चीन का नया कानून दुनिया में बहस का बड़ा मुद्दा

China's new law sparks major global debate

अजय कुमार

भारत में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर बहस अभी जारी है, लेकिन इसी दौरान चीन ने ऐसा कानून लागू कर दिया है, जिसने पूरी दुनिया में नई चर्चा छेड़ दी है। पहली नजर में इसे देखकर लगता है कि यह भी किसी तरह का ‘यूनिफॉर्म कानून’ है, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा गहरी है। 1 जुलाई 2026 से लागू हुआ ‘एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ’ केवल कानून नहीं बल्कि चीन की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह देश में मौजूद अलग-अलग जातीय पहचानों को एक साझा चीनी राष्ट्रीय पहचान में ढालना चाहता है। यही वजह है कि जहां बीजिंग इसे राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा कदम बता रहा है, वहीं संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल और कई मानवाधिकार संगठन इसे अल्पसंख्यकों की पहचान मिटाने की कानूनी शुरुआत मान रहे हैं।करीब 1.41 अरब आबादी वाले चीन में सरकार आधिकारिक तौर पर 56 जातीय समूहों को मान्यता देती है। इनमें लगभग 91 प्रतिशत आबादी हान समुदाय की है, जबकि बाकी 55 समुदायों में उइगर, तिब्बती, मंगोल, हुई, झुआंग, मियाओ और कई अन्य समूह शामिल हैं। इन समुदायों की अपनी भाषाएं, संस्कृति, धार्मिक परंपराएं और सामाजिक पहचान है। चीन का संविधान इन्हें अधिकार देता है, लेकिन पिछले एक दशक में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सरकार ने ‘झोंगहुआ मिन्जू’ यानी एकीकृत चीनी राष्ट्र की अवधारणा को सबसे ऊपर रखा है। अब उसी सोच को पहली बार एक व्यापक राष्ट्रीय कानून का रूप दे दिया गया है।

दरअसल यह कहानी आज से नहीं बल्कि कई दशक पहले शुरू हुई थी। 1984 में चीन ने रीजनल एथनिक ऑटोनॉमी लॉ बनाया था, जिसके तहत अल्पसंख्यक क्षेत्रों को अपनी भाषा और संस्कृति बचाने के कुछ अधिकार मिले थे। लेकिन 2014 के बाद स्थिति बदलनी शुरू हुई। शी जिनपिंग ने राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और अलगाववाद को सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए नई नीति अपनाई। शिनजियांग में निगरानी व्यवस्था बढ़ाई गई, तिब्बत में शिक्षा व्यवस्था बदली गई, इनर मंगोलिया में स्थानीय भाषा की जगह मंदारिन को बढ़ावा दिया गया। उस समय इन फैसलों का विरोध हुआ, लेकिन सरकार पीछे नहीं हटी। अब वही सारी नीतियां एक नए कानून के जरिए स्थायी ढांचे में बदल गई हैं।इस कानून का सबसे बड़ा आधार भाषा है। चीन चाहता है कि पूरे देश में एक साझा भाषा के रूप में मंदारिन ही प्रमुख रहे। प्री-स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक शिक्षा का मुख्य माध्यम मंदारिन होगा। सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक संस्थानों और आधिकारिक संचार में भी इसी भाषा को प्राथमिकता दी जाएगी। सरकार का तर्क है कि साझा भाषा आर्थिक अवसर बढ़ाती है, रोजगार आसान बनाती है और राष्ट्रीय एकता मजबूत करती है। लेकिन विरोध करने वालों का कहना है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि पहचान का सबसे बड़ा आधार होती है। यदि किसी समुदाय की मातृभाषा धीरे-धीरे स्कूलों और सरकारी व्यवस्था से बाहर हो जाएगी तो आने वाली पीढ़ियों में उसकी सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर पड़ जाएगी।

यही वजह है कि सबसे ज्यादा चिंता उइगर, तिब्बती और मंगोल समुदायों को लेकर जताई जा रही है। शिनजियांग में करीब 1.2 करोड़ उइगर मुसलमान, तिब्बत में लाखों तिब्बती बौद्ध और इनर मंगोलिया में बड़ी संख्या में मंगोल समुदाय रहता है। पिछले कुछ वर्षों से इन इलाकों में स्थानीय भाषाओं की जगह मंदारिन को बढ़ावा देने की नीति लागू की जा रही थी। अब नया कानून इस पूरी प्रक्रिया को कानूनी सुरक्षा देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे आने वाले वर्षों में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग केवल घरों तक सीमित रह सकता है।कानून केवल भाषा तक सीमित नहीं है। इसमें स्कूलों, परिवारों, मीडिया, सामाजिक संगठनों और सरकारी संस्थाओं को ‘चीनी राष्ट्रीय पहचान’ मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है। पाठ्यक्रमों में राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और शी जिनपिंग की विचारधारा को बढ़ावा देने की बात कही गई है। अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने की बात भी सामने आई है ताकि अलग-अलग समुदायों के बीच सामाजिक दूरी कम हो। चीन इसे सामाजिक समरसता बता रहा है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह विविधता को खत्म कर एक जैसी पहचान बनाने की कोशिश है।

सबसे ज्यादा विवाद आर्टिकल-63 को लेकर है। यह प्रावधान कहता है कि यदि कोई चीनी नागरिक विदेश में रहकर भी चीन की जातीय एकता के खिलाफ गतिविधि करता है या अलगाववाद को बढ़ावा देता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यानी कानून का प्रभाव केवल चीन की सीमा तक सीमित नहीं रहेगा। यही कारण है कि अमेरिका, यूरोप और कई मानवाधिकार संगठनों ने इस प्रावधान पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विदेशों में रहने वाले उइगर, तिब्बती और अन्य कार्यकर्ताओं को भी इस कानून के जरिए निशाना बनाया जा सकता है।संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख ने भी इस कानून पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि भाषा, धर्म, संस्कृति और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति पर अतिरिक्त नियंत्रण लगाया गया तो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का उल्लंघन हो सकता है। दूसरी ओर चीन इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करता है। बीजिंग का कहना है कि यह कानून केवल आतंकवाद, चरमपंथ और अलगाववाद के खिलाफ है तथा इसका उद्देश्य सभी जातीय समूहों को समान अवसर देना है। चीन लगातार दावा करता रहा है कि शिनजियांग और तिब्बत में उसकी नीतियों से गरीबी कम हुई है, शिक्षा बढ़ी है और आर्थिक विकास तेज हुआ है।

असल सवाल यह है कि क्या यह कानून वास्तव में राष्ट्रीय एकता लाएगा या सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करेगा। इतिहास बताता है कि किसी भी देश में साझा राष्ट्रीय पहचान बनाना आसान नहीं होता। भाषा, संस्कृति और परंपरा लोगों की भावनाओं से जुड़ी होती हैं। जब सरकारें इन्हें बदलने की कोशिश करती हैं तो अक्सर राजनीतिक और सामाजिक तनाव पैदा होता है। चीन का कहना है कि उसकी प्राथमिकता स्थिरता और विकास है, जबकि आलोचकों का मानना है कि स्थिरता के नाम पर सांस्कृतिक विविधता को सीमित किया जा रहा है।भारत में चल रही यूनिफॉर्म सिविल कोड की बहस और चीन के इस कानून की तुलना भी इसी वजह से चर्चा में है। लेकिन दोनों की प्रकृति पूरी तरह अलग है। भारत में यूसीसी का संबंध विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे सिविल कानूनों से है। इसके विपरीत चीन का नया कानून भाषा, शिक्षा, संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा हुआ है। इसलिए दोनों को एक जैसा कानून कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

फिलहाल इतना तय है कि चीन ने केवल नया कानून लागू नहीं किया, बल्कि अपनी राष्ट्रीय नीति को नया कानूनी आधार दे दिया है। आने वाले वर्षों में इस कानून का असर केवल चीन तक सीमित नहीं रहेगा। विदेशों में रहने वाले चीनी मूल के लोगों, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं और दुनिया की बड़ी लोकतांत्रिक सरकारों की नजर भी इसके हर कदम पर रहेगी। यदि यह कानून सांस्कृतिक विविधता और राजनीतिक असहमति के दायरे तक पहुंचा तो चीन और पश्चिमी देशों के बीच टकराव और बढ़ सकता है। लेकिन अगर बीजिंग इसे केवल आतंकवाद और अलगाववाद तक सीमित रखने में सफल रहा तो वह इसे अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में शामिल करेगा। फिलहाल दुनिया इसी सवाल का जवाब तलाश रही है कि यह कानून राष्ट्रीय एकता का नया मॉडल बनेगा या सांस्कृतिक पहचान पर सबसे बड़ा कानूनी नियंत्रण साबित होगा।