होर्मुज से जापान और सिंगापुर से अंतरिक्ष तक :वैश्विक संकट के बीच भारत ने कैसे खोले विकास के नए दरवाजे?

From Hormuz to Japan and Singapore to space: How did India open new doors to development amidst the global crisis?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर भारत ज़ब राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मना रहा है, तब दुनियाँ की अर्थव्यवस्था एक बिल्कुल अलग प्रकार के अंतरिक्ष, भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता,में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। एक तरफ अमेरिका-ईरान तनाव,होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती टकरावपूर्ण बयानबाजी महंगा कच्चा तेल,ऊंची वैश्विक बॉन्ड यील्ड और टैरिफ युद्ध है; दूसरी ओर भारत अंतरिक्ष स्टार्टअप्स,जापान के साथ निवेश, एफडीआई सुधार, तकनीकी साझेदारी और बहुस्तरीय रणनीतिक कूटनीति के माध्यम से भविष्य की आर्थिक नींव मजबूत करने में लगा है।यही विरोधाभास आज भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कहानी है बाहर तूफान है लेकिन भीतर भारत अपनी आर्थिक नाव को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस दिनांक 23 अगस्त 2026 को मनाया गया परंतु इसके पूर्व पीएम ने 21 अगस्त को नई दिल्ली में 20 भारतीय स्पेस-टेक स्टार्टअप्स के संस्थापकों और सीईओ से संवाद किया। इस बैठक की बातचीत और मुख्य अंशों का टीवी व सोशल मीडिया पर आधिकारिक प्रसारण 23 अगस्त को सुबह 10 बजे राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के अवसर पर किया गया,इसमें स्काईरूट एयरोस्पेस अग्निकुल कॉसमॉस पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, दिगंतरा सहित अनेक कंपनियां शामिल थीं।पीएम ने अंतरिक्ष तकनीक को केवल रॉकेट और उपग्रहों तक सीमित न रखते हुए कृषि, पशुपालन,डेयरी,पर्यावरण और आम नागरिकों के दैनिक जीवन से जोड़ने पर जोर दिया।उन्होंने ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की आवश्यकता बताई जिसमें दुनियाँ जबअंतरिक्ष की ओर देखे तो भारत दिखाई दे और वैश्विक प्रतिभा,कंपनियां तथा निवेश भारत की ओर आकर्षित हों। मेरे विचार से यह घटनाक्रम केवल विज्ञान एवं तकनीक की खबर नहीं है, बल्कि भारत की नई अर्थव्यवस्था का संकेत है।अंतरिक्ष आधारित पृथ्वी अवलोकन से किसानों को मौसम,फसल,मिट्टी और जल-संसाधनों की बेहतर जानकारी मिल सकती है; सैटेलाइट डेटा पर्यावरण निगरानी,आपदा प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर नियोजन में उपयोगी हो सकता है।भारत में 2014 में केवल एक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप से संख्या 2026 में 400 से अधिक हो चुकी है।इसका अर्थ है कि अंतरिक्ष अब केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि निजी पूंजी, स्टार्टअप रोजगार,निर्यात और उच्च तकनीक आधारित औद्योगिक विकास का नया क्षेत्र बन रहा है।इसी बीच भारत की दूसरी बड़ी आर्थिक पहल जापान के साथ दिखाई देती है।

साथियों, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री 24 से 27 अगस्त 2026 तक जापान की यात्रा पर हैं और भारत के अब तक के सबसे बड़े व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। 200 से अधिक भारतीय कारोबारी प्रतिनिधियों वाला यह दल टोक्यो, नागोया और ओसाका में जापानी उद्योग जगत के साथ व्यापार और निवेश के अवसर तलाश रहा है।सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, ऑटोमोबाइल,स्टील,विनिर्मण वित्तीय सेवाओं, स्वास्थ्य और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में सहयोग इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।भारत-जापान संबंधों का आर्थिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं चीन-केंद्रित मॉडल से विविधीकरण की ओर बढ़ रही हैं। जापान की पूंजी,तकनीक और औद्योगिक विशेषज्ञता तथा भारत का विशाल बाजार, युवा मानव संसाधन और डिजिटल इकोसिस्टम मिलकर विनिर्माण एवं तकनीकी निवेश की नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। अगले दशक में जापानी निवेश के लिए 10 ट्रिलियन येन के लक्ष्य को गति देना केवल विदेशी पूंजी जुटाने का प्रयास नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक उत्पादन नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की सटीकता से रणनीति है।

साथियों, इसके पूर्व वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में चौथे भारत-सिंगापुर मंत्रिस्तरीय गोलमेज सम्मेलन 19 से 20 अगस्त 2026 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही थीं,विदेश मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी राज्यमंत्री की सिंगापुर यात्रा का परिणाम केवल उच्चस्तरीय बैठकों तक सीमित नहीं रहा।सम्मेलन में उन्नत विनिर्माण सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला,डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर एआई गवर्नेंस,साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। दोनों देशों ने दूरसंचार एवं प्रसारण,खाद्य सुरक्षा और समुद्री विरासत से जुड़े दो समझौता ज्ञापन तथा एक लेटर ऑफ इंटेंट भी किए। यह यात्रा भारत के लिए पूंजी, तकनीक, बाजार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ने की रणनीतिक दिशा को मजबूत करती है।उधर विदेश मंत्री रूस के पहले डिप्टी प्राइम मिनिस्टर डेनिस मंटुरोव के बुलावे पर 23- 24 अगस्त, 2026 को रूस का ऑफिशियल दौरा किए, इस दौरे के दौरान, ट्रेड इकोनॉमिक,साइंटिफिक, टेक्नोलॉजिकल और कल्चरल कोऑपरेशन पर इंडिया- रूस इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन के 27 वें सेशन की को-चेयर किए, वह रीजनल और ग्लोबल मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव सेभी मिले।

साथियों, अब दूसरी तरफ नजर डालें तो अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बयानबाजी ने पहले से तनावपूर्ण ऊर्जा बाजार को और अस्थिर किया है।23 अगस्त को ट्रंप द्वारा होर्मुज को अमेरिकी क्षेत्र के रूप में दर्शाने वाली तस्वीर साझा किए जाने की रिपोर्ट सामने आई,जबकि ईरान ने अमेरिकी नियंत्रण के दावे को खारिज किया है।होर्मुज दुनियाँ के प्रमुख ऊर्जा मार्गों में से एक है। इसलिए वहां सैन्य तनाव या नौवहन में व्यवधान की आशंका बढ़ते ही कच्चे तेल में जोखिम प्रीमियम बढ़ना स्वाभाविक है।भारत के लिए महंगा तेल केवल पेट्रोल और डीजल का विषय नहीं है। इसका असर परिवहन, लॉजिस्टिक्स,रसायन,प्लास्टिक, उर्वरक,विमानन,टायर,पेंट और विनिर्माण लागत तक पहुंचता है। यदि कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो आयात बिल बढ़ता है, चालू खाते पर दबाव पड़ता है, रुपये की कमजोरी बढ़ सकती है और महंगाई प्रबंधन कठिन हो सकता है। यही कारण है कि होर्मुज का संकट भारत के लिए विदेश नीति के साथ-साथ महंगाई, मुद्रा, राजकोष और कॉरपोरेट मुनाफे का आर्थिक संकट भी है।

साथियों, वैश्विक टैरिफ युद्ध इस तस्वीर को और जटिल बना रहा है।अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ता व्यापार तनाव तथा कनाडा को अमेरिका का “51वां राज्य”बनाने संबंधी ट्रंप की बार-बार की बयानबाजी केवलराजनीतिक टिप्पणी नहीं मानी जा सकती; यह उत्तर अमेरिकी व्यापार व्यवस्था में बढ़ती असहमति का प्रतीक है। हालिया व्यापार वार्ताओं के विफल होने के बाद ट्रंप ने फिर कनाडा को 51वां राज्य कहकर संबोधित किया। यदि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं टैरिफ और संरक्षणवाद को बढ़ाती हैं तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, निवेश और व्यापार लागत पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन यहीं भारत के लिए संकट में अवसर छिपा है। यदि वैश्विक कंपनियां अपनी उत्पादन श्रृंखलाओं को विविध बनाना चाहती हैं तो भारत को बेहतर लॉजिस्टिक्स प्रतिस्पर्धी लागत, स्थिर कर व्यवस्था, तेज मंजूरी, कुशल श्रम और भरोसेमंद नीति वातावरण उपलब्ध कराना होगा। केवल चीन से बाहर निकलो और भारत आओ का नारा पर्याप्त नहीं होगा; भारत को वास्तविक उत्पादन निर्यात और तकनीकी क्षमता का केंद्र बनना होगा।

साथियों, इसी संदर्भ में एफडीआई नीति में सुधार, सेमीकंडक्टर, एआई, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने की कोशिश महत्वपूर्ण है। भारत का लक्ष्य अब केवल विदेशी पूंजी प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी पूंजी आकर्षित करना होना चाहिए जो तकनीक, रोजगार, निर्यात और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला भी बनाए।भारतीय शेयर बाजार की हालिया अस्थिरता को भी इसी पृष्ठभूमि में देखना चाहिए। ऊंचा तेल, वैश्विक बॉन्ड यील्ड, डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक जोखिम विदेशी निवेशकों को सावधान बनाते हैं। लेकिन बाजार की अस्थिरता को भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी का सीधा प्रमाण मानना भी उचित नहीं होगा। शेयर बाजार भविष्य की आय, ब्याज दर, वैश्विक जोखिम और निवेश धारणा को एक साथ कीमतों में शामिल करता है। इसलिए अस्थिर बाजार के बीच भी यदि घरेलू मांग, पूंजीगत व्यय, बैंकिंग प्रणाली और कॉरपोरेट आय मजबूत रहते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से सटीकता से झेल सकती है।

साथियों भारत की रणनीतिक कूटनीति भी इसी समय महत्वपूर्ण हो जाती है। जापान के साथ निवेश और तकनीकी सहयोग, रूस के साथ ऊर्जा एवं व्यापार संबंध, सिंगापुर के साथ सेमीकंडक्टर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और एआई जैसे क्षेत्रों में सहयोग तथा पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी और निवेश संबंध ये सभी भारत को किसी एक शक्ति या एक बाजार पर अत्यधिक निर्भर होने से बचा सकते हैं। यही बहु-संरेखीय आर्थिक कूटनीति वर्तमान विश्व व्यवस्था में भारत की ताकत बन सकती है।राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस का संदेश इस आर्थिक रणनीति को एक और आयाम देता है। भारत अगर अंतरिक्ष तकनीक को कृषि, मौसम, जल प्रबंधन, पर्यावरण, संचार, आपदा प्रबंधन और रक्षा से जोड़ता है तो अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का प्रभाव धरती पर दिखाई देगा। स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजारों तक पहुंच, निजी निवेश, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी मिले तो भारत केवल उपग्रह बनाने वाला देश नहीं, बल्कि स्पेस-टेक उत्पाद और सेवाओं का वैश्विक निर्यातक बन सकता है।पीएम द्वारा 20 स्टार्टअप्स के साथ संवाद में वैश्विक प्रतिभा और निवेश आकर्षित करने पर जोर सटीकता से इसी दिशा का संकेत है।

साथियों, आज 23 अगस्त 2026 की स्थिति को यदि एक व्यापक आर्थिक कैनवास पर देखें तो भारत के सामने पांच बड़ी परीक्षाएं हैं,कच्चे तेल की कीमत, होर्मुज की स्थिरता, वैश्विक टैरिफ, रुपये की मजबूती और विदेशी निवेश की दिशा। लेकिन इसके समानांतर पांच बड़े अवसर भी हैं,स्पेस टेक, जापानी निवेश, वैश्विक सप्लाई-चेन विविधीकरण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और घरेलू विनिर्माण।मेरी दृष्टि में भारत की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह वैश्विक तूफान को रोक सकता है या नहीं; कोई भी देश ऐसा नहीं कर सकता। असली परीक्षा यह है कि वह तूफान के बीच अपनी आर्थिक दिशा कितनी मजबूती से बनाए रखता है। ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्षता को गति देनी होगी। साथ ही रोजगार, घरेलू मांग, निर्यात, विनिर्माण और स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत करना होगा।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि,आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां महंगा तेल, होर्मुज तनाव और टैरिफ युद्ध गंभीर जोखिम हैं, लेकिन यही परिस्थितियां वैश्विक पूंजी, तकनीक और उत्पादन के नए पुनर्गठन का अवसर भी दे सकती हैं।जापान से निवेश, अंतरिक्ष स्टार्टअप्स से नवाचार और रणनीतिक कूटनीति से ऊर्जा एवं व्यापारिक विविधता,यदि इन तीनों को घरेलू सुधारों से जोड़ा जाए तो भारत संकट का केवल सामना करने वाला देश नहीं रहेगा,बल्कि बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का लाभ उठाने वाला प्रमुख केंद्र बन सकता है। दुनिया में आर्थिक तूफान चाहे जितना बड़ा हो, मजबूत घरेलू मांग, विविध ऊर्जा स्रोत, तकनीकी आत्मनिर्भरता, स्थिर नीतियां और रणनीतिक कूटनीति भारत को संकट से अवसर की ओर ले जाने की क्षमता रखती हैं। यही 23 अगस्त 2026 के वैश्विक घटनाक्रमों का भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक संदेश है।