कृति आरके जैन
कुछ आवाजें कानों तक पहुँचकर ठहरती नहीं, भीतर अपना घर बना लेती हैं। रेडियो भी ऐसी ही आवाज है। राष्ट्रीय रेडियो दिवस पर उसकी स्मृति किसी बीते उपकरण की नहीं, बल्कि उस अदृश्य हमसफर की याद है, जिसने गीतों में आनंद, सूचनाओं में भरोसा और खामोशी में साथ दिया। बिनाका गीतमाला की मखमली धुनों से ‘मन की बात’ की आत्मीयता तक, रेडियो की यात्रा केवल तकनीक के बदलते रूपों की कहानी नहीं है। कभी वह गाँव की चौपाल पर गूँजा, कभी रात के सन्नाटे में अकेले कमरे का सहारा बना और आज मोबाइल व इंटरनेट से फिर कानों तक पहुँच रहा है। साधन और समय बदलते रहे, आवाज का अपनापन आज भी जस का तस है।
शाम ढलते ही ट्रांजिस्टर की आवाज उठती, घरों की दीवारें छोटी और दूरियाँ मिटने लगती थीं। अमीन सायानी की आवाज में गीत गूँजता तो पूरा मोहल्ला एक भाव में बंध जाता। रेडियो के पास तस्वीर नहीं थी, फिर भी वह मन में अनगिनत दृश्य रच देता था। क्रिकेट की कमेंट्री में श्रोता गेंद की रफ्तार, स्टेडियम की हलचल और चौके की गूँज तक महसूस करता था। यही रेडियो का सम्मोहन था—दिखाए बिना दिखा देना। उसने श्रोता को केवल सुनने वाला नहीं, कल्पना का सह-रचनाकार बना दिया। आज पॉडकास्ट और इंटरनेट रेडियो उसी जादू को नए रूप में आगे बढ़ा रहे हैं; आवाज और मंच बदले हैं, दिल तक पहुँचने का रास्ता नहीं।
रेडियो की ताकत आवाज में नहीं, उस भरोसे में थी जो करोड़ों दिलों तक पहुँचाता था। स्वतंत्रता संग्राम में जब अखबार सेंसर की कैंची से जूझ रहे थे, तब आजाद हिंद रेडियो की आवाजें भारतीयों तक पहुँचती थीं। वे केवल समाचार नहीं, स्वतंत्रता की बेचैनी और उम्मीद थीं। आजादी के बाद रेडियो ने नवजात राष्ट्र को साझा सार्वजनिक जीवन दिया। किसानों को मौसम व खेती की जानकारी, माताओं को स्वास्थ्य-संदेश, बच्चों को कहानियाँ और बुजुर्गों को भक्ति-संगीत में सांत्वना मिली। आपदा में इसका महत्व उभरा—सुनामी हो या उत्तराखंड की बाढ़, जब संचार ठप पड़ते हैं, बैटरी वाला रेडियो राहत, चेतावनी और उम्मीद का सहारा बनता है। संयुक्त राष्ट्र भी आपदा-संचार में इसकी विश्वसनीयता रेखांकित करता है।
टेलीविजन, इंटरनेट और मोबाइल की चमक ने रेडियो को पीछे धकेला, फिर भी उसकी आवाज खत्म नहीं हुई। ‘मन की बात’ ने उसे फिर करोड़ों घरों के संवाद में ला खड़ा किया। खासियत यह रही कि यह महज सरकारी घोषणा नहीं लगी; संबोधन में ऐसा अपनापन था, मानो कोई आँगन में बैठकर पूछ रहा हो—क्या हाल है तुम्हारा? स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ, डिजिटल इंडिया जैसे विषय हों या किसी नागरिक की प्रेरक कहानी, सहज भाषा ने बात को नारा नहीं, संवाद बना दिया। रेडियो की ताकत आदेश में नहीं, बातचीत में है; क्योंकि वही आवाज जोड़ती है, जिसमें उपदेश कम और अपनापन अधिक हो।
जब स्क्रीनें हमारी आँखों को बाँध रही हैं, रेडियो कानों के रास्ते हमें भीतर के मनुष्य से मिला सकता है। सामुदायिक रेडियो गाँव-गाँव स्थानीय बोलियों में बोलते हैं, इसलिए उनकी विश्वसनीयता अलग है। वे किसानों को बाजार भाव, महिलाओं को स्वास्थ्य जानकारी और युवाओं को कौशल व रोजगार की दिशा देते हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए रेडियो कभी-कभी घर का पता बन जाता है। हजारों मील दूर बैठा व्यक्ति मातृभाषा का गीत सुनता है तो लगता है, जैसे अपनी गली के मोड़ पर लौट आया हो। वैश्वीकरण का यही कोमल रूप है—दुनिया बड़ी हो, पर आवाज में अपनी मिट्टी की खुशबू बची रहे।
रेडियो ने आवाजों के साथ अनगिनत सपनों को भी पहचान दी। उसने रेडियो जॉकी, ध्वनि कलाकार, उद्घोषक और स्क्रिप्ट राइटर जैसे कामों के दरवाजे खोले। खासकर युवाओं और महिलाओं के लिए, जिनके पास मंच कम थे, आवाज ही पहचान बन गई। यहाँ चेहरा जरूरी नहीं था; शब्द, उच्चारण, संवेदना और संवाद की क्षमता ही पूँजी थी। यह लैंगिक समानता की कोई ऊँची घोषणा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के प्रसारण में चली शांत क्रांति थी। डिजिटल इंडिया के दौर में भी रेडियो ग्रामीण भारत का शिक्षक, साथी और सांस्कृतिक वाहक है। वह स्क्रीन के बिना शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, संगीत और लोक-संस्कृति घर-घर पहुँचा सकता है।
समय ने रेडियो को कई बार पीछे छूटा हुआ समझा, लेकिन हर तकनीकी बदलाव के साथ उसने खुद को नए रूप में सामने रखा। ट्रांजिस्टर से एफएम, एफएम से इंटरनेट स्ट्रीमिंग और फिर पॉडकास्ट तक उसने हर बदलाव को अपने पक्ष में मोड़ा। उसकी ताकत किसी उपकरण में नहीं, इंसान की सुनने की जरूरत में है। स्क्रीन लगातार हमें दिखाती है, जबकि रेडियो हमें ठहरकर सुनना सिखाता है। जब हर व्यक्ति बोलना चाहता है, तब ऐसा माध्यम भी जरूरी है जो बिना चेहरे के साथ दे, बिना शोर के सूचना दे और बिना दृश्य तमाशे के कल्पना को जीवित रखे। इसी अर्थ में रेडियो तकनीक से अधिक एक सामाजिक आदत और सांस्कृतिक स्मृति है।
रेडियो को बीते दिनों की धुंध में रख देना उसकी असली पहचान को छोटा करना होगा। राष्ट्रीय रेडियो दिवस पर कभी फोन की रोशनी बुझाकर किसी आवाज को बिना स्क्रीन के सुनिए; संभव है उसमें माँ की लोरी लौट आए, बचपन का गीत सुनाई दे, पुराने क्रिकेट की उत्तेजना जाग उठे या बस यह भरोसा मिले कि आप अकेले नहीं हैं। बिनाका गीतमाला से पॉडकास्ट तक, मनोरंजन से ‘मन की बात’ तक रेडियो की यात्रा जारी है। वह हर बार अपना रूप बदलता है, स्वभाव नहीं। जब तक मनुष्य में कहानी सुनने की इच्छा, दूर की आवाज से जुड़ने की आकांक्षा और सुनने वाले कान हैं, तब तक रेडियो हवा में रहेगा। वह मशीन नहीं, संगी है—और संगी की जरूरत कभी खत्म नहीं होती।





