महेन्द्र तिवारी
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां नागरिकों को अपनी बात रखने, सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाने और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर संवाद, असहमति, भागीदारी और जवाबदेही की व्यवस्था है। जब नागरिक अपनी समस्याओं को लेकर संगठित होते हैं और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें रखते हैं, तब शासन व्यवस्था को समाज की वास्तविक जरूरतों का पता चलता है। यही कारण है कि आंदोलन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक और आवश्यक अंग माने जाते हैं। हालांकि, यह भी उतना ही सत्य है कि आंदोलन तभी लोकतांत्रिक शक्ति बनते हैं जब वे संविधान, कानून और सामाजिक मर्यादाओं के भीतर संचालित हों।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार नागरिकों को प्राप्त है। इन अधिकारों ने भारतीय लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर भूमि सुधार, पर्यावरण संरक्षण, सूचना के अधिकार, भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों और महिला अधिकारों तक अनेक आंदोलनों ने देश की नीतियों और कानूनों को प्रभावित किया है। इन आंदोलनों की सफलता का आधार उनकी नैतिक शक्ति, स्पष्ट उद्देश्य और व्यापक जनसमर्थन रहा।
महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के माध्यम से दुनिया को यह संदेश दिया कि अहिंसा और सत्य किसी भी लोकतांत्रिक संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत हो सकते हैं। उनका मानना था कि यदि उद्देश्य न्यायपूर्ण हो और संघर्ष शांतिपूर्ण हो तो अंततः समाज और शासन दोनों को संवाद के लिए आगे आना पड़ता है। यही सिद्धांत आज भी लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए प्रासंगिक है। हिंसा से क्षणिक दबाव तो बनाया जा सकता है, लेकिन स्थायी समाधान संवाद और विश्वास से ही निकलता है।
हाल के वर्षों में भारत में विभिन्न मुद्दों को लेकर अनेक आंदोलन हुए हैं। किसानों, छात्रों, कर्मचारियों, महिलाओं, पर्यावरण संरक्षण समूहों और सामाजिक संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर समय समय पर प्रदर्शन किए हैं। हाल में दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शनों ने शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और शासन की जवाबदेही जैसे विषयों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव, बल प्रयोग तथा विभिन्न दावों और प्रतिदावों को लेकर व्यापक चर्चा हुई। साथ ही सोशल मीडिया पर अनेक वीडियो और सूचनाएं तेजी से प्रसारित हुईं, जिनमें से कुछ दावों पर बाद में विवाद भी सामने आए।
लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन का उद्देश्य सरकार और समाज का ध्यान किसी वास्तविक समस्या की ओर आकर्षित करना होना चाहिए। यदि आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटककर हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान, घृणा फैलाने वाली भाषा या कानून हाथ में लेने का माध्यम बन जाए तो उसकी नैतिक वैधता कमजोर पड़ जाती है। किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसका नैतिक आधार होता है। जब यह आधार कमजोर होता है तो वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और पूरा विमर्श केवल कानून व्यवस्था तक सीमित हो जाता है।
यह भी समझना आवश्यक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्णतः असीमित अधिकार नहीं है। संविधान सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, शिष्टाचार और अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए युक्तिसंगत प्रतिबंधों की अनुमति देता है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति या समूह किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा फैलाने, हिंसा के लिए उकसाने या सामाजिक वैमनस्य बढ़ाने का प्रयास करता है तो वह केवल विचार व्यक्त नहीं कर रहा होता, बल्कि कानून के दायरे में आने वाला कृत्य कर रहा होता है। लोकतंत्र में असहमति स्वीकार्य है, लेकिन हिंसा और घृणा का समर्थन नहीं।
सार्वजनिक संपत्ति का महत्व भी इसी संदर्भ में समझना चाहिए। सड़कें, बसें, रेलवे, सरकारी विद्यालय, अस्पताल, पुल और अन्य सार्वजनिक संस्थान किसी सरकार या राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं होते। इनका निर्माण जनता के करों से होता है। इसलिए विरोध प्रदर्शन के दौरान यदि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो उसका वास्तविक नुकसान देश के नागरिकों को ही उठाना पड़ता है। मरम्मत और पुनर्निर्माण का खर्च भी अंततः करदाताओं के धन से पूरा होता है। इसलिए लोकतांत्रिक आंदोलन का पहला दायित्व सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा होना चाहिए।
पुलिस और सुरक्षा बलों की भूमिका भी लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका दायित्व कानून व्यवस्था बनाए रखना, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और न्यायालयों तथा संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर कार्य करना है। यदि प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर हमला होता है, पथराव किया जाता है या सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई जाती है तो वह भी कानून के विरुद्ध है। दूसरी ओर पुलिस की कार्रवाई भी आवश्यक, अनुपातिक और विधिसम्मत होनी चाहिए। लोकतंत्र में न तो भीड़ को हिंसा का अधिकार है और न ही राज्य को अनावश्यक बल प्रयोग का। यही संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखता है।
लोकतंत्र में जवाबदेही केवल सरकार की नहीं होती, बल्कि नागरिकों और आंदोलनों की भी होती है। यदि किसी आंदोलन में कुछ लोग हिंसक गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं तो उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। पूरे आंदोलन या पूरे समाज को एक ही दृष्टि से देखना न्यायसंगत नहीं होगा। इसी प्रकार यदि किसी सरकारी एजेंसी से भी कानून या मानवाधिकारों के विरुद्ध कोई कार्रवाई होती है तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही भी आवश्यक है। यही कानून के शासन की मूल भावना है।
भारतीय संविधान केवल अधिकारों की बात नहीं करता, बल्कि नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख करता है। अनुच्छेद 51ए प्रत्येक नागरिक से अपेक्षा करता है कि वह संविधान का सम्मान करे, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे और हिंसा से दूर रहे। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करना है। यदि नागरिक केवल अधिकारों की मांग करें और कर्तव्यों की उपेक्षा करें तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। दूसरी ओर यदि राज्य केवल कानून व्यवस्था के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं की अनदेखी करे तो लोकतंत्र की आत्मा प्रभावित होगी।
हालिया छात्र आंदोलनों ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर प्रश्नों को भी सामने रखा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सीमित सरकारी सीटें, निजी शिक्षा की ऊंची लागत और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता को लेकर युवाओं में चिंता बढ़ी है। अनेक छात्रों ने यह महसूस किया कि कठिन परिश्रम के बावजूद गुणवत्तापूर्ण संस्थानों में प्रवेश के अवसर सीमित हैं और इससे उनके भविष्य को लेकर असुरक्षा पैदा होती है। हाल के प्रदर्शनों में भी छात्रों ने परीक्षा प्रणाली और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
वास्तविक समस्या केवल किसी एक वर्ग या नीति तक सीमित नहीं है। भारत जैसे विशाल देश में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या अभी भी मांग की तुलना में कम है। चिकित्सा, इंजीनियरिंग, अनुसंधान और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में सीटों की सीमित उपलब्धता के कारण लाखों छात्र अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करते हैं। शिक्षा का बढ़ता निजीकरण भी मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। यदि अवसरों का विस्तार नहीं होगा तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
इस स्थिति का समाधान केवल विरोध प्रदर्शन या राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप से संभव नहीं है। देश में गुणवत्तापूर्ण सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या बढ़ानी होगी। परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और जवाबदेह बनाना होगा। पेपर लीक, मूल्यांकन विवाद और प्रशासनिक अनियमितताओं पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। साथ ही प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किए बिना केवल उच्च शिक्षा में सुधार पर्याप्त नहीं होगा। अवसर की समानता का आधार विद्यालय स्तर पर ही तैयार होता है।
सामाजिक न्याय की नीतियों पर भी समय समय पर तथ्यों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर विचार होना चाहिए। ऐसी समीक्षा का उद्देश्य किसी वर्ग के अधिकारों को कमजोर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि योजनाओं और नीतियों का लाभ वास्तव में सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। लोकतंत्र में नीति निर्माण एक सतत प्रक्रिया है और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार सुधार स्वाभाविक माने जाते हैं।
आज सोशल मीडिया ने आंदोलनों की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है। कुछ ही मिनटों में कोई वीडियो, तस्वीर या बयान पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाता है। इससे नागरिक भागीदारी बढ़ी है, लेकिन इसके साथ भ्रामक सूचनाओं और अफवाहों का खतरा भी बढ़ा है। हाल के छात्र प्रदर्शनों के दौरान भी अनेक वीडियो और दावे वायरल हुए, जिनमें से कुछ की सत्यता पर बाद में प्रश्न उठे। इसलिए किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसका सत्यापन करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद में निहित होती है। यदि सरकार, नागरिक समाज, छात्र, शिक्षाविद, न्यायपालिका और प्रशासन आपसी संवाद के माध्यम से समस्याओं का समाधान खोजें तो अधिकांश विवाद टकराव के बिना भी सुलझाए जा सकते हैं। आंदोलन लोकतंत्र का आवश्यक अंग हैं, लेकिन उनकी सफलता शांतिपूर्ण आचरण, नैतिक वैधता और स्पष्ट उद्देश्य पर निर्भर करती है। उसी प्रकार सरकार की विश्वसनीयता भी पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के सम्मान से मजबूत होती है।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। जिस समाज में नागरिक निर्भय होकर प्रश्न पूछ सकते हैं, अपनी मांगें रख सकते हैं और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज करा सकते हैं, वही समाज लोकतांत्रिक रूप से परिपक्व माना जाता है। लेकिन यह स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश, घृणा फैलाने वाली भाषा और कानून को हाथ में लेना किसी भी उद्देश्य को नैतिक वैधता नहीं दे सकते। दूसरी ओर पारदर्शी शासन, शांतिपूर्ण आंदोलन, निष्पक्ष कानून व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर और रचनात्मक संवाद ही वह मार्ग है जो भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को अधिक मजबूत, अधिक उत्तरदायी और अधिक समावेशी बना सकता है। यही लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।





