सत्य भूषण शर्मा
भारत की सांस्कृतिक चेतना में यदि किसी संत-कवि ने धर्म को लोकजीवन से जोड़ा, भाषा को जन-जन का स्वर बनाया और भक्ति को मानवता का उत्सव बना दिया, तो वे गोस्वामी तुलसीदास हैं। उनकी जयंती केवल एक महापुरुष का स्मरण नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिकता और लोकमंगल की उस अखंड परंपरा का अभिनंदन है, जो सदियों से समाज को दिशा देती आ रही है।
तुलसीदास ने ऐसे समय में जन्म लिया जब समाज अनेक सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक चुनौतियों से गुजर रहा था। उन्होंने संस्कृत के सीमित दायरे से बाहर निकलकर अवधी जैसी लोकभाषा में ‘रामचरितमानस’ की रचना की। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस का सांस्कृतिक संविधान बन गया। गाँव की चौपाल से लेकर शहर के मंदिरों तक, मानस की चौपाइयाँ आज भी जीवन का मार्गदर्शन करती हैं।
तुलसीदास की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भगवान राम को केवल आराध्य नहीं, बल्कि आदर्श मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया। उनके राम मर्यादा, करुणा, न्याय, कर्तव्य और सहिष्णुता के प्रतीक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सत्ता का मूल्य सेवा में है और शक्ति का सौंदर्य संयम में। यही कारण है कि तुलसी के राम आज भी हर युग में प्रासंगिक हैं।
उनकी रचनाओं में भक्ति के साथ-साथ सामाजिक चेतना भी स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने प्रेम, दया, विनम्रता और सदाचार को जीवन का आधार माना। उनके शब्दों में भक्ति पलायन नहीं, बल्कि आत्मबल का स्रोत है। उन्होंने मनुष्य को भीतर से बदलने की प्रेरणा दी और बताया कि सच्चा धर्म आडंबर नहीं, बल्कि आचरण में बसता है।
तुलसीदास केवल कवि नहीं थे, बल्कि भाषा के महान शिल्पी भी थे। अवधी और ब्रजभाषा को उन्होंने ऐसा साहित्यिक वैभव दिया कि उनकी रचनाएँ सदियों बाद भी सहज, मधुर और प्रभावशाली प्रतीत होती हैं। उनकी चौपाइयों की लय, दोहों की गहराई और भावों की सरलता उन्हें विश्व साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।
आज के समय में, जब समाज संवादहीनता, तनाव और मूल्य-संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तुलसीदास की शिक्षाएँ नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। उनका संदेश हमें याद दिलाता है कि परिवार का आधार विश्वास है, समाज का आधार संवेदना है और राष्ट्र का आधार चरित्र है।
तुलसीदास जयंती मनाने का वास्तविक अर्थ केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारना है। यदि हम सत्य, सेवा, करुणा और मर्यादा को अपने व्यवहार का हिस्सा बना लें, तो यही उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
संत तुलसीदास ने शब्दों से केवल काव्य नहीं रचा, बल्कि भारतीय आत्मा को स्वर दिया। उनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी। इसलिए तुलसीदास जयंती वास्तव में उस अमर प्रकाश का उत्सव है, जो युगों से भारतीय संस्कृति के पथ को आलोकित करता आ रहा है।





