इथेनॉल का महाबुलबुला: टैक्सपेयर के पैसे पर खड़ा औद्योगिक ढांचा

The Ethanol Mega-Bubble: An Industrial Structure Built on Taxpayer Money

इथेनॉल के बहाने “लाभ का निजीकरण और जोखिम का सामाजीकरण”

के. पी. मलिक

भारत में इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को सरकार ने ज़ोर-शोर से ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय बढ़ाने, कच्चे तेल के आयात में कमी और पर्यावरण संरक्षण के बहुआयामी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है। पहली नज़र में यह नीति आकर्षक लगती है। लेकिन जब इसके पीछे के निवेश, उत्पादन क्षमता, सरकारी ऋण, ब्लेंडिंग लक्ष्य, कंपनियों की बैलेंस शीट और शेयर बाज़ार की गतिविधियों को एक साथ परखा जाता है, तो एक असहज सवाल खड़ा होता है कि क्या भारत में इथेनॉल नीति ऊर्जा सुरक्षा का कार्यक्रम है, या टैक्सपेयर के पैसों पर खड़ा किया गया एक ऐसा औद्योगिक ढांचा, जिसे अब कृत्रिम माँग पैदा करके बचाया जा रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न उत्पादन क्षमता का है। भारत ने क़रीब 20–21 अरब लीटर वार्षिक इथेनॉल उत्पादन क्षमता तैयार कर ली है, जबकि वर्तमान और निकट भविष्य की वास्तविक घरेलू आवश्यकता सिर्फ़ 10–12 अरब लीटर के आसपास मानी जाती है। यदि यह आकलन सही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि अतिरिक्त क्षमता किस आधार पर बनाई गई? क्या बाज़ार की वास्तविक माँग के आधार पर, या फिर सरकारी प्रोत्साहन, सस्ती वित्तीय सहायता और भविष्य के अत्यधिक आशावादी अनुमानों के आधार पर?

दरअसल, यहाँ कहानी का दूसरा पक्ष शुरू होता है। इथेनॉल संयंत्रों की स्थापना के लिए हजारों करोड़ रुपये के सब्सिडी वाले ऋण, ब्याज सहायता और सरकारी गारंटी उपलब्ध कराई गई। इन योजनाओं का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना था, लेकिन यदि उत्पादन क्षमता माँग से बहुत आगे निकल जाए, तो वही क्षमता उद्योग पर बोझ बन जाती है। तब सरकार के सामने दो ही विकल्प बचते हैं—या तो अतिरिक्त क्षमता को निष्क्रिय रहने दिया जाए, या फिर उसकी खपत सुनिश्चित करने के लिए नए-नए ब्लेंडिंग लक्ष्य तय किए जाएँ। E20 के बाद E22, E27, E30 और यहाँ तक कि E85 जैसे लक्ष्यों की चर्चा इसी संदर्भ में देखी जा सकती है।

सवाल यह नहीं कि उच्च मिश्रण तकनीकी रूप से संभव है या नहीं; सवाल यह है कि क्या इन लक्ष्यों का निर्धारण वैज्ञानिक आवश्यकता से हो रहा है, या पहले से किए गए निवेश को बचाने के लिए?

पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू कंपनियों की बैलेंस शीट है। सामान्य धारणा यह रही कि बड़ी चीनी और इथेनॉल कंपनियाँ इस नीति की सबसे बड़ी लाभार्थी हैं। लेकिन यदि वास्तव में कई प्रमुख कंपनियों के इथेनॉल कारोबार का परिचालन लाभ दबाव में है, तो फिर वास्तविक आर्थिक लाभ कहाँ गया? यदि फैक्ट्री का मुनाफ़ा नहीं बढ़ा, लेकिन कुछ कंपनियों के शेयर तेज़ी से चढ़े, तो इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि बाज़ार भविष्य की सरकारी नीतियों पर दाँव लगा रहा है। ऐसे में मूल्य-सृजन उत्पादन से कम और नीतिगत अपेक्षाओं से अधिक होने लगता है।

यहीं “प्रेफरेंशियल शेयर” और पूँजी जुटाने का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि किसी कंपनी का वास्तविक परिचालन लाभ सीमित हो, लेकिन भविष्य में सरकारी संरक्षण और अनिवार्य माँग की उम्मीद के आधार पर उसका बाज़ार मूल्य बढ़ जाए, तो वह ऊँचे मूल्यांकन पर नई पूँजी जुटा सकती है। इस स्थिति में धन का स्रोत उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि भविष्य की सरकारी नीति में निवेशकों का विश्वास बन जाता है। यह पूँजी बाज़ार का स्वाभाविक व्यवहार हो सकता है, लेकिन जब उसका आधार सरकारी निर्णय हों, तब नीति और बाज़ार के रिश्ते की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

दरअसल, 10 जून को जारी किसी सरकारी अधिसूचना के बाद यदि संबंधित कंपनियों के शेयरों में असामान्य तेजी या अपर सर्किट देखने को मिला हो, तो इसकी स्वतंत्र जाँच और विश्लेषण आवश्यक है। केवल शेयर का बढ़ना अनियमितता का प्रमाण नहीं होता, लेकिन यदि नीति-निर्णय और बाज़ार की गतिविधियों के बीच असामान्य सामंजस्य दिखाई दे, तो नियामक संस्थाओं का दायित्व बनता है कि वे यह सुनिश्चित करें कि किसी भी प्रकार की अंदरूनी जानकारी या अनुचित लाभ का उपयोग न हुआ हो।

इस पूरी नीति का सबसे संवेदनशील पक्ष किसान हैं। सरकार बार-बार कहती है कि इथेनॉल कार्यक्रम किसानों की आय बढ़ाएगा। लेकिन यदि चीनी मिलों पर हजारों करोड़ रुपये का भुगतान बकाया रहे, गन्ना किसानों को समय पर भुगतान न मिले, और दूसरी ओर नई उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ती जाए, तो यह दावा अधूरा प्रतीत होता है। यदि उद्योग की वित्तीय संरचना ही दबाव में हो, तो अंततः उसका सबसे बड़ा भार किसान और करदाता—दोनों उठाते हैं।

करदाता का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस पूरी व्यवस्था में जोखिम का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक धन पर आधारित है। यदि उद्योग सफल होता है, तो निजी निवेशकों को लाभ मिलता है, लेकिन यदि क्षमता अनुपयोगी रह जाए या ऋण फँस जाएँ, तो उसका भार अंततः बैंकिंग व्यवस्था और सरकारी वित्त पर पड़ सकता है। यह वही स्थिति है, जिसे अर्थशास्त्र में “लाभ का निजीकरण और जोखिम का सामाजीकरण” कहा जाता है।

यह भी सच है कि इथेनॉल कार्यक्रम के कई सकारात्मक पक्ष हैं। इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घट सकती है, प्रदूषण में कुछ कमी आ सकती है और कृषि-आधारित उद्योगों को नया बाज़ार मिल सकता है। इसलिए पूरी नीति को खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा। लेकिन किसी भी सार्वजनिक नीति की सफलता केवल उसके घोषित उद्देश्यों से नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक पारदर्शिता, लागत-लाभ विश्लेषण और जवाबदेही से तय होती है।

आज आवश्यकता यह है कि सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि भारत की वास्तविक इथेनॉल आवश्यकता कितनी है, अतिरिक्त क्षमता का आर्थिक औचित्य क्या है, सार्वजनिक धन से दिए गए ऋणों की वर्तमान स्थिति क्या है, किसानों के बकाये कब तक चुकेंगे, और भविष्य के ब्लेंडिंग लक्ष्य स्वतंत्र वैज्ञानिक एवं आर्थिक अध्ययन पर आधारित हैं, या पहले से किए गए निवेश को बचाने की रणनीति हैं।

ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर बनाई गई कोई भी नीति तब तक विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती, जब तक उसके हर आँकड़े, हर निवेश और हर लाभार्थी की पूरी तस्वीर जनता के सामने न रखी जाए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा निवेशक उद्योगपति नहीं, बल्कि वह करदाता है, जिसके पैसे से पूरी व्यवस्था खड़ी होती है। यदि उसी करदाता से वास्तविक लागत, जोखिम और लाभ छिपाए जाएँ, तो यह केवल आर्थिक सवाल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का भी सवाल बन जाता है।

(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं।)