समाज का नैतिक पतन

The moral decline of society

डॉ वंदना शर्मा

आज बहुत से युवक-युवतियाँ शादी नहीं करना चाहते क्योंकि उन्होंने अपने घर में रोज लड़ाई-झगड़े होते देखे होंगे। किसी एक को ही सबकी खुशी के लिए पिसते देखा होगा। आत्म-सम्मान का अर्थ ही है अपनी आत्मा का सम्मान। स्वयं से प्यार करना बेहद जरूरी है। आज जिम्मेदारी से भागने लगे हैं और लिव इन में रहने लगे हैं। जिससे अपराध तो बढ़ें ही है रिश्तों से भरोसा गायब हो गया है। सहन शक्ति इतनी कम हो गई है लोगों की ज़रा सी बात पर दूसरे की जान लेना भी गुनाह नहीं लगता।

समाज में जब ऐसे लोगों को देखती हूँ तो बहुत दुख होता है। एक इंसान दूसरे इंसान के साथ कैसे अमानवीय व्यवहार कर सकता है। कितनी घिनौनी सोच होती होगी ऐसे हैवान रूपी मनुष्य की। समाज का नैतिक पतन हो चुका है।

अखबार और न्यूज चैनल में आए दिन ऐसी घटनाएँ देखने को मिलती हैं। प्रेमी ने प्रेमिका को धोखा दिया। किसी लड़की ने प्रेमी के लिए मंगेतर को पहाड़ी से गिरा दिया। कहाँ जा रहा है हमारा समाज। आज यह गंभीर चिंतन का विषय है।

आज युवा पीढ़ी की सोच, हरकतें इतनी खतरनाक हो चुकी हैं। किसी की हत्या करने से पहले हाथ भी नहीं काँपते। दूसरे की जान लेना आज की युवा पीढ़ी के लिए मजाक बन गया है। कैसे संस्कार दे रहे हैं हम अपने बच्चों को? अभिभावकों को जरूर सोचना चाहिए।

पैसों की अंधी दौड़ ने आज इंसान को भी अंधा बना दिया। सहनशीलता और धैर्य तो है ही नहीं आज के युवाओं में। हाल ही में मुंबई लोकल ट्रेन में एक युवक ने दूसरे यात्री को चाकू से गोद डाला जरा सी बात पर।

इतनी हिंसा इन लोगों के दिमाग में आती कहाँ से है। आधुनिकता और दिखावे की होड़ में माँ-बाप तो पैसा कमाने निकल जाते हैं और बच्चों को छोड़ जाते हैं डे-केयर में या आया के भरोसे। मुझे लगता है समस्या की जड़ कहीं न कहीं हमारी-आपकी दी हुई परवरिश में ही है।

कुछ माँ-बाप शुरू से ही बच्चों के मन में ईर्ष्या के बीज बो देते हैं। “अपनी चीज, अपने खिलौने किसी से शेयर न करना, कोई कुछ कहे तो उल्टा जवाब देना।” कुछ माँ-बाप बच्चों की हर जिद पूरी करने में लगे रहते हैं, उन्हें एडजस्ट करना सिखाते ही नहीं हैं।

मेरी एक परिचित है वो अपनी बेटी को फर्स्ट न आने पर इतना प्रेशर करती है कि बच्ची फर्स्ट न आने पर पूरे दिन रोती, दूसरी बच्ची से ईर्ष्या करने लगी। बच्चों को टीम भावना सिखाते ही कहाँ हैं।

आपको आज हर-तीसरे घर में जिद्दी बच्चे मिल जाएँगे जो अपनी जिद पूरी करने के लिए तोड़-फोड़ करने लगते हैं, माँ-बाप पर हाथ उठाते हैं। ऐसे बच्चे ही बड़े होकर अपराधी बनते हैं जिन्हें ‘ना’ सुनने की आदत नहीं होती। जरा सी बात पर आक्रामक हो जाते हैं।

पहले बच्चे माँ-बाप, गुरुजनों से डरते थे, आज माँ-बाप बच्चों से डरते हैं – कहीं उल्टा न बोल दे। पांचवीं छठी के बच्चे हिंसा में लिप्त पाए जाते हैं। जरा-जरा सी बात पर साथी बच्चों का सिर फोड़ देना, गला पकड़ना, बदमाशी करना, गाली देना, फ्रेंड/गर्लफ्रेंड बनाना आजकल के बच्चों का स्टेटस सिंबल बन गया है।

रही-सही कसर मोबाइल और फिल्मों ने पूरी कर दी। माँ-बाप बच्चों को शांत करने के लिए फोन पकड़ा देते हैं। बच्चा क्या देख रहा है, क्या सीख रहा है इस पर कोई निगरानी नहीं रखते।

महाभारत में एक उदाहरण आता है कि गाय अपने बछड़े को ही चाट रही है और बछड़ा कमजोर पड़ा है जिसका अर्थ धर्मराज युधिष्ठिर ने बताया था कि कलयुग में माँ-बाप ज्यादा प्यार और लाड़ में स्वयं ही अपने बच्चों को पंगु बना देंगे।

अधिक लाड़-प्यार ही बच्चों को बिगाड़ रहा है। बच्चों को सिखाएं अपना काम स्वयं करना, असफलता को स्वीकारना, किसी के द्वारा रिजेक्शन को स्वीकारना, पर्यावरण व जानवरों की रक्षा करना, दया, करुणा, सहयोग, दूसरों की सहायता करना सिखाएं।

वरना ऐसी खबरें रोज देखने को मिलेंगी। मानवता शर्मसार हो रही है। संवेदनाएँ मर चुकी हैं। जिंदगी की कीमत इतनी सस्ती तो कभी नहीं थी कि किसी को जान से मारने से पहले हत्यारे के हाथ भी नहीं काँपते।

समस्या की जड़ बच्चों की परवरिश में ही है। पहले माँ-बाप को मोबाइल की लत छोड़नी पड़ेगी, पहले खुद सुधरना होगा तभी बच्चों को अपराधी बनने से रोक सकते हैं।