आलोक बाजपेयी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के बीच हाल ही में शुरू हुआ सार्वजनिक विवाद समकालीन कूटनीति के एक नए और कड़े अध्याय को रेखांकित करता है। कल तक जो मेलोनी यूरोप में ‘ट्रम्प की सबसे भरोसेमंद आवाज’ मानी जाती थीं, आज वे ट्रम्प के तीखे हमलों का सबसे मुखर जवाब दे रही हैं। यह कूटनीतिक टकराव भारत जैसे उभरते हुए वैश्विक पावरहाउस के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सबक है—कि जब एक महाशक्ति का राष्ट्रवाद आपकी राष्ट्रीय गरिमा और स्वायत्तता पर चोट करने लगे, तो रणनीतिक चुप्पी हमेशा सबसे बेहतर विकल्प नहीं होती।
ट्रम्प-मेलोनी विवाद: ईरान पर हमलों में सहभाग से इटली के इंकार ने बिगाड़े सम्बन्ध
यह विवाद रातों-रात पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसकी जड़ें रणनीतिक मतभेदों और व्यक्तिगत बयानों के एक सिलसिले से जुड़ी हैं. 20 जनवरी 2025 को डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में जॉर्जिया मेलोनी एकमात्र यूरोपीय संघ (EU) नेता थीं, जिन्हें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। दोनों के बीच ‘गोल्डन एज’ के संबंधों की उम्मीद जताई गई।करीबी मित्रता के इस दौर में मेलोनी वाशिंगटन की सबसे करीबी यूरोपीय सहयोगी मानी जाती थीं। फरवरी 2026 में अमेरिका – ईरान युद्ध से संबंधों में दरार की शुरुआत हुई. मेलोनी ने इटली के भीतर जनभावनाओं को देखते हुए अमेरिकी बमवर्षकों को इतालवी सैन्य ठिकानों (Airbases) के इस्तेमाल की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया। मेलोनी ने स्पष्ट किया कि इन ठिकानों का उपयोग केवल पूर्व समझौतों के तहत तकनीकी और तार्किक (Logistical) कार्यों के लिए हो सकता है, न कि युद्ध के हमलों के लिए।
अप्रैल 2026 में ट्रम्प ने ईरान युद्ध को लेकर पोप लियो XIV के रुख की आलोचना करते हुए उन्हें विदेश नीति के लिए “खराब” और “कमजोर” कहा। मेलोनी ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए ट्रम्प के बयानों को “अस्वीकार्य” करार दिया। तिलमिलाए ट्रम्प ने पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें लगा था कि मेलोनी में साहस है, लेकिन वे गलत थे।16 से18 जून 2026 तक फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन में दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई। हालांकि कैमरे के सामने गर्मजोशी दिखी, लेकिन भीतर कड़वाहट बरकरार थी। शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद 19 जून को ट्रम्प ने एक इतालवी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में दावा किया कि मेलोनी ने उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए ‘भीख’ (Begged) मांगी थी और वे लोकप्रिय न होने के कारण दोबारा अमेरिका से दोस्ती की कोशिश कर रही हैं। कुछ घंटों बाद ही मेलोनी ने तुरंत एक वीडियो संदेश जारी कर ट्रम्प के दावों को पूरी तरह मनगढ़ंत और अपमानजनक बताया। उन्होंने कड़े लहजे में कहा—”न तो मैं और न ही इटली किसी से मिन्नतें करता है।” विरोध स्वरूप इटली के विदेश मंत्री ने अपनी अमेरिका यात्रा भी रद्द कर दी। मेलोनी ने ट्रम्प के शब्दों को पूरे इटली का अपमान बताया। इटली में सत्ता पक्ष से लेकर वामपंथी विपक्ष तक, सभी राजनीतिक दल मेलोनी के समर्थन में एकजुट हो गए। इसके अलावा, इटली ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल पर भी संसदीय मुहर की सख्त शर्त लागू कर दी।
ताजा स्थिति ये है कि ट्रम्प द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म – ट्रुथ सोशल (Truth Social) पर जब ट्रंप ने मेलोनी की घटती लोकप्रियता पर तंज कसा, तो मेलोनी का जवाब था: “मेरी लोकप्रियता से आपका कोई लेना-देना नहीं है। मेरी सलाह है कि आप अपनी लोकप्रियता पर ध्यान दें।” उनकी लोकप्रियता ट्रम्प से दोस्ती पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इटली के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने पर निर्भर करती है।
इटली बनाम भारत: कूटनीतिक दृष्टिकोण का बड़ा अंतर
जहाँ इटली ने अमेरिकी दबाव के सामने अपनी संप्रभुता के लिए एक स्पष्ट ‘लक्ष्मण रेखा’ खींची, वहीं भारत का दृष्टिकोण पिछले वर्षों में अलग रहा है. इटली की प्रतिक्रिया या मेलोडी मॉडल की तुलना भारत के जवाब या मोदी मॉडल से करें तो प्रसन्नता से अधिक निराशा ही हाथ लगती है. सबसे पहला मुद्दा है व्यक्तिगत कूटनीति की सीमा का. वैचारिक रूप से ट्रम्प के करीब होने और उनकी किताबों को प्रमोट करने के बावजूद, मेलोनी ने व्यक्तिगत संबंधों को राष्ट्रीय संप्रभुता के आड़े नहीं आने दिया। भारत अक्सर ‘हाउडी मोदी’ या ‘नमस्ते ट्रम्प’ जैसी व्यक्तिगत केमिस्ट्री और इवेंट कूटनीति पर बहुत अधिक भरोसा करता है, जिससे नीतिगत कठोरता कभी-कभी कमजोर हो जाती है। सैन्य स्वायत्तता पर स्टैंड पर देखें तो अमेरिकी सैन्य प्रभुत्व और सुरक्षा छतरी (NATO) के तहत होने के बावजूद, इटली ने अपने बेस से युद्ध मैदान में अमेरिकी भागीदारी को वीटो कर दिया। भारत क्वाड (QUAD) और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी तो बढ़ाता है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों, जैसे CAATSA या रूसी तेल, चाबहार बंदरगाह आदि मुद्दों पर अमेरिकी दबाव में कई बार रक्षात्मक मुद्रा में आ जाता है। सार्वजनिक अपमान का जवाब देने में भी नईदिल्ली का रुख निराश ही करता है. मेलोनी और उनके मंत्रियों ने ट्रम्प के व्यक्तिगत व अपमानजनक बयानों का सोशल मीडिया और प्रेस में तुरंत, आक्रामक और तार्किक खंडन किया। ट्रम्प द्वारा भारत को “टैरिफ किंग” कहने, वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराने या नेतृत्व पर – “उनका पद मैं कभी ले सकता हूँ”, “मैंने टैरिफ की धमकी देकर युद्ध रुकवाया” जैसे अनेकों बार असहज टिप्पणियां करने पर भी भारत ‘रणनीतिक चुप्पी’ (Strategic Silence) बनाए रखता है। भारत में नौसैनिक अभ्यास से लौट रहे जहाज को अमेरिका द्वारा डुबोए जाने भारत चुप रहा और इसी का परिणाम रहा कि जहाजों पर हमले में भारतीयों की जान चली जाने पर भी भारत कडा रुख़ नहीं अपना सका. ईरान और अमेरिका से तेल खरीदने पर दुष्परिणाम की चेतावनी तो सिर्फ ट्रम्प ही नहीं बल्कि उनके मंत्री भी देने लगे .
भारत के लिए कूटनीतिक सबक: संप्रभुता की कोई ‘वैचारिक सेल’ नहीं होती
मेलोनी का यह साहसी रुख भारत के रणनीतिक योजनाकारों को तीन बेहद जरूरी सबक देता है. प्रथमतः, ‘लीडर-टू-लीडर’ केमिस्ट्री की एक सीमा होती है. अंतरराष्ट्रीय संबंध व्यक्तिगत दोस्ती से नहीं, बल्कि स्थाई हितों से चलते हैं। अमेरिका के पहले कार्यकाल और वर्तमान कार्यकाल में ट्रम्प की “अमेरिका फर्स्ट” नीति यह साफ करती है कि वे सहयोगियों को भी कनिष्ठ भागीदार (Junior Partner) से ज्यादा कुछ नहीं समझते। भारत को वैचारिक समानता या नेताओं के आपसी जुड़ाव के भ्रम से बाहर निकलकर विशुद्ध व्यावहारिक नीति अपनानी होगी। दूसरा, रणनीतिक चुप्पी हमेशा ताकत नहीं होती। भारत अक्सर यह मानता है कि वैश्विक नेताओं की टिप्पणियों पर चुप रहना परिपक्वता की निशानी है। लेकिन जब कोई देश आपके नेतृत्व या आपकी संप्रभुता पर कीचड़ उछाले, तो मेलोनी की तरह तुरंत और स्पष्ट रूप से जवाब देना नैरेटिव पर नियंत्रण (Narrative Control) के लिए आवश्यक हो जाता है। चुप्पी को कभी-कभी कमजोरी या सहमति के रूप में पढ़ लिया जाता है। और तीसरा, गठबंधन का मतलब आत्मसमर्पण नहीं होता। इटली नाटो (NATO) का सदस्य है और सुरक्षा के लिए अमेरिका पर काफी हद तक निर्भर है, इसके बावजूद उसने अपने देश की सीमाओं और ठिकानों को अमेरिकी युद्ध के लिए इस्तेमाल होने से रोक दिया। भारत, जो किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का सबसे बड़ा पैरोकार है, उसे अपनी ‘नो-गो लाइन्स’ को लेकर अमेरिका के सामने और अधिक मुखर होना चाहिए।
निष्कर्ष
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) केवल संधियों और व्यापारिक समझौतों तक सीमित नहीं होती; इसका असली परीक्षण तब होता है जब एक संप्रभु राष्ट्र अपने से कहीं अधिक ताकतवर सहयोगी की आंखों में आंखें डालकर सच बोलने का साहस जुटाता है। भारत को यह आत्ममंथन करना होगा कि विश्वबंधुत्व और संयम अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रीय गरिमा की रक्षा के लिए मेलोनी जैसी स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति भी उतनी ही जरूरी है। जॉर्जिया मेलोनी ने वैश्विक मंच पर ‘मजबूत राष्ट्र’ की एक वास्तविक और नई परिभाषा लिखी है। भारत, जो स्वयं को ‘विश्वगुरु’ और एक बड़ी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है, उसे इटली से यह सीखना होगा कि महाशक्तियों के साथ संबंध बराबरी के स्तर पर ही होने चाहिए—जहाँ सम्मान आपसी हो, और संप्रभुता से कोई समझौता न हो।





