भारत-जापान की नई रणनीतिक साझेदारी से बदलेंगे एशिया के शक्ति समीकरण

The new strategic partnership between India and Japan will alter Asia's power equations

अजय कुमार

नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में गुरुवार को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची को अपनी ‘छोटी बहन’ कहकर संबोधित किया, तब यह केवल शिष्टाचार का एक वाक्य नहीं था। कूटनीति की दुनिया में शब्द अक्सर दस्तावेजों से ज्यादा गहरे संदेश देते हैं। इस संबोधन के पीछे वह भरोसा छिपा था, जिसे भारत और जापान ने पिछले ढाई दशकों में धीरे-धीरे तैयार किया है। लेकिन इस मुलाकात की असली अहमियत भावनात्मक रिश्ते से कहीं आगे है। यह उस दौर में हुई है, जब एशिया की राजनीति नए मोड़ पर खड़ी है, चीन का बढ़ता दबदबा पड़ोसी देशों की चिंता बढ़ा रहा है, वैश्विक सप्लाई चेन नए ठिकाने तलाश रही है और तकनीक भविष्य की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। ऐसे समय में भारत और जापान ने दुनिया को यह संकेत दिया है कि दोनों देशों की साझेदारी अब केवल निवेश और व्यापार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और सामरिक सुरक्षा की नई धुरी बनने जा रही है।

भारत और जापान के रिश्तों की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि इनमें कभी उतार-चढ़ाव की राजनीति नहीं दिखी। 1952 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद दोनों देशों के बीच विश्वास लगातार बढ़ता गया। 2000 में रिश्तों को नई दिशा मिली, 2006 में उन्हें ‘स्ट्रैटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ का दर्जा मिला और 2014 में इन्हें ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ में बदल दिया गया। यह वही दौर था, जब जापान ने भारत को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि एशिया में सबसे भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखना शुरू किया। दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल, मेट्रो परियोजनाएं और औद्योगिक टाउनशिप जैसे दर्जनों बड़े प्रोजेक्ट इसी सोच का परिणाम हैं। जापान ने पिछले दो दशकों में भारत में अरबों डॉलर का निवेश किया और आज करीब 1,400 जापानी कंपनियां भारतीय बाजार में सक्रिय हैं।

लेकिन इस बार का शिखर सम्मेलन इसलिए अलग था क्योंकि पहली बार दोनों देशों ने रक्षा सह-विकास समझौते पर हस्ताक्षर किए। अब तक भारत और जापान संयुक्त नौसैनिक अभ्यास, रक्षा संवाद और समुद्री सुरक्षा तक सहयोग कर रहे थे, लेकिन रक्षा तकनीक के संयुक्त विकास की दिशा में यह पहला कदम है। इसका मतलब केवल हथियार बनाना नहीं है। इसका अर्थ है कि आने वाले वर्षों में दोनों देश ऐसी तकनीकों पर साथ काम करेंगे, जो समुद्री निगरानी, सुरक्षित संचार, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रक्षा प्रणाली और भविष्य की युद्ध तकनीकों की दिशा तय करेंगी। रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत-जापान संबंधों का सबसे बड़ा रणनीतिक मोड़ मान रहे हैं, क्योंकि जापान लंबे समय तक रक्षा निर्यात और सैन्य तकनीक साझा करने में बेहद सतर्क रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके पीछे चीन की बढ़ती आक्रामकता सबसे बड़ा कारण है। पिछले एक दशक में दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों का निर्माण, ताइवान के आसपास लगातार सैन्य अभ्यास, पूर्वी चीन सागर में सेनकाकू द्वीपों को लेकर जापान के साथ तनाव और हिंद महासागर में चीनी नौसेना की बढ़ती मौजूदगी ने पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था बदल दी है। दूसरी ओर, भारत भी पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ लंबे सैन्य गतिरोध का सामना कर चुका है। ऐसे में नई दिल्ली और टोक्यो की रणनीतिक सोच पहले से कहीं ज्यादा समान दिखाई देती है। दोनों देश मानते हैं कि समुद्री रास्तों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान और नियम-आधारित व्यवस्था ही एशिया में स्थिरता बनाए रख सकती है। यही वजह है कि क्वाड के भीतर भी भारत और जापान सबसे सक्रिय साझेदारों में गिने जाते हैं।

रक्षा सहयोग के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा इस शिखर सम्मेलन का दूसरा सबसे बड़ा विषय रही। कोविड महामारी और उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को यह सिखाया कि केवल सस्ती सप्लाई चेन पर्याप्त नहीं होती, बल्कि भरोसेमंद साझेदार भी जरूरी होते हैं। लंबे समय तक दुनिया का अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन चीन पर निर्भर रहा, लेकिन अब अमेरिका, जापान, भारत और यूरोप वैकल्पिक सप्लाई नेटवर्क तैयार करने में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत भारत और जापान ने सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी और उन्नत विनिर्माण में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। आज दुनिया की डिजिटल अर्थव्यवस्था चिप्स पर टिकी है और जापान इस क्षेत्र में कच्चे माल, मशीनरी तथा तकनीक का बड़ा केंद्र है, जबकि भारत तेजी से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का नया हब बन रहा है। दोनों देशों की साझेदारी भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा में निर्णायक साबित हो सकती है। प्रधानमंत्री मोदी ने शिखर सम्मेलन के दौरान बताया कि पिछले एक वर्ष में दोनों देशों के बीच लगभग 120 नए कारोबारी समझौते हुए हैं। अब लक्ष्य अगले दस वर्षों में भारत में 10 ट्रिलियन येन का जापानी निवेश आकर्षित करना है। भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत करीब छह लाख करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। यह निवेश केवल कारखाने लगाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, ऑटोमोबाइल, बैटरी तकनीक और हाई-टेक उद्योगों में भी लगाया जाएगा। वर्ष 2025-26 में भारत-जापान द्विपक्षीय व्यापार लगभग 27 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है, लेकिन दोनों सरकारें मानती हैं कि यह क्षमता के मुकाबले अभी भी काफी कम है। इसलिए अब निवेश और व्यापार दोनों को अगले स्तर पर ले जाने की तैयारी की जा रही है।

शिखर सम्मेलन में हरित ऊर्जा को भी नई प्राथमिकता मिली। ‘गोवर्धन’ पहल के तहत भारत-जापान बायोगैस मिशन शुरू किया गया है, जिसके जरिए आधुनिक बायोगैस संयंत्रों का नेटवर्क तैयार किया जाएगा। इसका मकसद केवल स्वच्छ ऊर्जा पैदा करना नहीं है, बल्कि कृषि अवशेषों का बेहतर उपयोग, किसानों की अतिरिक्त आय, जैविक उर्वरकों का उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना भी है। जापान की पर्यावरणीय तकनीक और भारत की विशाल कृषि अर्थव्यवस्था का यह मेल आने वाले वर्षों में ग्रामीण विकास का नया मॉडल बन सकता है। तकनीक के क्षेत्र में भी दोनों देशों की सोच तेजी से बदल रही है। अब सहयोग केवल हार्डवेयर या मशीनों तक सीमित नहीं रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, 6जी संचार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में भी संयुक्त अनुसंधान का रास्ता खोला गया है। जापान के पास उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग और सटीक विनिर्माण की क्षमता है, जबकि भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल प्रतिभा और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञता है। यदि दोनों की ताकतें एक मंच पर आती हैं, तो एशिया में तकनीकी नेतृत्व का नया केंद्र उभर सकता है।

2027 में भारत और जापान अपने राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे करेंगे। लेकिन उससे पहले ही दोनों देशों ने साफ कर दिया है कि आने वाला दशक केवल दोस्ती का नहीं, बल्कि साझा नेतृत्व का दशक होगा। बदलती वैश्विक राजनीति में, जहां कई पुराने गठबंधन कमजोर पड़ रहे हैं, वहीं भारत और जापान का रिश्ता लगातार मजबूत हो रहा है। यही वजह है कि नई दिल्ली में बोला गया ‘छोटी बहन’ का एक वाक्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि उस रणनीतिक विश्वास का प्रतीक बन गया, जिसके सहारे दोनों देश एशिया की नई शक्ति संरचना को आकार देने की तैयारी कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में यह साझेदारी केवल भारत और जापान की नहीं, बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की दिशा तय करने वाली सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में गिनी जा सकती है।