गोपेन्द्र नाथ भट्ट
राजस्थान में इस बार मानसून की चाल उम्मीद के अनुरूप नहीं रहने से खरीफ फसलों को लेकर किसानों की चिंता बढ़ने लगी है। राज्य में बारिश का वितरण असमान रहने और कई इलाकों में लंबे अंतराल के बाद वर्षा होने से खेतों में नमी का संकट पैदा हो रहा है। 21 अगस्त तक राजस्थान में सामान्य 323.91 मिलीमीटर के मुकाबले 278.28 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो सामान्य से 14.1 प्रतिशत कम है। राज्य के 41 जिलों में 19 जिले वर्षा की कमी वाले, 18 सामान्य और चार अधिक वर्षा वाले रहे हैं।
मानसून की इस बेरुखी का सबसे सीधा असर खरीफ फसलों पर दिखाई दे रहा है। बाजरा, मक्का, ज्वार, मूंग, मोठ, तिल, ग्वार, कपास और सोयाबीन जैसी फसलें काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर हैं। समय पर और पर्याप्त बारिश नहीं होने से जहां कुछ क्षेत्रों में बुवाई प्रभावित हुई, वहीं पहले बोई जा चुकी फसलों के सामने भी अब पर्याप्त नमी बनाए रखने की चुनौती है। जुलाई में ही कृषि विशेषज्ञों ने राजस्थान में अनियमित बारिश के कारण खरीफ बुवाई की रफ्तार पिछले वर्ष की तुलना में 20 से 25 प्रतिशत तक कम रहने का अनुमान जताया था।
राजस्थान में मानसून की सबसे बड़ी समस्या केवल बारिश की कमी नहीं, बल्कि उसका असमान वितरण है। पूर्वी राजस्थान के कुछ जिलों में अच्छी बारिश से खरीफ फसलों को राहत मिली है। हालिया बारिश के बाद भरतपुर, करौली, गंगापुर सिटी, डीग और सवाई माधोपुर जैसे क्षेत्रों में बड़े क्षेत्र में बोई गई बाजरा और तिलहन फसलों को लाभ मिला।
इसके विपरीत दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में स्थिति अधिक चिंता पैदा कर रही है। 21 अगस्त तक जोधपुर संभाग में बारिश की कमी 23.29 प्रतिशत और कोटा संभाग में 20.37 प्रतिशत दर्ज की गई। उदयपुर और कोटा संभाग जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में वर्षा की कमी का असर फसलों की बढ़वार और उत्पादन पर पड़ सकता है।
खरीफ फसलों के लिए अगस्त और सितंबर की बारिश बेहद महत्वपूर्ण होती है। इस दौरान पर्याप्त वर्षा होने पर खेतों में नमी बनी रहती है और फसलें दाना एवं फलियां बनने की अवस्था तक बेहतर तरीके से पहुंचती हैं। यदि बारिश का लंबा अंतराल बना रहा तो पौधों की वृद्धि रुकने, उत्पादन घटने और कुछ क्षेत्रों में दोबारा बुवाई अथवा अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पैदा होने की आशंका बढ़ सकती है।
हालांकि मौसम विशेषज्ञों के अनुसार राजस्थान में मानसून के अभी कुछ दौर शेष हैं और पूर्वी हिस्सों में बारिश की गतिविधियां बढ़ने की संभावना बनी हुई है। इसलिए किसानों के लिए फिलहाल उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
खरीफ फसल केवल खेत की उपज नहीं है, बल्कि राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। उत्पादन कम होने का असर किसानों की आय, कृषि मजदूरों के रोजगार, पशुपालन और स्थानीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में सरकार और कृषि विभाग के सामने कम बारिश वाले क्षेत्रों की लगातार निगरानी, सिंचाई संसाधनों का बेहतर प्रबंधन, फसल बीमा के प्रभावी क्रियान्वयन और किसानों को समय पर कृषि सलाह उपलब्ध कराने की चुनौती है।
राज्य और केंद्र स्तर पर भी कम वर्षा वाले जिलों की निगरानी की जा रही है। कृषि मंत्रालय ने मानसून, खरीफ बुवाई, संवेदनशील जिलों, जलाशयों और फसलों की स्थिति की नियमित समीक्षा पर जोर दिया है।
फिलहाल राजस्थान के किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए हैं। खरीफ की फसल खेतों में खड़ी है और उसकी किस्मत अब आने वाले मानसूनी दौर पर काफी हद तक निर्भर है। यदि अगले कुछ सप्ताह में अच्छी और समान रूप से वितरित बारिश होती है तो मौजूदा नुकसान की भरपाई संभव है, लेकिन मानसून की बेरुखी आगे भी जारी रही तो खरीफ उत्पादन और किसान की आर्थिक स्थिति, दोनों पर इसका असर गहरा हो सकता है।





