मनोहर मनोज
अभी देश में हासिल 7.8 फीसदी की जीडीपी विकास दर के आकड़ें को विपक्ष के साथ कई अर्थशास्त्रियों ने इसे सरकार प्रायोजित बता कर आलोचना की । पर दूसरी तरफ सरकार ने इन आकड़ों को आईएमएफ और विश्व बैंक द्वारा स्वीकृत बताकर पुरजोर बचाव किया गया । पर सरकार उन लोगों की इस आलोचना पर कि देश में ऊँची विकास दर के बावजूद देश में बेरोजगारी बदस्तूर क्यों कायम है, इस बात का ठोस तरीके से बचाव नहीं कर पायी । भारत में आम तौर पर सरकारों द्वारा बेरोजगारी दर के दर्ज़ आंकड़ों के कम या ज्यादा का हवाला देकर वैसी नैरेटिव यानी धारणा परोसी जाती है जो भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में मौजूद श्रम शक्ति की पूर्ण रोजगारी और बेरोजगारी की तस्वीर की गहराई से तस्दीक नहीं कर पाती। यह ठीक है की विकास दर के ज्यादा या कम होने से बेरोजगारी के कम या ज्यादा पर एक असर पड़ता है जो अर्थव्यवस्था के गतिशील कुशल और अकुशल श्रमशक्ति तबके और उनके रोजगार प्राप्ति पर एक ऊपरी असर को इंगित करता है। सरकार अभी यह एक आंकड़ा परोस रही है की भारत में कार्यशील जनसँख्या का अनुपात कोरोना के दौरान 50 फीसदी से बढ़कर अब 58 -60 फीसदी पर चला गया।
परन्तु देखा जाए तो भारत में बेरोजगारी विकास दर के परिवर्तनों से विलग देश और इसके अनेकानेक राज्यों में मौजूद श्रम कानूनों की व्यापक संरचना और इसके कवरेज [ जिसमे उनकी नियुक्ति, वेतन , कार्य परिस्थितियां , श्रम कल्याण तथा छंटनी] , श्रम की देश में मौजूद अनेकानेक दुनिया और उसके समाजशास्त्र तथा राजनीतिक लोकतंत्र में उनकी हक़दारी, मांग, मोलभाव, नियमन तथा दबाव समूहों से परिलक्षित होती रही है। रोजगार के अर्थशास्त्र की दृष्टि से देश की श्रम शक्ति की कुशलता , उत्पादकता और रोजगार बाजार में मांग और पूर्ति की शक्तियां प्रभावकारी कारक जरूर बनती हैं ।
भारत में बेरोजगारी की समस्या के समुचित अध्ययन के लिए जरुरी है की पहले भारत में सभी श्रेणी की रोजगारी और बेरोजगार व्यक्तियों की परख की जाए और फिर उनकी वस्तु स्थिति का अवलोकन किया जाए। मोटे तौर पर भारत में रोजगार के जो इच्छुक होते हैं ; उनमे पहला शैक्षिक बेरोजगार और दूसरा निरक्षर बेरोजगार जिसमे अर्धशिक्षित बेरोजगार की श्रेणी भी जोड़ी जा सकती है। दूसरी श्रेणी है सरकारी क्षेत्र में नियोजित कामगार और निजी क्षेत्र में नियोजित रोजगार। तीसरी श्रेणी है संगठित क्षेत्र बनाम असंगठित क्षेत्र। चौथी श्रेणी है अर्थव्यवस्था के औपचारिक क्षेत्र में प्राप्त रोजगार और अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार। पांचवी श्रेणी है कुशल श्रम, अर्धकुशल और अकुशल श्रम शक्ति की मांग और आपूर्ति की स्थिति । छठी श्रेणी है दिहाड़ी श्रम शक्ति और माहवारी कमाने वाली श्रम शक्ति। सातवीं श्रेणी है संविदा श्रेणी के रोजगार और स्थायी पदों पर नियुक्ति। आठवीं श्रेणी है नौकरी बनाम स्व रोजगार। नौवीं श्रेणी है क्लास वन , टू , थ्री और फोर श्रेणी के रोजगार और उनमे विराजमान आरक्षण की नीति । इन सभी श्रेणी के रोजगार की दुनिया की वस्तु स्थिति जिनके साथ सरकार, समाज और सिस्टम की कानूनी और क्रियान्वन मशीनरी की वैधानिक आधारभूत संरचना भारत में बेरोजगारी की स्थितियों को बहुत हद तक प्रभावित करती है।
भारत में मौजूद श्रम शक्ति के नियोजन का जो परिवेश है वह एक बड़ी ही असमान और विद्रूप तस्वीर पेश करता है। भारत में श्रम शक्ति की वैधानिक संरचना और उसकी मौजूद तस्वीर की परम्पइस तरह से विकसित हुई है जिसमे सरकारी क्षेत्र में नियोजित श्रमशक्ति तो तमाम श्रम कल्याण प्रावधानों और अधिकारों से परिपूर्ण है। जिसमे श्रम सुरक्षा, सेवा स्थायित्व और कल्याण की पूरी गारंटी रही है पर इसमें उत्पादकता, कार्य निष्पादकता और उपभोक्ता व जनोपक्षी उत्तरदायित्व का पक्ष हमेशा नदारथ देखा जाता है जिसकी लिए सरकार की तरफ से इन नियोजित श्रमशक्ति पर इस बात का बंधन नहीं डाला जाता। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में माहौल उल्टा है जहां उत्पादकता के बराबर भी पारिश्रमिक ना देकर अपनी मुनाफेदारी बढ़ाई जाती है। इन वजहों से भारतीय समाज में सरकारी नौकरियों के प्रति गजब की आसक्ति रही है। लेकिन सरकारें इन परिस्थितियों की वजह से अपने तमाम महकमों में रिक्त पदों को भरे जाने के प्रति कोई रूचि नहीं प्रदर्शित करती क्योंकि सरकारें पक्की नौकरियों के वित्तीय और श्रम कानूनों के बोझ से मुक्त रहना चाहती हैं। इसका नतीजा है की तमाम सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के काम के भारी वर्कलोड होने के बावजूद राजपत्रित और अराजपत्रित श्रेणी की रिक्तियां थोड़ी बहुत आयोग की परीक्षाओं के जरिये भरी जाती हैं अन्यथा एक निवर्तमान कर्मचारी को दोहरी जिम्मेदारी देकर या ठेके या संविदा पर सरकारों में भर्ती की जाती हैं। ये स्थितियां देश की केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों में 1990 के दशक से कायम हैं । कुछ सरकारें चुनाव के समय पुलिस बल और शिक्षको की नियुक्ति की पहल करती हैं पर अधिकतर समय वे रिक्तियों को भरने से बचती हैं । ऐसे में सरकारी नौकरियों के प्रति घोर आसक्ति रखने वाला भारत की विशाल बेरोजगार फौज बेरोजगार बनी रहती है।
देखा जाए तो अभी केंद्र सरकार में स्थायी कर्मचारी , 2004 के बाद नियुक्त बिना पेंशन वाले कर्मचारी और संविदा पर नियुक्त कर्मचारी इनकी तीन श्रेणियां मौजूद हैं । कुल मिलाकर इन परिस्थितियों का व्यापक नतीजा है की देश में मौजूद विशाल बेरोजगार श्रम शक्ति के बावजूद केंद्र सरकार का कार्यबल निरंतर घटता जा रहा है। केंद्र सरकार की 70 लाख की श्रम शक्ति अब घटकर 55 लाख रह गयी है, बल्कि इनके पेंशनरों की तादात इनसे ज्यादा 70 लाख है। एक अनुमान है की केंद्र सरकार के रेलवे , अर्धसैनिक बल , सेना और तमाम शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी के महकमों में 15-20 लाख स्वीकृत पद रिक्त हैं । अग्निवीर योजना के जरिये सेना में जवानों की रिक्तियों का भरा जाना सरकार की संविदा पर नियुक्ति की नीति के केजुअल पहल का प्रतीक है। ऐसे में सवाल ये है की भारत सरकार एक राष्ट्रव्यापी सार्वभौम जिसमे श्रम की सभी कार्यपरिस्थितियों का एक सम्यक निदान हो संविदा रोजगार का ही कानून लेकर क्यों नहीं लाती? या ये क्यों नहीं तय कर लेती फलां फलां विभाग और उसके पद स्थायी होंगे और फलां फलां संविदा पर होंगे ? यदि केंद्र सरकार द्वारा यह पहल लायी जाती है और इसमें सभी राज्य सरकारों की सहमति ली जाती है तो देश के शैक्षिक रोजगार की स्थिति में एक व्यापक और क्रन्तिकारी परिवर्तन आ जाएगा। एक तरफ इससे केंद्र सरकार में खाली पड़े 15 लाख पद और राज्य सरकारों के तमाम महकमों जिसमे पुलिस और शिक्षक के पद बहुतायत हैं कुल मिलाकर उसमे लगभग एक करोड़ पदों पर तुरत नियुक्ति संभव होगी। देश में शैक्षिक बेरोजगारी को न्यून बनाने में इसका व्यापक असर पड़ेगा जिसके लिए किसी बढ़ी विकास दर और अर्थव्यवस्था के तेजी की बाट जोहने की जरुरत नहीं पड़ेगी। इस कदम का जो दूसरा असर पड़ेगा वह निजी क्षेत्र के रोजगार पर पड़ेगा जहाँ नए संविदा रोजगार कानून से स्थितियां न्यायसंगत और श्रम बाजार में समरूपता की स्थिति पैदा करेगी। दूसरी तरफ इससे लोगो के लिए सरकारी और प्राइवेट सेक्टर का भेदभाव घट जायेगा क्योंकि दोनों जगह श्रम कानून और कार्य परिस्थितियां एक समान होंगी । नयी आर्थिक नीति और नयी आर्थिक व्यवस्था का यह तकाजा है की सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी और हिस्सेदारी एक समान परिवेश के मातहत निर्धारित हो जिसमे एक कानून और नियामक प्राधिकरण के तहत एक लेवल प्लेइंग फील्ड प्रदान करने की बात होती है।
देश में शैक्षिक बेरोजगारी राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मसला रहा है। ऐसे में ये कानूनी और परिवेशगत बदलाव देश में निजी और सरकारी क्षेत्र में शैक्षिक बेरोजगारो के लिए करीब दो करोड़ नौकरियां त्वरित उत्पन्न करेगा। वैसे भी भारत में प्रति हज़ार जनसँख्या पर सरकारी कर्मचारी की संख्या सिर्फ 16 है, जबकि अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में 77 और चीन में 57 है। ऐसे में देश में शैक्षिक रोजगार पैदा करने की पहल सरकार को उठाना पड़ेगा जिसका असर देश के तमाम गैर सरकारी क्षेत्रों को भी प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। इसमें करना ये होगा की सरकार को सभी सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों में रिक्त पड़े पदों और रोजगार अवसरों की ऑडिट करने की एक राष्ट्रीय पहल शुरू करनी होगी । इससे एक तरफ सरकार पक्की नौकरी के बोझ से जो रोजगार भरने से बच रही है वह दूर होगा तो दूसरी तरफ निजी क्षेत्र ज्यादा मुनाफा कमाने हेतू कम कामगारों में ज्यादा काम कराने की प्रवृति है उस पर रोक लगेगा।
भारत में श्रम बाजार में मांग और आपूर्ति की शक्तियों की भूमिका को भी नहीं नकारा जा सकता। भारत में जो मुक्त और बाजार अर्थव्यवस्था है वह विकास के अनेकानेक क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों और उससे उपजी अर्थव्यवस्था की श्रम मांग से प्रभावित होती है। रियल एस्टेट, सूचना प्रौद्योगिकी, परिवहन, ऑटोमोबाइल, स्वास्थय और शिक्षा के क्षेत्र में कुशल श्रम शक्ति की मांग तीव्र गति से बढ़ रही है। ऐसे में अर्ध कुशल , कुशल और पूर्ण प्रशिक्षित सभी तरह की श्रम शक्ति की आपूर्ति कामगार प्रशिक्षण संस्थानों की अधिकाधिक स्थापना और सरकार की राजनितिक इच्छा शक्ति से इसके तीव्र परिचालन पर निर्भर है। अर्थव्यवस्था के नए उभरते क्षेत्र जैसे गिग इकॉनमी से अर्ध शिक्षित कामगारों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में स्व रोजगार के क्षेत्र तेजी से खुले हैं । भारत की अर्थव्यवस्था की प्रगति दर सरकार के व्यावसायिक उपक्रमों तथा निजी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों सभी में रोजगार उत्पन्न करने की सम्भावना बढाती है। परन्तु इसके साथ हमारी श्रम शक्ति पर श्रम कानूनों का व्यापक आवरण का चढ़ाया जाना ना केवल उत्पादकता के लिए जरूरी है बल्कि देश में अवसर की समानता, समता मुलक समाज और न्याय मूलक अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है।
इसीलिए विकास दर का ज्यादा या कम होने से देश में बेरोजगारी और रोजगारी की तस्वीर बदलने का हवाला नहीं दिया जा सकता। यदि हम देश के तमाम रोजगार और बेरोजगारी श्रेणियों के बीच की दीवार कानून और अनुपालन की दृष्टि से दूर नहीं करते यानी संगठित और असंगठित के बीच , स्थायी और संविदा के बीच , सरकारी और निजी के बीच और औपचारिक और अनौपचारिक के बीच तबतक बेरोजगारी का सम्यक सम्यक समाधान नहीं है। पर योग्यता, कुशलता, उत्पादकता, अनुभव और मांग आपूर्ति की शक्तियां निसंदेह हमारे रोजगार बाजार को जरूर प्रभावित करेंगी और उसी हिसाब से हमारी अर्थव्यवस्था को निर्धारित करेगी।
रोजगार न तो किसी के एहसान, किसी के रहमो करम, किसी सफ़ेद हाथी की भूमिका में आने का मसला होना चाहिए और ना ही एक काम के अलग अलग दाम, एक योग्यता के लिए अलग अलग अवसर , एक नौकरी के भिन्न भिन्न कार्य परिस्थितियों की मोहताज होना चाहिए। बेरोजगारी पर एक स्थायी और निर्णायक हमला हो इसके लिए जरूरी है सरकार की आर्थिक नीतियां रोजगारोन्मुखी हो साथ ही उत्पादकता , कल्याण और निवेश मुनाफा को प्रोत्साहित करने वाली हों तभी सतत र रोजगार की पनपेगी। हाँ निजी और सरकारी सभी क्षेत्रों में रोजगार के अधिकाधिक क्षेत्रों की निरंतर तलाश जरूर होनी चाहिए।
लेखक भारत परिवर्तन अभियान के संयोजक है





