कैसे खुली केतन हत्याकांड की परतें

How the layers of the Ketan murder case were unraveled

महेन्द्र तिवारी

केतन अग्रवाल हत्याकांड उन मामलों में शामिल हो गया है जिन्होंने यह दिखाया कि आधुनिक अपराध जांच में डिजिटल साक्ष्य कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुरुआत में जो घटना एक दुखद दुर्घटना प्रतीत हो रही थी, वह कुछ ही दिनों में ऐसे मामले में बदल गई जिसमें कथित साजिश, रिश्तों के उलझे हुए समीकरण, मोबाइल डेटा, कॉल रिकॉर्ड और लोकेशन विश्लेषण जैसे कई पहलू सामने आए। पुलिस का दावा है कि यदि परिवार ने शुरुआती स्तर पर संदेह व्यक्त नहीं किया होता और तकनीकी साक्ष्यों की गहराई से जांच न की जाती, तो संभव है कि यह मामला एक सामान्य दुर्घटना मानकर बंद कर दिया जाता।

महाराष्ट्र के पुणे क्षेत्र में रहने वाले 26 वर्षीय केतन अग्रवाल की मौत 18 जून को लोहागढ़ किले के पास हुई थी। शुरुआती जानकारी के अनुसार माना गया कि वह ऊंचाई से गिर गए थे और इसी कारण उनकी मृत्यु हुई। उस समय उपलब्ध परिस्थितियां भी दुर्घटना की संभावना की ओर इशारा कर रही थीं। परिवार शोक में डूबा हुआ था और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की गई। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। कुछ दिनों बाद घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी।

पुलिस के अनुसार इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी केतन की बहन साबित हुईं। अंतिम संस्कार के लगभग 4 दिन बाद सिया गोयल परिवार से मिलने पहुंचीं। परिवार के सदस्यों से बातचीत के दौरान केतन की बहन ने घटना से जुड़े कई सवाल पूछे। बताया जाता है कि कुछ सवालों के जवाबों में विरोधाभास दिखाई दिया। बहन को लगा कि घटना के बारे में पूरी सच्चाई सामने नहीं आ रही है। यह संदेह धीरे धीरे गहराता गया और परिवार ने अपनी शंकाएं पुलिस के सामने रखीं। यही वह क्षण था जिसने जांच को नई दिशा दे दी। बाद में पुलिस ने भी माना कि परिवार की ओर से व्यक्त किया गया यह शक जांच की पहली महत्वपूर्ण कड़ी बना।

जब पुलिस ने मामले को केवल दुर्घटना मानकर देखने के बजाय अन्य संभावनाओं पर भी विचार करना शुरू किया, तब तकनीकी और डिजिटल जांच का दायरा बढ़ाया गया। मोबाइल फोन रिकॉर्ड, कॉल डिटेल्स, इंटरनेट उपयोग, लोकेशन डेटा और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों की जांच शुरू हुई। इसी दौरान सिया गोयल और चेतन चौधरी के बीच संपर्कों का विश्लेषण किया गया। पुलिस के अनुसार पिछले लगभग 6 महीनों के दौरान दोनों के बीच 2004 बार फोन पर बातचीत हुई थी। यह संख्या अपने आप में जांच अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पर्याप्त थी। जब बातचीत की कुल अवधि का आकलन किया गया तो वह लगभग 238 घंटे निकली। कुछ रिपोर्टों में यह अवधि 258 घंटे भी बताई गई है, लेकिन जांच से जुड़े प्रमुख दावों में 238 घंटे का आंकड़ा प्रमुख रूप से सामने आया।

जांच एजेंसियों के लिए केवल कॉल्स की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं थी, बल्कि उन कॉल्स की आवृत्ति, समय और परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण थीं। पुलिस का मानना है कि इतने बड़े स्तर पर लगातार संपर्क ने दोनों व्यक्तियों के संबंधों और संभावित योजनाओं को लेकर सवाल खड़े किए। इसी आधार पर जांच को और गहरा किया गया। कॉल रिकॉर्ड का विश्लेषण करते समय यह देखा गया कि किन दिनों में बातचीत अधिक हुई, किन समयों पर संपर्क हुआ और घटना से पहले संपर्क की प्रकृति कैसी थी। इन जानकारियों ने जांच को आगे बढ़ाने में सहायता की।

मामले में एक और महत्वपूर्ण बिंदु इंटरनेट गतिविधियों से जुड़ा था। पुलिस का दावा है कि घटना वाले दिन सुबह लगभग 7 बजे से शाम 5 बजकर 40 मिनट तक चेतन चौधरी का इंटरनेट बंद रहा। जांचकर्ताओं ने इस तथ्य को अत्यंत महत्वपूर्ण माना क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहने की स्थिति संदेह उत्पन्न करती है। पुलिस ने यह समझने का प्रयास किया कि क्या यह महज संयोग था या किसी योजना का हिस्सा। इसी प्रश्न ने जांच को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया।

जांच के दौरान यह भी आरोप सामने आया कि चेतन चौधरी ने अपना मोबाइल फोन अपनी दुकान पर छोड़ दिया था और किसी कर्मचारी का फोन साथ लेकर गया था। पुलिस का दावा है कि ऐसा वास्तविक लोकेशन छिपाने और मोबाइल ट्रैकिंग से बचने के उद्देश्य से किया गया हो सकता है। यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह दर्शाता है कि डिजिटल निगरानी से बचने का प्रयास किया गया था। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही संभव होगा, लेकिन जांच एजेंसियों ने इसे एक महत्वपूर्ण संकेत माना।

जांचकर्ताओं ने घटना वाले दिन की प्रत्येक गतिविधि को दोबारा खंगालना शुरू किया। मोबाइल लोकेशन रिकॉर्ड, कॉल हिस्ट्री और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को एक साथ जोड़कर देखा गया। जिन लोगों ने उस दिन संबंधित मोबाइल नंबरों पर कॉल किया था, उनसे भी पूछताछ की गई। पुलिस के अनुसार कुछ लोगों ने बताया कि फोन पर संबंधित व्यक्ति ने स्वयं बात नहीं की थी बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने कॉल रिसीव की थी। इस जानकारी ने जांच अधिकारियों के संदेह को और मजबूत किया।

डिजिटल जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अलग अलग स्रोतों से प्राप्त जानकारियों को एक दूसरे के साथ मिलाकर देखा गया। केवल कॉल रिकॉर्ड या केवल लोकेशन डेटा के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय पुलिस ने विभिन्न तकनीकी संकेतों को जोड़ने का प्रयास किया। कॉल्स की संख्या, बातचीत की अवधि, इंटरनेट उपयोग का पैटर्न, मोबाइल की गतिविधियां और कथित लोकेशन डेटा को एक साथ रखकर घटनाक्रम का पुनर्निर्माण किया गया। पुलिस का दावा है कि इसी प्रक्रिया में कथित साजिश की कई परतें सामने आईं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जांच में सीसीटीवी फुटेज की भी भूमिका रही। पुलिस ने विभिन्न स्थानों से उपलब्ध दृश्य सामग्री का अध्ययन किया और उसे अन्य डिजिटल साक्ष्यों के साथ मिलाया। जांचकर्ताओं का मानना है कि तकनीकी साक्ष्य कई बार मानवीय स्मृति या बयानों की तुलना में अधिक वस्तुनिष्ठ जानकारी प्रदान करते हैं। यही कारण है कि इस मामले में भी इलेक्ट्रॉनिक डेटा को विशेष महत्व दिया गया।

इस मामले ने एक बार फिर यह प्रश्न भी उठाया कि आधुनिक समाज में मोबाइल फोन किस प्रकार किसी व्यक्ति की गतिविधियों का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार कर देते हैं। कॉल रिकॉर्ड, इंटरनेट उपयोग, संदेशों का समय, लोकेशन संकेत और अन्य डिजिटल निशान मिलकर किसी व्यक्ति की गतिविधियों की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत कर सकते हैं। केतन हत्याकांड की जांच में भी यही हुआ। पुलिस ने दावा किया कि तकनीकी साक्ष्यों ने उन सवालों के जवाब देने में मदद की जिनका उत्तर केवल प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों से नहीं मिल पा रहा था।

मामले का एक अन्य पहलू कथित संबंधों और व्यक्तिगत परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। रिपोर्टों में दावा किया गया कि सिया गोयल और चेतन चौधरी के बीच लंबे समय से संपर्क था। जांच एजेंसियों ने इसी पृष्ठभूमि में दोनों के बीच हुए संवादों और गतिविधियों का विश्लेषण किया। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि कथित साजिश को अंजाम देने के प्रयास पहले भी किए गए थे और बाद में घटना घटी। हालांकि इन सभी आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होगी।

दूसरी ओर बचाव पक्ष ने जांच एजेंसियों के दावों पर प्रश्न भी उठाए हैं। आरोपी पक्ष के वकील ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि आरोपों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं हैं और कई दावों की जांच अदालत में की जानी बाकी है। इससे स्पष्ट है कि मामला अभी भी कानूनी प्रक्रिया के अधीन है और सभी पक्षों के तर्कों का परीक्षण न्यायालय में होगा।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना स्पष्ट दिखाई देता है कि केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में सबसे पहला निर्णायक मोड़ परिवार के संदेह से आया। यदि केतन की बहन को सिया गोयल के व्यवहार और जवाबों पर संदेह न होता, तो संभव है कि मामला उसी दिशा में आगे बढ़ता जिस दिशा में शुरुआत में जा रहा था। लेकिन एक सवाल, एक संदेह और उसके बाद की गई तकनीकी जांच ने पूरे घटनाक्रम को बदल दिया। इसके बाद 2004 कॉल्स, 238 घंटे की बातचीत, इंटरनेट गतिविधियों से जुड़े तथ्य, संदिग्ध लोकेशन और अन्य डिजिटल साक्ष्य जांच का आधार बने। पुलिस का दावा है कि इन्हीं तकनीकी सुरागों ने कथित साजिश की परतें खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं अंतिम सत्य का निर्धारण अब न्यायिक प्रक्रिया और अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर होगा।