प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
राजनीतिक विरासत उपाधियों या पारिवारिक पहचान से नहीं, जनविश्वास, वैचारिक दृढ़ता और जनसंघर्ष से निर्मित होती है। कुछ व्यक्तित्व इतिहास तक सीमित नहीं रहते, बल्कि युगों तक समाज की दिशा तय करने वाली चेतना बन जाते हैं। उनके सिद्धांत और कर्म पीढ़ियों को प्रेरित करते हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस का 2023 के विधानसभा चुनाव में 66 सीटों तक सिमटना और 2024 के लोकसभा चुनाव में खाता न खोल पाना केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि घटते जनाधार और संगठनात्मक शिथिलता का संकेत है। ऐसे समय निमाड़ की जनोन्मुख राजनीतिक परंपरा स्मरण हो उठती है, जिसने सत्ता को विशेषाधिकार नहीं, लोकसेवा का माध्यम माना। सुभाष यादव की दूरदृष्टि, अरुण यादव की संगठन क्षमता और सचिन यादव की संघर्षशीलता से निर्मित यह विरासत कांग्रेस के लिए केवल गौरवशाली अतीत नहीं, पुनरुत्थान की आधारशिला बन सकती है।
सुभाष यादव आज हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी सोच आज भी निमाड़ की धरती, खेतों की मेड़ों और किसानों के विश्वास में जीवित है। उन्होंने राजनीति को सत्ता नहीं, जनसेवा तथा सहकारिता को ग्रामीण समृद्धि का आधार बनाया। वर्ष 1971 में ग्राम बोरावां की प्राथमिक सेवा सहकारी समिति से आरंभ हुई उनकी यात्रा मध्य प्रदेश राज्य सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद तक पहुँची, जहाँ उन्होंने सहकारी संस्थाओं को सशक्त कर किसानों की आर्थिक शक्ति को नई दिशा दी। उपमुख्यमंत्री के रूप में कृषि, सहकारिता और नर्मदा घाटी विकास विभागों का दायित्व निभाते हुए उन्होंने किसान को नीति के केंद्र में रखा। निमाड़ की सिंचाई, कृषि समृद्धि और ग्रामीण विकास को लेकर उनकी दूरदृष्टि कृषक कल्याण आयोग के 888 सुझावों में स्पष्ट झलकती है। उनके नेतृत्व में सहकारी समितियों ने किसानों के लिए ऋण और विपणन व्यवस्था को सुदृढ़ किया। निमाड़ की काली मिट्टी और नर्मदा को उन्होंने विकास की धुरी मानते हुए स्थायी कृषि व्यवस्था की नींव रखी।
सुभाष यादव की इसी परंपरा को अरुण यादव और सचिन यादव ने अपने संघर्ष से आगे बढ़ाया। अरुण यादव ने इसे पहचान नहीं, संगठन और जनविश्वास की शक्ति बनाया। वर्ष 2014 से 2018 तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते उन्होंने ऐसे समय संगठन का नेतृत्व किया, जब पार्टी को जमीनी मजबूती की आवश्यकता थी। उन्होंने कार्यकर्ताओं, किसानों और पिछड़े वर्गों से सीधा जुड़ाव मजबूत किया तथा निमाड़ में कांग्रेस का जनाधार बनाए रखने का प्रयास किया। वर्ष 2011 में केंद्रीय कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री के रूप में उन्होंने कृषि, फसल प्रसंस्करण और किसान कल्याण को प्राथमिकता दी, जिसका सकारात्मक प्रभाव निमाड़ के कृषि क्षेत्र पर पड़ा। उनकी राजनीति पदलिप्सा नहीं, दायित्वबोध से प्रेरित रही। उन्होंने कभी पद की आकांक्षा नहीं जताई, बल्कि पार्टी और जनसेवा को सर्वोपरि रखा। उन्होंने संगठन को केवल चुनाव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज से उसका जुड़ाव मजबूत किया। किसानों और पिछड़े वर्गों से उनका सीधा संवाद पार्टी के जनाधार का आधार बना। उनकी पहचान दिखावे से नहीं, शांत और परिणाममुखी कार्यशैली से रही।
अरुण यादव ने अपनी स्वच्छ छवि, सादगी और संयमित कार्यशैली से विश्वास अर्जित किया। वे सदैव विवादों से दूर रहे और उनके लिए उपलब्धि का आधार चर्चा नहीं, कार्य रहा। निमाड़ में शिक्षा, किसान हित और जनसरोकार उनकी प्राथमिकता रहे। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सचिन यादव ने विधानसभा में किसानों के मुद्दे मुखरता से उठाए। पूर्व कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने ‘जय किसान ऋण मुक्ति योजना’ के माध्यम से किसानों का ऋणभार कम करने का प्रयास किया। बिजली संकट, खाद की कमी और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे मुद्दों पर उनकी आवाज किसान हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण रही। यही जनसरोकार यादव परिवार की राजनीति को चुनाव तक सीमित नहीं रखते, बल्कि किसानों के अटूट विश्वास से जोड़ते हैं। सचिन यादव ने विधानसभा के भीतर और बाहर किसानों की पीड़ा को मुखरता से उठाया। उनके मुद्दे केवल आलोचना नहीं, समाधान की दिशा भी दिखाते रहे। यही प्रतिबद्धता यादव परिवार की राजनीति को व्यक्तिगत पहचान से ऊपर जनसरोकार का स्वर देती है।
जब विश्वास डगमगाने लगे, तब अनुभवी, संघर्षशील और जनाधार वाले नेतृत्व की आवश्यकता सबसे अधिक होती है। मध्य प्रदेश कांग्रेस आज ऐसे ही दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में अरुण यादव जैसे नेता, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पार्टी और समाज से अपना जुड़ाव बनाए रखा, संगठन को नई दिशा और ऊर्जा दे सकते हैं। उनका अनुभव, सादगी और निष्काम कार्यशैली समर्पित कार्यकर्ताओं में नया विश्वास और उत्साह जगाने की क्षमता रखती है। निमाड़ की किसान-केंद्रित राजनीति को यदि प्रदेश की व्यापक रणनीति का आधार बनाया जाए, तो मालवा, विंध्य और बुंदेलखंड तक कांग्रेस जनता के साथ विश्वास का नया सेतु निर्मित कर सकती है।
हर राजनीतिक पुनर्जागरण अपनी जड़ों से शक्ति पाता है। सुभाष यादव की सहकारिता-आधारित सोच, अरुण यादव का संगठनात्मक अनुभव और सचिन यादव की संघर्षशीलता ऐसी विरासत गढ़ते हैं, जिसमें किसान केवल चुनावी मुद्दा नहीं, विकास का केंद्र है। इसका प्रमाण है कि एक ही परिवार के तीनों स्तंभों ने कृषि मंत्रालय का दायित्व संभाला—सुभाष यादव ने प्रदेश में, ज्येष्ठ पुत्र अरुण यादव ने केंद्र में और कनिष्ठ पुत्र सचिन यादव ने पुनः प्रदेश में। यह संयोग नहीं, बल्कि किसान के प्रति पीढ़ियों से चली आ रही प्रतिबद्धता का प्रमाण है। सेवा, समर्पण और जनता से जुड़ाव ही वह शक्ति है, जो कठिनतम दौर में भी किसी संगठन के पुनर्निर्माण का आधार बनती है।
आज मध्य प्रदेश कांग्रेस के सामने केवल चुनावी चुनौती नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को पुनः पहचानने का क्षण है। सुभाष यादव की जड़ों से निकली यह विरासत यदि सही दिशा, सही अवसर और निर्भीक नेतृत्व पाए, तो निमाड़ की धरती से उठने वाली यह आवाज पूरे प्रदेश में गूंज सकती है। खेतों की हरियाली, कार्यकर्ताओं का उत्साह और जनता का फिर से जागा भरोसा—यही वह मार्ग है, जो कांग्रेस को पराजय की छाया से निकालकर पुनरुत्थान के प्रकाश की ओर ले जा सकता है।





