सौरभ वार्ष्णेय
भारत में नागरिकता को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि पासपोर्ट अपने-आप में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है, विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि नागरिकता का निर्धारण केवल किसी एक दस्तावेज़ से नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के आधार पर होता है। यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकों के भरोसे से भी जुड़ा है। आम नागरिक का सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि आधार, वोटर आईडी, पैन कार्ड और यहां तक कि पासपोर्ट भी अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो आखिर भारतीय नागरिकता सिद्ध कैसे होगी? लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति नागरिक का विश्वास होता है। यदि नागरिक को अपने ही अधिकारों के प्रमाण को लेकर असमंजस रहे, तो यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कही जा सकती। इसलिए समय की मांग है कि नागरिकता प्रमाणन की प्रक्रिया स्पष्ट, सर्वसुलभ और विवाद-मुक्त बनाई जाए, ताकि किसी भी भारतीय को अपनी नागरिकता साबित करने के प्रश्न पर अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि पहचान और नागरिकता एक जैसी नहीं हैं। आधार कार्ड आपकी पहचान और निवास का प्रमाण है। वोटर आईडी मतदान के अधिकार का प्रमाण है। पैन कार्ड आयकर संबंधी पहचान है। ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति देता है। पासपोर्ट विदेश यात्रा और अंतरराष्ट्रीय पहचान का दस्तावेज़ है। लेकिन इनमें से कोई भी दस्तावेज़ अकेले नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता।
आखिर नागरिकता कैसे तय होती है? भारत में नागरिकता का आधार नागरिकता अधिनियम, 1955 है। इस कानून के अनुसार नागरिकता प्राप्त करने के प्रमुख आधार हैं—्रजन्म के आधार पर, वंश के आधार पर, पंजीकरण द्वारा, प्राकृतिककरण द्वारा, किसी क्षेत्र के भारत में विलय के आधार पर। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर प्रश्न उठता है तो संबंधित प्राधिकारी उपलब्ध दस्तावेज़ों, जन्म संबंधी अभिलेखों, माता-पिता की नागरिकता, सरकारी रिकॉर्ड तथा अन्य कानूनी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करता है। कोई एक दस्तावेज़ हर परिस्थिति में निर्णायक नहीं होता।
हाल के वर्षों में जन्म प्रमाण पत्र को सबसे महत्वपूर्ण आधार दस्तावेज़ों में माना जाने लगा है, क्योंकि इससे जन्म तिथि और जन्म स्थान दोनों का रिकॉर्ड उपलब्ध होता है। लेकिन जिन लोगों का जन्म दशकों पहले हुआ और जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, उनके लिए स्कूल प्रमाणपत्र, भूमि अभिलेख, पारिवारिक रिकॉर्ड, सरकारी सेवा अभिलेख तथा अन्य आधिकारिक दस्तावेज़ भी परिस्थितियों के अनुसार महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।
विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बाद विपक्ष ने प्रश्न उठाया कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आम नागरिक किस दस्तावेज़ पर भरोसा करे। दूसरी ओर सत्तापक्ष का तर्क है कि दुनिया के अनेक देशों में भी पासपोर्ट नागरिकता निर्धारण का एकमात्र कानूनी आधार नहीं होता और विवाद की स्थिति में मूल नागरिकता रिकॉर्ड ही निर्णायक होते हैं। यह बहस संसद से लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों तक फैल चुकी है।
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में आज तक ऐसा कोई एकल राष्ट्रीय नागरिकता प्रमाण-पत्र नहीं है जिसे हर स्थिति में अंतिम माना जाए। परिणामस्वरूप लोग आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेज़ों को ही नागरिकता का प्रमाण समझ लेते हैं, जबकि कानून की दृष्टि से इनकी भूमिका अलग-अलग है।
लोकतंत्र में केवल कानून होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका स्पष्ट और सरल संप्रेषण भी आवश्यक है। यदि नागरिकों में यह भ्रम बना रहे कि कौन-सा दस्तावेज़ वैध है और कौन-सा नहीं, तो इससे अनावश्यक भय और अफवाहें फैल सकती हैं।
सरकार को चाहिए कि नागरिकता प्रमाणन संबंधी एक स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करे, जिसमें बताया जाए कि विभिन्न परिस्थितियों में कौन-कौन से दस्तावेज़ स्वीकार्य होंगे। इससे प्रशासनिक विवाद भी कम होंगे और नागरिकों का विश्वास भी बढ़ेगा।
हर नागरिक को अपने जन्म, शिक्षा, परिवार और संपत्ति से जुड़े मूल सरकारी दस्तावेज़ सुरक्षित रखने चाहिए। दस्तावेज़ों का डिजिटलीकरण और समय-समय पर उनका अद्यतन कराना भी आवश्यक है। भविष्य में किसी भी कानूनी प्रक्रिया के दौरान यही रिकॉर्ड सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।
नागरिकता केवल एक कानूनी स्थिति नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और कर्तव्यों का आधार है। इसलिए इस विषय पर राजनीति से अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता की आवश्यकता है। नागरिकों को भ्रमित करने के बजाय सरकार को एक सरल, एकीकृत और पारदर्शी नागरिकता प्रमाणन व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।
अब केंद्र सरकार को सोचना चाहिए कि आखिर नागरिकता साबित करने के लिए कौन-सा दस्तावेज वैध है जिसे नागरिक प्रस्तुत कर अपनी नागरिकता सिद्व कर सके। इस सबका एक ही निराकरण है कि केंद्र सरकार को सर्वप्रथम एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर इस नागरिकता पर स्पष्टता करनी चाहिए। ताकि देश में इसको लेकर किसी के मन में भ्रम न हो।





