वर्षा जल को आफत नहीं, संसाधन में बदलने की रणनीति बनानी आवश्यक
गोपेन्द्र नाथ भट्ट
लंबे इंतजार के बाद इस वर्ष जब मानसून ने देश में दस्तक दी तो बारिश की बूंदें राहत और उम्मीद का संदेश लेकर आईं। खेतों को पानी मिला, बांधों और जलाशयों में पानी पहुंचा और जलसंकट से जूझते क्षेत्रों को राहत मिली लेकिन मानसून के आगे बढ़ने के साथ ही कई राज्यों में बारिश का दूसरा रूप सामने आया है। देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर से लेकर राजस्थान के अनेक जिलों तक अतिवृष्टि, जलभराव और बाढ़ जैसे हालात ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी बाढ़ और जलनिकासी व्यवस्था बदलते मौसम की चुनौतियों के अनुरूप तैयार है?बारिश को लेकर बहुत उम्मीदें जगी थीं। खेती-किसानी से लेकर जलाशयों तक, हर तरफ मानसून की कृपा को राहत और समृद्धि का संकेत माना गया लेकिन मानसून के दूसरे चरण में तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। अब वही बारिश, जो जीवन और अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी जरूरत है, अनेक क्षेत्रों में आफत का रूप लेती जा रही है। राजस्थान से लेकर दिल्ली-एनसीआर, मुम्बई और देश के कई हिस्सों में जलभराव, बाढ़, सड़क संपर्क बाधित होने तथा सामान्य जनजीवन प्रभावित होने की घटनाएं सवाल खड़े कर रही हैं कि क्या हमारी शहरी और ग्रामीण बाढ़ प्रबंधन व्यवस्था बदलते मौसम के अनुरूप तैयार है?
भारतीय मौसम विभाग ने एक दो दिनों में राजस्थान सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में भारी बारिश की चेतावनी दी है। पूर्वी राजस्थान में बहुत भारी बारिश का अलर्ट है, जबकि पश्चिमी राजस्थान में भी भारी बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं की चेतावनी जारी की गई है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या 14 अगस्त तक राजस्थान में बारिश का दौर जारी रहने की संभावना है। राजस्थान के लिए अच्छे मानसून की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्यतः सूखे और पानी की कमी से जूझने वाला बड़ा भूभाग अब कई जगह अतिवृष्टि और जलभराव की समस्या का सामना कर रहा है। कोटा, बूंदी, बारां, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, टोंक, सवाई माधोपुर, जयपुर, उदयपुर सहित अनेक जिलों में भारी बारिश की चेतावनी ने प्रशासन के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमने बारिश को केवल प्राकृतिक आपदा मानकर उससे निपटने की तैयारी की है, या शहरी नियोजन का हिस्सा बनाकर जल निकासी की स्थायी व्यवस्था विकसित की है? हर साल बरसात में एक जैसे दृश्य दिखाई देते हैं—सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, नाले उफनने लगते हैं, अंडरपास जलमग्न हो जाते हैं और यातायात ठप पड़ जाता है फिर बारिश समाप्त होते ही यह समस्या भी जैसे हमारी सामूहिक स्मृति से बाहर हो जाती है।
देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र इस विडंबना का सबसे बड़ा उदाहरण है। दिल्ली-एनसीआर में बारिश के साथ जलभराव और यातायात संबंधी परेशानियां बार-बार सामने आती हैं। अगले एक दो दिनों में भी दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम सहित पूरे एनसीआर में बारिश की संभावना बनी हुई है।
दरअसल, समस्या केवल बारिश की मात्रा नहीं है। बदलते मौसम के दौर में कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ने से शहरों की पुरानी जलनिकासी व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। दूसरी ओर, तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने प्राकृतिक जलधाराओं, तालाबों और जलभराव वाले क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। जब पानी के प्राकृतिक रास्ते सिकुड़ते हैं और कृत्रिम निकासी क्षमता सीमित रहती है तो सामान्य बारिश भी संकट पैदा कर सकती है।
इसलिए अब समय आ गया है कि बाढ़ प्रबंधन को केवल राहत और बचाव की गतिविधि न मानकर दीर्घकालीन शहरी नियोजन का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। नालों की सफाई बारिश से पहले हो, लेकिन केवल सफाई पर्याप्त नहीं है। उनकी क्षमता का वैज्ञानिक आकलन, पुराने जलमार्गों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, तालाबों और जलाशयों का पुनर्जीवन तथा अतिक्रमण पर कठोर कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।
राजस्थान जैसे राज्य में इसके साथ एक और चुनौती है—एक ओर पानी का संकट और दूसरी ओर कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा। इसलिए वर्षा जल को आफत नहीं, संसाधन में बदलने की रणनीति बनानी होगी। गांवों में जल संरक्षण संरचनाओं और शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को केवल कागजी नियम नहीं, वास्तविक व्यवस्था बनाना होगा। दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर शहर वर्षा जल को छत से सीधे घरो में बनाए पानी के टैंकों तथा हैंडपंपों आदि से जोड़ने के अच्छे परिणाम आए । इस मॉडल को सभी स्थानों पर अपनाना चाहिए। राजस्थान में उदयपुर में एक ऐसा क्षेत्र भी है जहां से वर्षा जल के नदी नालों का पानी व्यर्थ बह कर समुद्र में आधा अरब सागर में और आधा हिंद महासागर में गिरता है। नदियों को जोड़ कर पानी का सदुपयोग करने की पहल कम पानी वाले राजस्थान के लिए वरदान साबित हो सकती है।
मानसून की बारिश प्रकृति का वरदान है। समस्या बारिश नहीं, हमारी तैयारी की कमी है। इस वर्ष की बारिश ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि विकास का अर्थ केवल सड़क, भवन और फ्लाईओवर बनाना नहीं, बल्कि ऐसी आधारभूत संरचना तैयार करना भी है जो प्रकृति के बदलते तेवरों का सामना कर सके।
बारिश आखिरकार थम जाएगी, पानी उतर जाएगा और जनजीवन सामान्य हो जाएगा। लेकिन यदि हर मानसून के बाद यही सवाल दोहराया जाता रहा कि सड़कें क्यों डूबीं, नाले क्यों उफने और शहर क्यों ठप हुए, तो यह केवल मौसम की विडंबना नहीं, व्यवस्था की विफलता होगी। अब जरूरत राहत की नहीं, स्थायी समाधान की राजनीति और दूरदर्शी नियोजन की है।
राजस्थान में तो प्रकृति का अनूठा विरोधाभास
राजस्थान में तो प्रकृति का यह विरोधाभास विशेष रूप से दिखाई देता है। जिस प्रदेश में वर्षा का इंतजार पूरे वर्ष रहता है, वहीं कई स्थानों पर कुछ घंटों की तेज बारिश जनजीवन को अस्त-व्यस्त करने लगती है। राजस्थान के दक्षिणी भाग में स्थित उदयपुर इसका अनूठा उदाहरण है। यहां अरावली की जल-विभाजक रेखा ऐसी भौगोलिक स्थिति बनाती है जहां वर्षाजल दो अलग-अलग दिशाओं में बहकर दो अलग समुद्री अपवाह तंत्रों का हिस्सा बनता है। एक ओर का पानी साबरमती नदी तंत्र के माध्यम से अरब सागर की ओर जाता है, तो दूसरी ओर का पानी बनास-चंबल तंत्र के माध्यम से अंततः बंगाल की खाड़ी की ओर बहता है।
उदयपुर के दक्षिण-पूर्व में स्थित बिछड़ी क्षेत्र को इस जल-विभाजक भूगोल के उल्लेखनीय उदाहरणों में माना जाता है। यह तथ्य राजस्थान की प्राकृतिक भौगोलिक विविधता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। एक ही क्षेत्र में गिरने वाली बारिश की बूंदें अरावली की ढलान के अनुसार अलग-अलग दिशाओं में बह सकती हैं। यानी प्रकृति ने उदयपुर क्षेत्र को एक ऐसा भौगोलिक मोड़ दिया है जहां पानी की यात्रा की दिशा कुछ किलोमीटर के अंतर से बदल सकती है।
यही कारण है कि राजस्थान में वर्षाजल को केवल बाढ़ की समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। हमें यह समझना होगा कि हर बूंद अपने साथ एक अवसर भी लेकर आती है। यदि पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे बांध, एनीकट, तालाब और जलसंग्रह संरचनाएं वैज्ञानिक ढंग से विकसित हों तो यही पानी भूजल recharge और कृषि के लिए वरदान बन सकता है।
दूसरी ओर, देश की राजधानी दिल्ली और एनसीआर का हालिया जलभराव शहरी नियोजन की कमजोरियों को उजागर करता है। बारिश होते ही अनेक सड़कें, अंडरपास और निचले इलाके पानी में डूब जाते हैं। समस्या केवल बारिश की अधिक मात्रा नहीं है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण, नालों की सीमित क्षमता और वर्षाजल के प्राकृतिक बहाव में बाधा भी इसके बड़े कारण हैं।
हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और बाढ़ नियंत्रण की तैयारियों के दावे होते हैं, लेकिन पहली बड़ी बारिश के साथ व्यवस्थाओं की वास्तविक परीक्षा शुरू हो जाती है। यदि बारिश के कुछ घंटों में ही शहर ठप हो जाएं तो निश्चित रूप से हमें अपनी तैयारियों की समीक्षा करनी होगी।
अब समय आ गया है कि बाढ़ प्रबंधन को केवल आपदा के समय राहत और बचाव तक सीमित न रखा जाए। शहरों के मास्टर प्लान में प्राकृतिक जलधाराओं, तालाबों, झीलों और जलभराव वाले क्षेत्रों की रक्षा अनिवार्य हो। नालों की सफाई के साथ उनकी क्षमता बढ़ाई जाए। वर्षाजल संचयन को कागजी प्रावधान के बजाय वास्तविक अभियान बनाया जाए।
राजस्थान के लिए तो यह और भी जरूरी है। यहां एक तरफ पानी की कमी है और दूसरी तरफ मानसून में अचानक आने वाली अतिवृष्टि। इसलिए लक्ष्य होना चाहिए—“बारिश को रोकना नहीं, बारिश के पानी को रोकना।” हर बूंद को खेत, तालाब, बांध और भूजल भंडार तक पहुंचाने की रणनीति बनानी होगी।
मानसून प्रकृति का वरदान है, आफत हमारी तैयारी की कमी से बनती है। उदयपुर का जल-विभाजक क्षेत्र हमें प्रकृति की अद्भुत जल-व्यवस्था का संदेश देता है, जबकि दिल्ली-एनसीआर का जलभराव हमारी मानवीय व्यवस्थाओं की कमजोरी का आईना है।
बारिश थम जाएगी, पानी उतर जाएगा और जीवन फिर सामान्य हो जाएगा। लेकिन यदि हर मानसून के बाद वही सवाल दोहराना पड़े कि सड़कें क्यों डूबीं, नाले क्यों उफने और शहर क्यों ठप हुए, तो यह केवल मौसम की मार नहीं होगी। यह हमारी नियोजन व्यवस्था की चुनौती होगी।अब जरूरत है कि बारिश की हर बूंद को आफत नहीं, अवसर समझा जाए। यही मानसून का सबसे बड़ा संदेश है।





