुछ लोग भूगोल में बस जाते हैं। सुभाष यादव उन विरले जननेताओं में थे, जिनकी स्मृति केवल पुस्तकों या राजनीतिक अभिलेखों में नहीं, बल्कि निमाड़ की मिट्टी, नर्मदा की लहरों और किसानों की आँखों में आज भी जीवित है। 26 जून की पुण्यतिथि हमें केवल एक पूर्व उपमुख्यमंत्री म.प्र. शासन को याद करने का अवसर नहीं देती, बल्कि उस विचारधारा के सामने खड़ा करती है जिसने राजनीति को सत्ता का मार्ग नहीं, समाज परिवर्तन का साधन माना। बोरावां की धरती पर जन्मा यह व्यक्तित्व आज भी इस प्रश्न का उत्तर है कि जननेता आखिर बनता कैसे है।

1 अप्रैल 1946 को एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे सुभाष यादव ने कृषि स्नातक की शिक्षा प्राप्त की, पर उनकी सबसे बड़ी पाठशाला खेत और किसान रहे। वे उन नेताओं में नहीं थे जो गाँवों को भाषणों में खोजते हैं; वे गाँवों की धड़कनों में बसते थे। उनके व्यक्तित्व में मिट्टी की सादगी और नर्मदा की गहराई का अद्भुत संगम था। मिट्टी की गंध पढ़ना, मौसम की भाषा समझना और किसान की आँखों में छिपी चिंता पहचानना उनकी स्वाभाविक क्षमता थी। इसी कारण निमाड़ में हरित क्रांति की चर्चा जब भी होती है, सुभाष यादव का नाम केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि परिवर्तन के अग्रदूत के रूप में लिया जाता है।

सहकारिता आंदोलन की चर्चा सुभाष यादव के बिना अधूरी है। 1971 में प्राथमिक सहकारी समिति के सदस्य के रूप में शुरू हुई उनकी यात्रा उन्हें लंबे समय तक मध्यप्रदेश राज्य सहकारी बैंक के नेतृत्व तक ले गई। उन्होंने सहकारिता को आर्थिक व्यवस्था नहीं, सामाजिक न्याय का मंत्र बनाया। जवाहरलाल सहकारी सूत मिल और सहकारी शक्कर कारखाने की स्थापना उनके चिंतन की उपज थी। विदेशों में देखे गए प्रयोगों को उन्होंने निमाड़ की धरती पर उतारा। किसानों को बीज, ऋण और बाज़ार की सुलभ व्यवस्था देकर उन्होंने आत्मनिर्भरता की नींव रखी, जिसका लाभ आज भी हजारों परिवारों को मिल रहा है। एनएएफएससीओबी का ‘सुभाष यादव अवॉर्ड’ उनकी विरासत का प्रतीक है।

राजनीति में आने के बाद भी उनका मूल चरित्र नहीं बदला। वे उन नेताओं में नहीं थे जो जनता से केवल चुनाव के समय मिलते हैं। उनके लिए जनता ही राजनीति का केंद्र थी। 1980 और 1985 में खरगोन से लोकसभा सदस्य चुने जाने के बाद भी उन्होंने अपनी जड़ों से दूरी नहीं बनाई। बाद में कसरावद से विधायक बनकर उन्होंने जनविश्वास की मिसाल स्थापित की। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को एकजुट रखा। उनकी राजनीति जाति, क्षेत्र और स्वार्थ से ऊपर उठकर मानवता की थी। वे कहा करते थे कि सत्ता किसान की सेवा के लिए है, शासन करने के लिए नहीं। यही कारण था कि संसद हो या विधानसभा, उनकी आवाज़ में निमाड़ के खेतों की गूंज सुनाई देती थी।

1993 में दिग्विजय सिंह सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल प्रशासनिक दृढ़ता और जनपक्षधरता का उदाहरण बना। कृषि, सहकारिता, जल संसाधन और नर्मदा घाटी विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने सिद्ध किया कि इच्छाशक्ति हो तो व्यवस्था बदली जा सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध 76 इंजीनियरों को सेवा से हटाने का साहसी निर्णय उस समय की राजनीति में असाधारण माना गया। किसान कल्याण आयोग के अध्यक्ष के रूप में दिए गए उनके अनेक सुझावों में से कई आज भी कृषि नीति की आधारशिला हैं। उनका नेतृत्व भावुक नारों का नहीं, ठोस परिणामों का था।

यदि निमाड़ के विकास की कोई तस्वीर बनाई जाए तो उसमें नर्मदा का जल और सुभाष यादव का संकल्प साथ दिखाई देंगे। इंदिरा सागर बाँध सहित अनेक जल परियोजनाओं को गति देकर उन्होंने सूखे क्षेत्रों तक सिंचाई का विस्तार किया। नर्मदा की लहरों को खेतों तक पहुँचाने का उनका सपना लाखों किसानों के जीवन में हरियाली बनकर उतरा। यही कारण है कि जनता ने उन्हें केवल नेता नहीं, ‘निमाड़ का भगीरथ’ कहा। उन्होंने विकास को घोषणाओं में नहीं, खेतों की उपज, किसानों की मुस्कान और गाँवों की समृद्धि में मापा।

सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच उनका पारिवारिक जीवन अनुकरणीय था। पत्नी दामिनी यादव के साथ उनका संबंध सेवा, समर्पण और संस्कारों का संगम था। उन्होंने अपने पुत्रों अरुण यादव और सचिन यादव तथा चार पुत्रियों को शिक्षा, सम्मान और सामाजिक चेतना की विरासत दी। बोरावां स्थित उनका घर हमेशा लोगों से भरा रहता था। किसान, युवा, कार्यकर्ता और आमजन वहाँ सलाह, सहानुभूति और प्रेरणा पाने आते थे। वे धैर्यपूर्वक सुनते, मुस्कुराते और कुछ शब्दों में ही भरोसा जगा देते। परिवार और राजनीति के बीच उन्होंने जो संतुलन प्रस्तुत किया, वह आज भी प्रेरणा का विषय है।

शिक्षा और संस्थागत विकास में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। बोरावां में जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना ने ग्रामीण युवाओं के लिए आधुनिक तकनीकी शिक्षा के द्वार खोले। उन्होंने सैकड़ों विद्यालयों, सहकारी संस्थाओं और विकास परियोजनाओं को जन्म दिया। उनका स्वप्न था—हर किसान शिक्षित और आत्मनिर्भर बने, हर गाँव विकास की मिसाल बने। यूजीसी जैसे राष्ट्रीय मंचों पर उनकी भूमिका इस बात का प्रमाण थी कि वे शिक्षा और विकास को राष्ट्रनिर्माण का आधार मानते थे। उन्होंने कभी पद को प्रतिष्ठा का साधन नहीं बनाया; पद उनके लिए सदैव सेवा का माध्यम रहा।

आज उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि संकल्प है। सुभाष यादव का जीवन याद दिलाता है कि राजनीति का स्वरूप जनसेवा है, विकास का मॉडल सहकारिता है और नेतृत्व का धर्म लोगों को जोड़ना है। वे आज भी बोरावां की हवाओं में, नर्मदा की धाराओं में, सहकारिता की संस्थाओं में और किसानों की उम्मीदों में जीवित हैं। उनकी विरासत पुकारती है—किसानों की आवाज़ कभी दबने मत दो, सहकारिता की मशाल बुझने मत दो और सेवा के पथ से विचलित मत हो। मिट्टी के इस सपूत, हरित क्रांति के अग्रदूत, सहकारिता के पुरोधा और निमाड़ के भगीरथ को नमन। कुछ लोग जीवन जीते हैं, कुछ युग गढ़ते हैं; सुभाष यादव उन्हीं में से एक थे।