के. पी. मलिक
अगर आज अचानक कोई सरकारी अधिकारी आपसे कहे कि साबित कीजिए, आप भारत के नागरिक हैं, तो शायद आपको एक पल के लिए भी संदेह नहीं होगा। आप आत्मविश्वास के साथ अपना पासपोर्ट, आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या राशन कार्ड सामने रख देंगे। आपको लगेगा कि इनमें से कोई-न-कोई दस्तावेज़ आपकी नागरिकता सिद्ध कर देगा। लेकिन यहीं से भारतीय पहचान व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है।
जिन दस्तावेज़ों के सहारे करोड़ों भारतीय अपनी पूरी ज़िंदगी जीते हैं, बैंक खाते खोलते हैं, संपत्ति खरीदते हैं, चुनाव में वोट डालते हैं, टैक्स भरते हैं, विदेश यात्रा करते हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते हैं, वे सभी अलग-अलग प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए बनाए गए दस्तावेज़ हैं। भारतीय कानून में नागरिकता का प्रश्न अलग है और पहचान का प्रश्न अलग। यही वह बिंदु है, जहाँ आधुनिक भारत की सबसे जटिल पहेली सामने आती है।
हमारे पास पहचान के अनेक प्रमाण हैं, लेकिन नागरिकता का कोई एक सार्वभौमिक प्रमाण-पत्र नहीं है। यह केवल एक कानूनी तकनीकी खामी नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था है, जिसने पहचान को टुकड़ों में बाँट दिया है। आधार आपको निवासी के रूप में पहचानता है, पैन आपको करदाता के रूप में, वोटर आईडी आपको मतदाता के रूप में और पासपोर्ट आपको अंतरराष्ट्रीय यात्रा का अधिकार देता है। लेकिन इनमें से कोई भी दस्तावेज़ हर परिस्थिति में नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना जाता।
यही वह स्थिति है, जिसे अनेक विश्लेषक “आइडेंटिटी ट्रैप” कहते हैं—ऐसी व्यवस्था, जिसमें नागरिक के पास पहचान तो बहुत हैं, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही नागरिक अपनी मूल पहचान सिद्ध करने की चुनौती के सामने खड़ा हो सकता है।
दरअसल, यह व्यवस्था अचानक पैदा नहीं हुई। इसकी जड़ें स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में जाती हैं। 1955 का नागरिकता कानून ऐसे समय में बना था, जब देश विभाजन के घावों से उबर रहा था। उस समय प्राथमिकता नागरिकता के कानूनी नियम तय करने की थी, न कि प्रत्येक नागरिक को एक समान राष्ट्रीय पहचान-पत्र देना।
बाद के दशकों में अलग-अलग सरकारी संस्थानों ने अपनी-अपनी ज़रूरतों के अनुसार पहचान प्रणालियाँ विकसित कर लीं। चुनाव आयोग ने मतदाता पहचान-पत्र बनाया, आयकर विभाग ने पैन जारी किया, परिवहन विभाग ने ड्राइविंग लाइसेंस दिया और फिर डिजिटल युग में आधार सामने आया। हर संस्था ने अपना डेटाबेस तैयार किया, लेकिन किसी ने भी पूरे नागरिक जीवन को समेटने वाली एकीकृत नागरिक पहचान विकसित नहीं की। परिणाम यह हुआ कि भारत पहचान-पत्रों का देश बन गया, लेकिन नागरिकता का प्रश्न अब भी अलग कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा रहा।
आज के डिजिटल युग में यह व्यवस्था केवल प्रशासनिक नहीं रही, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक भी बन गई। आज आपकी पहचान केवल सरकारी रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। बैंक, मोबाइल कंपनियाँ, बीमा संस्थान, अस्पताल, ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म और सरकारी सेवाएँ—सभी आपकी डिजिटल पहचान का हिस्सा बनाते हैं। डेटा नई अर्थव्यवस्था का ईंधन बन चुका है। सुविधा और पारदर्शिता के साथ-साथ यह प्रश्न भी उठता है कि नागरिक की पहचान पर नियंत्रण किसका है, उसका डेटा किसके पास है, उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है और उसकी सुरक्षा की जवाबदेही किसकी है। यही वह बिंदु है, जहाँ पहचान अधिकार का विषय होने के साथ-साथ बाज़ार और शासन—दोनों का संसाधन भी बन जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) जैसी बहसें और अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। समर्थकों का कहना है कि हर संप्रभु राष्ट्र को अपने नागरिकों और अवैध प्रवासियों के बीच स्पष्ट अंतर करने का अधिकार है। दूसरी ओर, आलोचक यह आशंका व्यक्त करते हैं कि यदि किसी नागरिक पर अपनी नागरिकता सिद्ध करने का दायित्व आ जाए और उसके पास अपेक्षित दस्तावेज़ न हों, तो सबसे अधिक कठिनाई गरीबों, विस्थापितों, ग्रामीणों, आदिवासियों और उन लोगों को होगी, जिनके दस्तावेज़ कभी बने ही नहीं या समय के साथ नष्ट हो गए। इसलिए यह बहस केवल कानून की नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की भी है।
इन परिस्थितियों में यह दावा करना कि पूरी व्यवस्था किसी एक गुप्त साज़िश का परिणाम है, उपलब्ध सार्वजनिक साक्ष्यों के आधार पर उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह प्रश्न अवश्य पूछा जा सकता है कि क्या दशकों में विकसित यह खंडित पहचान व्यवस्था नागरिकों के लिए पर्याप्त स्पष्ट और सुरक्षित है? क्या एक लोकतंत्र में नागरिक को जीवन भर अलग-अलग पहचान-पत्र सँभालने के बाद भी अपनी नागरिकता को लेकर असमंजस में रहना चाहिए? क्या राज्य की ज़िम्मेदारी नागरिक को बार-बार अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए बाध्य करना है, या ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें नागरिक के अधिकार स्पष्ट, सुरक्षित और निर्विवाद हों?
लोकतंत्र की असली परीक्षा पहचान-पत्रों की संख्या से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि नागरिक और राज्य के बीच विश्वास कितना मज़बूत है। यदि नागरिक के पास अनेक पहचान-पत्र हों, फिर भी वह इस आशंका में जीए कि किसी दिन उससे उसकी नागरिकता का प्रमाण माँगा जा सकता है और उसके पास मौजूद दस्तावेज़ पर्याप्त नहीं माने जाएँगे, तो यह केवल कानूनी प्रश्न नहीं रह जाता। यह लोकतंत्र, प्रशासन और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न बन जाता है।
आख़िरकार, सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि हमारे पास कौन-सा पहचान-पत्र है। असली सवाल यह है कि क्या भारतीय नागरिक की पहचान उसके अधिकारों की गारंटी है, या वह केवल एक ऐसी प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बन गई है, जिसमें नागरिक को समय-समय पर स्वयं को सिद्ध करते रहना पड़ता है? यही प्रश्न आने वाले समय में भारत के लोकतंत्र, नागरिकता और डिजिटल शासन की दिशा तय करेगा।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं।)





