खेत की लड़ाई खरपतवार से नहीं, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीच है?
के. पी. मलिक
यदि कोई पूछे कि पिछले पचास वर्षों में दुनिया की कृषि को सबसे अधिक किस तकनीक ने बदला, तो उत्तर केवल ट्रैक्टर, रासायनिक उर्वरक या सिंचाई नहीं होगा। उस सूची में एक नाम और शामिल होगा—ग्लाइफोसेट (Glyphosate)। पहली नज़र में यह केवल एक खरपतवारनाशी है, लेकिन गहराई से देखें तो यह वैश्विक कृषि व्यवस्था, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आर्थिक शक्ति, बौद्धिक संपदा अधिकार, बीज बाज़ार, किसानों की स्वायत्तता और खाद्य सुरक्षा के बीच चल रहे संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। इसलिए ग्लाइफोसेट पर बहस केवल विज्ञान की नहीं है; यह राजनीति, अर्थशास्त्र और लोकतंत्र की भी बहस है।
बाज़ार की प्रयोगशाला बन गई खेती
1974 में Monsanto ने “Roundup” के नाम से ग्लाइफोसेट लॉन्च किया। शुरुआत में इसे एक प्रभावी खरपतवारनाशी के रूप में पेश किया गया, जिसने किसानों की लागत घटाई और उत्पादन बढ़ाने में मदद की। लेकिन वास्तविक व्यावसायिक क्रांति तब आई, जब कंपनी ने Roundup Ready आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) बीज विकसित किए। अब किसान वही बीज खरीदता, उसी कंपनी का खरपतवारनाशी खरीदता और हर सीजन उसी आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर रहता। यहीं से खेती केवल खाद्यान्न उत्पादन नहीं रही, बल्कि कॉर्पोरेट लाइसेंस-आधारित कृषि मॉडल में बदलने लगी। बीज, रसायन और तकनीक—तीनों पर कुछ वैश्विक कंपनियों का नियंत्रण बढ़ने लगा।
किसान ग्राहक बना, साझेदार नहीं
परंपरागत कृषि में किसान अपने बीज बचाता था, स्थानीय ज्ञान का उपयोग करता था और बाज़ार पर उसकी निर्भरता सीमित थी। लेकिन पेटेंट-आधारित कृषि व्यवस्था ने किसान को हर मौसम में नया बीज, नया रसायन और नई तकनीक खरीदने के लिए प्रेरित किया और कई मामलों में विवश भी किया। इस मॉडल में सबसे अधिक लाभ किसे मिला? किसानों को सीमित लागत लाभ मिला, लेकिन अरबों डॉलर का मुनाफा बीज और रसायन उद्योग को हुआ। आज वैश्विक कृषि इनपुट बाज़ार का बड़ा हिस्सा कुछ गिनी-चुनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सिमट चुका है। यह केवल आर्थिक संकेंद्रण नहीं, बल्कि खाद्य व्यवस्था पर बढ़ता कॉर्पोरेट प्रभाव भी है।
विज्ञान बनाम कॉर्पोरेट विज्ञान
ग्लाइफोसेट पर सबसे बड़ा विवाद केवल इसके स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर नहीं, बल्कि इस प्रश्न पर भी है कि विज्ञान का निर्माण कौन कर रहा है?
2015 में WHO की International Agency for Research on Cancer (IARC) ने ग्लाइफोसेट को “Probably Carcinogenic” बताया। दूसरी ओर, अमेरिका की EPA और यूरोप की कुछ नियामक संस्थाओं ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सामान्य उपयोग में इसे अपेक्षाकृत सुरक्षित माना। यहीं से सवाल उठा कि क्या नियामक संस्थाएँ पूरी तरह स्वतंत्र हैं, या वे उद्योग द्वारा उपलब्ध कराए गए अध्ययनों पर अत्यधिक निर्भर रहती हैं?
दूसरी ओर, केवल किसी एक संस्था की राय को अंतिम सत्य मान लेना भी वैज्ञानिक पद्धति के अनुरूप नहीं होगा। विज्ञान निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है और ऐसे जटिल विषयों पर अलग-अलग संस्थाएँ उपलब्ध साक्ष्यों का अलग मूल्यांकन कर सकती हैं। इसलिए नीति का आधार स्वतंत्र, पारदर्शी और सार्वजनिक हित में होने वाला शोध होना चाहिए।
मुकदमे केवल मुआवज़े के नहीं, विश्वास के भी थे
जब Bayer ने Monsanto का अधिग्रहण किया, तब शायद उसने अनुमान नहीं लगाया था कि उसे हजारों मुकदमों का सामना करना पड़ेगा।
अमेरिका में अनेक वादियों ने दावा किया कि लंबे समय तक Roundup के उपयोग से उन्हें Non-Hodgkin Lymphoma हुआ। कई मामलों में अदालतों ने वादियों के पक्ष में निर्णय दिए या समझौते हुए, जबकि कंपनी ने अपने उत्पाद की सुरक्षा पर अपना रुख कायम रखा। इन मुकदमों ने एक व्यापक प्रश्न खड़ा किया कि यदि किसी उत्पाद की सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक गंभीर विवाद बना रहे, तो जोखिम का बोझ कौन उठाएगा—कंपनी, सरकार या किसान?
सुपर वीड्स : बाज़ार का नया अवसर?
ग्लाइफोसेट के लगातार उपयोग से अनेक खरपतवारों में प्रतिरोध विकसित हो गया। इन्हें “Super Weeds” कहा जाने लगा। यह केवल कृषि संकट नहीं था; यह व्यावसायिक अवसर भी बन गया। नई दवाएँ, नए रसायन, नए बीज और नए पेटेंट—यानी एक समस्या से दूसरी समस्या और फिर उसके समाधान का नया बाज़ार।
यहीं राजनीतिक अर्थशास्त्र का मूल प्रश्न उठता है कि क्या कृषि अनुसंधान का उद्देश्य समस्याओं का स्थायी समाधान है, या लगातार नए बाज़ार बनाना? इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर नहीं है, लेकिन इसे पूछना आवश्यक है।
भारत की चुनौती
भारत की कृषि छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है। यहाँ खेत छोटे हैं, संसाधन सीमित हैं और श्रम की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में ग्लाइफोसेट किसानों के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बनता है। लेकिन भारत जैव-विविधता से समृद्ध देश भी है। यदि किसी रसायन का अंधाधुंध उपयोग मिट्टी, जल, जैव-विविधता या मानव स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव डालता है, तो उसकी सामाजिक लागत भी बहुत बड़ी हो सकती है।
इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने 2022 में इसके उपयोग पर प्रतिबंध नहीं, बल्कि नियंत्रण-आधारित व्यवस्था अपनाई।
नीति का असली प्रश्न
बहरहाल, असल बहस यह नहीं है कि ग्लाइफोसेट पूरी तरह अच्छा है या पूरी तरह बुरा। सवाल यह है कि क्या कृषि नीति किसानों की दीर्घकालिक स्वायत्तता, पर्यावरणीय स्थिरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती है, या वह ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रही है, जिसमें बीज, रसायन और तकनीक पर कुछ बड़ी कंपनियों का प्रभाव लगातार बढ़ता जाए?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह प्रश्न केवल कृषि मंत्रालय का नहीं, बल्कि संसद, वैज्ञानिक संस्थानों, नियामकों और नागरिक समाज का भी होना चाहिए।
ग्लाइफोसेट का विवाद हमें यह याद दिलाता है कि आधुनिक कृषि केवल खेतों में नहीं, बल्कि प्रयोगशालाओं, अदालतों, कॉर्पोरेट बोर्डरूमों और नीति-निर्माण के गलियारों में भी तय होती है। किसानों को उत्पादकता चाहिए, उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन चाहिए, कंपनियों को लाभ चाहिए और सरकारों को खाद्य सुरक्षा। इन चारों उद्देश्यों के बीच संतुलन ही किसी भी स्वस्थ कृषि नीति की कसौटी है।
इसलिए ग्लाइफोसेट पर अंतिम निर्णय केवल एक रसायन के पक्ष या विपक्ष का नहीं होना चाहिए। यह निर्णय इस बात का भी होगा कि भविष्य की कृषि का नियंत्रण किसके हाथ में होगा—किसानों के, सार्वजनिक संस्थानों के या वैश्विक कॉर्पोरेट पूंजी के?
लोकतंत्र में इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि पारदर्शी विज्ञान, जवाबदेह नियमन और सार्वजनिक हित को सर्वोच्च मानने वाली नीति से ही दिया जा सकता है।
यह संस्करण राजनीतिक-आर्थिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, लेकिन तथ्यों और निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखता है।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं।)





