सीता राम शर्मा ” चेतन “
भारत के गृह मंत्री के नशामुक्त भारत के संकल्प के बाद देश के कई राज्यों के सत्ता और शासन के द्वारा भी नशामुक्त राज्य की बात की जाने लगी है, जो निःसंदेह स्वागत योग्य और अनुकरणीय है ! पिछले दिनों झारखंड सरकार के द्वारा भी नशामुक्त झारखंड का संकल्प लेने के साथ उस पर त्वरित प्रयास प्रारंभ कर दिया गया है, इसके लिए झारखंड सरकार विशेषकर उसके मुखिया साधुवाद के पात्र हैं । हेमंत को उनके इस संकल्प के लिए, जो संभवतः उन्हें अपने स्वर्गीय पिता और झारखंड राज्य के जनक परम श्रद्धेय शिबू सोरेन जी से विरासत में मिला है, संपूर्ण राज्य की जनता की तरफ से अशेष बधाई, आशीष और अनंत शुभकामनाएं । व्यक्तिगत रूप से झारखंड का एक चिंतनशील लेखक, गिलहरी स्वरूप सामाजिक कार्यकर्ता और नशों के विरुद्ध निरंतर चिंतन तथा संघर्ष करने वाला आम नागरिक होने के नाते जितना उत्साहित और कृतार्थ महसूस कर रहा हूं किसी भी स्थिति में उसका शाब्दिक वर्णन असंभव है !
मुझे याद है 1992 में, जब झारखंड अलग राज्य नहीं बना था, मैंने संपूर्ण बिहार में शराबबंदी की मांग को लेकर अपने कुछ युवा साथियों के साथ मिलकर कई बार धरना-प्रदर्शन और रांची के मोहल्लों में नशों से पीड़ित महिलाओं-बच्चों के बीच जागरूकता अभियान चलाया था । सौभाग्य से उस दरम्यान प्रभात खबर के संपादक हरिवंश थे, जो एक सामाजिक संस्था जनपरिषद, जिसका मैं संयुक्त सचिव बनाया गया था और वे संरक्षक थे, जो वर्तमान समय में देश के राज्यसभा के उपसभापति हैं, उन्होंने उस आंदोलन में पत्रकारिता से संबंधित सहयोग दिया था । उस आंदोलन की विशेष रूप से स्मरणीय बात यह भी रही थी कि उन दिनों देश में कांग्रेस की सरकार थी और प्रतिपक्ष नेता थे परम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेई जी, जिन्हें मैंने 2 अक्टूबर 1992 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बिहार में पूर्ण शराबबंदी के लिए अपने एक साथी के साथ आमरण अनशन पर बैठने की सूचना देते हुए उनसे वहां आने का आग्रह किया था । दुर्भाग्य से वामपंथी दलों की तीन दिवसीय बंदी के कारण रेल यातायात प्रभावित हुआ और हम नहीं जा पाए, पर आश्चर्य की बात यह रही कि वाजपेई जी ने मेरे पत्र का जवाब देते हुए मुझे भाजपा के क्षेत्रीय नेताओं के साथ जुड़कर काम करने का सुझाव दिया था । कुछ मूलभूत नैतिक और सैद्धांतिक विवशता रही कि मैंने ऐसा नहीं कर पाने का विवशतापूर्ण संदेश उन्हें भेजा, जो संभवतः उन्हें भी उचित और विवशतापूर्ण ही लगा होगा । खैर, फिलहाल बात वर्तमान की, तो यह अत्यंत सुखद है कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी बहुत पहले से लागू है और अत्यंत पीड़ादायक बात यह है कि झारखंड में आज भी शराब अपना दुष्प्रभाव जारी रखे हुए है । झारखंड में अशिक्षा, गरीबी, अपराध, आतंक का एक मुख्य कारण नशाखोरी है । देर से ही सही यदि नशामुक्त झारखंड के संकल्प पर सरकार पूरी ईमानदारी और जवाबदेही से काम करे तो यह ना सिर्फ झारखंड की जनता के लिए बल्कि हेमंत सरकार के लिए भी एक बड़ी और अभूतपूर्व परिणाम देने वाली उपलब्धि सिद्ध होगी ।
अब ज्वलंत सवाल यह है कि भारत सरकार ने नशामुक्त भारत के लिए 2047 का लक्ष्य क्यों रखा ? बड़ा सवाल यह भी कि नशामुक्त भारत का लक्ष्य नशामुक्त भारत है या ड्रग्स मुक्त भारत ? क्योंकि संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक सरकार नशामुक्त भारत की बात करते हुए मुख्य रूप से ड्रग माफियाओं और अतंरराष्ट्रीय तस्करों की बात करती है ना कि गुटखा, सिगरेट, तंबाकू, गांजा और शराब जैसे सभी नशों की ! जिनका नशाखोरी के लिए आज भी ज्यादा उपयोग हो रहा है और सच्चाई तो यही है कि ड्रग्स जैसे खतरनाक नशों के ज्यादातर शिकार वही लोग होते हैं जो पहले इन नशों का सेवन कर रहे होते हैं । गौरतलब है कि प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार भारत की पच्चीस प्रतिशत आबादी ( लगभग सैंतीस करोड़ जनमानस ) नशाखोरी का शिकार है । देश में प्रतिवर्ष लगभग तेरह लाख लोगों की मौत तंबाकू, गुटखा, सिगरेट जैसे नशों के कारण हुई बीमारियों से होती है । नशाखोरी से देश की जीडीपी के नुकसान का प्रतिशत ढाई है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग नब्बे प्रतिशत आपराधिक घटनाएं नशों की अवस्था में या उसके कारण होती हैं । इन सवालों और आंकड़ों पर ज्यादा विचार करने के पहले एक जरूरी जानकारी यह कि देश की सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानवीय संपदा को नशों में लिप्त रखने के लिए सरकार को इन घोर स्वास्थ्य नाशक, अपराध जनक नशों के उत्पादन और विक्रय से लगभग ढाई लाख करोड़ रुपए का भारी भरकम राजस्व लाभ होता है और इन नशों से उत्पन्न बीमारियों, मानवीय त्रासदियों पर खर्च की अनुमानित राशी है डेढ़ लाख करोड़ रुपए ! अर्थात नशों की इस जन विरोधी, वीभत्स और घोर यातनादायक नीति से राजस्व लाभ होता है लगभग एक लाख करोड़ रुपए ! अब सवाल यह कि क्या राजस्व लाभ के लिए नशों का उत्पादन और विक्रय उचित है ? क्या कोई सरकार, जो जन स्वास्थ्य, जीवन और चरित्र को खतरे में डाल कर राजस्व लाभ कमाती है, उसे नैतिक, जिम्मेवार, जन हितैषि और देशभक्त सरकार कहना सही है ? क्या सचमुच भारतीय जनमानस नशों में इस हद तक लिप्त और उसका रोगी हो चुका है कि सरकार अब नशों से मुक्ति के लिए त्वरित कोई बड़ा और सफल प्रयास करने में असमर्थ हो चुकी है ? ऐसे तमाम प्रश्नों का सपाट उत्तर है – नहीं । तो फिर इस दिशा में गंभीर विचार और प्रयास क्यों नहीं हो रहा !
अब बात नशों को लेकर सरकार की । सौभाग्य से इस समय देश का नेतृत्व एक ऐसे व्यक्तित्व के पास है जो स्वंय नशा नहीं करता । जो उस राज्य का व्यक्ति है जिसके निर्माण के समय 1960 से ही शराबबंदी लागू है । जो सचमुच देश और समाज के प्रति ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और जिम्मेवार दिखाई देता है । फिर राष्ट्रीय सत्ता में एक युग तक ( बारह वर्ष ) शासन और उसका नेतृत्व कर रहा वह शासक नशों के विरुद्ध कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा सका ? अब भी क्यों नहीं उठाता दिखता ? रही बात नशों के नाम पर ड्रग्स के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने या उससे मुक्ति की, तो सच्चाई यही है कि इसका दायरा पिछले एक युग में ही ज्यादा बढ़ा और भयावह हुआ है ! कारण अपराधियों, आंतकियों, नक्सलवादियों का इस क्षेत्र में पलायन हुआ है तो भी इसे सरकार को अपनी नाकामी समझ तेज और कठोर प्रयास करने चाहिए । हो रहा है और होगा भी पर इसके लिए समय सीमा 2047 आश्चर्य चकित करती है ! इस क्षेत्र के एक अपराधी से हजार अपराधियों तक पहुंचा जा सकता है फिर हजारों अपराधियों के पकड़ में आने के बावजूद इतना विलंब क्यों ? उत्तर सरल है – संवैधानिक, राजनीतिक, प्रशासनिक खामियां, कमियां, जिसे दूर करने का दायित्व और अधिकार सरकार के पास है तो फिर विलंब क्यों ? उत्तर सरकार को सोचने और खोजने की जरूरत है । क्या सरकार ऐसा करेगी ? और करेगी, कर रही है तो उसका दायरा क्या है ? नशाखोरी, इसके कारण और निराकरण पर चिंतन, चर्चा और सवालों का दायरा व्यापक और लगभग सबकी समझ में है, जो नशों के शिकार हैं उनके भी, अतः अंतिम बात सिर्फ यही कि क्या सचमुच सरकार देश में पूर्ण नशामुक्ति चाहती है ? और चाहती है तो कैसे ? कब तक ? यदि इसकी समय-सीमा 2047 अर्थात अगले इक्कीस वर्ष है तो फिर सरकार की नीति और नीयत नशामुक्त भारत के चिंतन, विचार, संकल्प और क्रियान्वयन को लेकर बहुत स्पष्ट रूप से संदिग्ध और त्रुटिपूर्ण है । सरकार को सबसे पहले अपने नशामुक्त भारत के चिंतन और लक्ष्य को स्पष्ट करना चाहिए कि वह नशामुक्त भारत चाहती है या ड्रग्स मुक्त भारत ?
यदि लक्ष्य नागरिक और राष्ट्रहित है, लक्ष्य नशामुक्त भारत है तो सरकार ड्रग्स जैसे नशों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करते हुए जनहित में राजस्व लोभ का त्याग कर सरकार समर्थित नशों के उत्पादन और विक्रय पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने की दिशा में त्वरित प्रयास करे । सरकार गंभीरतापूर्वक यह समझे जाने और मानें कि जिस तरह आतंकवाद किसी भी स्थिति में अच्छा और वैध नहीं हो सकता उसी तरह नशा चाहे वह ड्रग्स हो या फिर शराब और तंबाकू कोई भी नशा किसी भी स्थिति में अच्छा और वैध नहीं होना चाहिए । सरकार को यह समझना चाहिए कि वैधानिक रूप से राजस्व प्राप्त करने वाले नशों से भी जनता का उतना ही स्वास्थ्य, चरित्र और जीवन बर्बाद होता है जितना अवैध नशों से होता है । फर्क सिर्फ इतना है कि अवैध नशों के कारोबार से सरकार को राजस्व नहीं मिलता है और लाभ गलत लोगों के पास जाता है पर उससे नुकसान तो आम जनता का ही होता है । अतः यदि वह सचमुच नशामुक्त भारत का संकल्प साकार करना चाहती है । अपने सबसे बहुमूल्य मानवीय संपदा का स्वास्थ्य और विकास चाहती है तो नशामुक्त भारत के अपने संकल्प, औचित्य और क्रियान्वयन पर ज्यादा ईमानदार और गंभीर होकर काम करे, छलिया और सस्ती लोकप्रियता अथवा नशामुक्ति के नाम पर सरकारी धन के दुरुपयोग के लिए नहीं । नशामुक्त भारत के सरकारी संकल्प पर संदेह का कारण स्पष्ट है – लक्ष्य 2047 क्यों ?





