सत्ता के शिखर पर उभरती दरारों के सियासी मायने?
के. पी. मलिक
भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक से चर्चा का केंद्र मुख्यतः विपक्ष की कमजोरियां, उसके भीतर का नेतृत्व संकट, दलबदल और गठबंधन की चुनौतियां रही हैं। राजनीतिक विश्लेषण का बड़ा हिस्सा इस सवाल पर केंद्रित रहा है कि विपक्ष भाजपा का मुकाबला क्यों नहीं कर पा रहा है। लेकिन इसी दौरान एक दूसरा महत्वपूर्ण सवाल अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है कि क्या देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक-संगठनात्मक संरचना, यानी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), के भीतर भी ऐसे अंतर्विरोध और चुनौतियां उभर रही हैं जो भविष्य की राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं?
लोकतंत्र में किसी भी दल या संगठन की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए केवल उसके विरोधियों की कमजोरी देखना पर्याप्त नहीं होता। सत्ता के केंद्र में बैठे संगठनों के भीतर चल रही प्रक्रियाओं, मतभेदों और शक्ति-संतुलन को भी समझना आवश्यक होता है। हाल के महीनों में विभिन्न राज्यों से सामने आए घटनाक्रम इसी दिशा में कुछ महत्वपूर्ण संकेत देते दिखाई देते हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस नेता और राज्य के मंत्री प्रियंक खड़गे द्वारा संघ की जवाबदेही, उसके आर्थिक स्रोतों और संगठनात्मक संरचना को लेकर उठाए गए सवालों ने एक नई बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भारतीय लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा हैं, लेकिन इस मामले में दिलचस्प बात यह रही कि भाजपा और संघ की ओर से अपेक्षाकृत संयमित प्रतिक्रिया देखने को मिली। इससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हुई कि क्या भाजपा और संघ दोनों अपने सार्वजनिक संवाद को लेकर पहले की तुलना में अधिक सतर्क हो गए हैं, या फिर वे कुछ ऐसे सवालों का सामना कर रहे हैं जिनका जवाब केवल राजनीतिक नारों से नहीं दिया जा सकता।
हालांकि भाजपा और संघ के संबंधों को लेकर समय-समय पर अटकलें लगती रही हैं, लेकिन दोनों के बीच संबंध हमेशा एक समान नहीं रहे। संघ वैचारिक संगठन है जबकि भाजपा एक चुनावी राजनीतिक दल। दोनों के उद्देश्य समान हो सकते हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली और प्राथमिकताएं कई बार अलग-अलग दिखाई देती हैं। जैसे-जैसे भाजपा एक व्यापक चुनावी मशीन में बदलती गई है, वैसे-वैसे उसके भीतर व्यावहारिक राजनीति और संघ के पारंपरिक वैचारिक आग्रहों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ी है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता और लोकप्रियता ने उन्हें भाजपा के भीतर एक अत्यंत प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया है। स्वाभाविक रूप से इससे उनके और केंद्रीय नेतृत्व के संबंधों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक अटकलें भी सामने आती रहती हैं। चाहे इन अटकलों का कोई ठोस आधार हो या न हो, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भाजपा अब केवल एक व्यक्ति या एक केंद्र पर आधारित राजनीतिक संरचना नहीं रह गई है। विभिन्न राज्यों में कई शक्तिशाली क्षेत्रीय चेहरे उभर चुके हैं, जिनकी अपनी राजनीतिक पूंजी और जनाधार है।
राम मंदिर से जुड़े चंदा विवादों की चर्चाएं, प्रशासनिक घटनाओं को लेकर उठते सवाल और लखनऊ जैसे मामलों पर होने वाली आलोचनाओं को भी कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसी व्यापक सत्ता-संतुलन के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। राजनीति में घटनाएं केवल प्रशासनिक नहीं होतीं; वे अक्सर शक्ति समीकरणों, छवि निर्माण और नेतृत्व संघर्षों का हिस्सा भी बन जाती हैं। हालांकि इन दावों की पुष्टि करना फिलहाल कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट है कि भाजपा के भीतर नेतृत्व की अगली पीढ़ी और भविष्य की भूमिका को लेकर चर्चाएं लगातार जारी हैं।
उधर मध्य प्रदेश का घटनाक्रम भी कम दिलचस्प नहीं है। मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़े भूमि सौदों के विवाद और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक भूमिका को लेकर समय-समय पर उठने वाले सवाल इस बात का संकेत देते हैं कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी पुराने और नए नेतृत्व के बीच सियासी संतुलन बनाए रखना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होता। भाजपा ने मध्य प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन का बड़ा फैसला लिया, लेकिन उसके बाद भी शिवराज सिंह चौहान का जनाधार और राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
ऐसे में राज्य की राजनीति को केवल प्रशासनिक फैसलों के नजरिए से नहीं बल्कि आंतरिक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। भाजपा के सामने एक और महत्वपूर्ण चुनौती उसकी लगातार बढ़ती दलबदल-आधारित विस्तार रणनीति से जुड़ी है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में दूसरे दलों के नेता भाजपा में शामिल हुए हैं। चुनावी दृष्टि से यह रणनीति सफल दिखाई देती है क्योंकि इससे संगठन का तत्काल विस्तार होता है और नए सामाजिक समूहों तक पहुंच भी बनती है। लेकिन यह भी सच है कि हर सियासी फायदे की एक संगठनात्मक कीमत भी होती है।
भाजपा की पहचान लंबे समय तक एक कैडर-आधारित पार्टी की रही है, जहां कार्यकर्ता वैचारिक प्रतिबद्धता के आधार पर वर्षों तक संगठन में काम करते थे। ऐसे में जब बाहर से आए नेताओं को तेजी से महत्वपूर्ण पद और प्रतिनिधित्व मिलने लगते हैं, तो स्वाभाविक रूप से पुराने कार्यकर्ताओं के भीतर असंतोष और असहजता की भावना पैदा हो सकती है। यह चुनौती केवल भाजपा तक सीमित नहीं है; हर कैडर-आधारित संगठन को विस्तार और वैचारिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। लेकिन भाजपा के विशाल आकार और लगातार बढ़ती चुनावी महत्वाकांक्षाओं के कारण यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय राजनीति का एक बड़ा भ्रम यह है कि मजबूत चुनावी प्रदर्शन का अर्थ संगठन के भीतर पूर्ण एकता भी है। इतिहास बताता है कि कई बार सबसे बड़े राजनीतिक दलों के भीतर ही सबसे जटिल अंतर्विरोध मौजूद होते हैं। सत्ता जितनी बड़ी होती है, उसके भीतर शक्ति-संतुलन, महत्वाकांक्षाएं और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही जटिल हो जाती है।
इसलिए भारतीय राजनीति को केवल विपक्ष की कमजोरियों के चश्मे से देखने की बजाय सत्ता पक्ष के भीतर चल रही प्रक्रियाओं को भी समझना आवश्यक है। भाजपा और संघ आज भी देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक-संगठनात्मक ताकत हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे चुनौतियों से मुक्त हैं। नेतृत्व के नए केंद्रों का उभार, संगठन और सत्ता के बीच संतुलन, दलबदल की राजनीति का प्रभाव, वैचारिक कैडर की अपेक्षाएं और भविष्य की नेतृत्व संरचना जैसे प्रश्न आने वाले वर्षों में भाजपा और संघ दोनों के सामने महत्वपूर्ण मुद्दे बने रह सकते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक परिवर्तन केवल चुनावी हार-जीत से नहीं आते। कई बार वे उन अंतर्विरोधों से जन्म लेते हैं जो लंबे समय तक सतह के नीचे विकसित होते रहते हैं। इसलिए शायद आज का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न यह नहीं है कि विपक्ष कितना कमजोर है, बल्कि यह है कि क्या सत्ता के शिखर पर खड़े संगठनों के भीतर भी बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)





